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कानून से हक तक, कागजी अधिकारों की जमीनी चुनौतियां

यह लेख महिलाओं के संपत्ति अधिकारों की कानूनी प्रगति और जमीनी चुनौतियों का विश्लेषण करता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे कानूनों के बावजूद पितृसत्तात्मक सोच, सामाजिक दबाव और न्यायिक जटिलताएं अधिकारों के क्रियान्वयन में बाधा हैं। लेख समतामूलक समाज हेतु जागरूकता और संस्थागत सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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Feb 10, 2026

दीक्षा राज, स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार,

संपत्ति का अधिकार किसी भी व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का आधार होता है। संपत्ति पर अधिकार केवल आर्थिक संसाधनों तक पहुंच का प्रश्न नहीं, बल्कि शक्ति, प्रतिष्ठा और निर्णय क्षमता से भी जुड़ा हुआ है। जब महिलाओं के नाम पर भूमि और संपत्ति दर्ज होती है, तो परिवार और समाज में उनकी भागीदारी स्वत: बढ़ती है और वे घरेलू तथा सामाजिक निर्णयों में सशक्त भूमिका निभाने लगती हैं। इससे न केवल लैंगिक समानता को बल मिलता है, बल्कि बालिका शिक्षा, स्वास्थ्य और पारिवारिक कल्याण जैसे सूचकों में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है। महिलाओं के संपत्ति अधिकार समाज के समग्र विकास, सामाजिक न्याय और पीढ़ीगत सशक्तीकरण की आधारशिला सिद्ध होते हैं।

हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है, जिसके अंतर्गत पुत्री को पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में सह-उत्तराधिकारी का अधिकार मिला और यह निर्धारित किया गया कि स्त्रीधन महिला की पूर्ण व्यक्तिगत संपत्ति माना जाएगा और वह जैसे चाहे उसका उपयोग कर सकती है। घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के अंतर्गत भी विवाहित व विवाहित जैसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं को वैवाहिक घर में निवास का अधिकार है। विनिता शर्मा बनाम राकेश शर्मा के मामले (2020) के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि पुत्री को जन्म से ही सह-उत्तराधिकारी माना जाएगा चाहे 2005 के संशोधन से पूर्व पिता की मृत्यु हो गई हो। विधिक सुधारों ने नि:संदेह ही समाज में सामाजिक न्याय स्थापित करने हुए महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण को बढ़ावा दिया है परंतु व्यावहारिक स्तर पर यह एक विखंडित अधिकार है।

संपत्ति का अधिकार व्यक्तिगत कानूनों के अन्तर्गत आता है, जो हर समुदाय के लिए भिन्न हैं। सभी धर्मों के अलग कानून और प्रक्रियाएं हैं, जिन्हें एक सूत्र में पिरोया नहीं जा सकता। जिन महिलाओं पर यह अधिनियम लागू होता है, वे पितृसत्तात्मक परंपराओं और पारिवारिक दबावों के कारण इस अधिकार का उपयोग नहीं कर पाती। यदि महिलाएं अपने अधिकार के प्रवर्तन का निर्णय ले भी लें तो उन्हें लंबी न्यायिक प्रक्रिया व सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है। वर्तमान समय में आवश्यकता है कि सांस्कृतिक परिवर्तन और संस्थागत सुधारों के माध्यम से महिलाओं में कानूनी जागरूकता उत्पन्न हो व परिवारों में लैंगिक संवेदनशीलता उजागर की जा सके ताकि कानून और क्रियान्वयन के अन्तराल को कम किया जा सके और समतामूलक एवं न्यायपूर्ण समाज का निर्माण हो सके। महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता भारत के समावेशी विकास व विकसित-भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में आवश्यक प्रयास है, जो भारत को प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करेगा।

Updated on:
10 Feb 2026 08:23 pm
Published on:
10 Feb 2026 08:10 pm
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