Rajasthan News : यहां की मिलों से निकाले जाने वाला सरसों तेल संपूर्ण राजस्थान, गुजरात, मुबई, बंगाल, बिहार सहित कई राज्यों में जाता था
विदेशों से आयात हो रहे सोया व पाम ऑयल ने हमारे सरसों की डिमांड कम कर दी है। इससे सरसों तेल मिलों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हालात यह कि देशभर में विख्यात रही सिरोही व पाली जिले के शिवगंज-सुमेरपुर की सरसों तेल की मिलें धीर-धीरे दम तोड़ रही हैं। पिछले दो-तीन सालों में शिवगंज व सुमेरपुर में करीब 80 तेल इंडस्ट्रीज पर ताला लग चुका है और यह सिलसिला लगातार जारी है। तेल मिल उद्योगपतियों की मानें तो इसका सबसे अहम कारण विदेशों से सोया व पाम ऑयल का सस्ता आयात होने से इसकी भारी मात्रा में खपत होना है। इससे घाटा झेल रहे उद्योगपतियों ने तेल मिलों पर ताला जड़कर इस व्यवसाय से किनारा कर दिया है। वर्तमान में दोनों बड़े शहरों में करीब 80 फीसदी तेल मिलें बंद पड़ी है। इसका फायदा पाम ऑयल कारोबारियों को मिल रहा है।
तेल मिल उद्योगपतियों के मुताबिक बाहर से आ रहा पाम व सोया सहित अन्य तरह का खाद्य तेल सस्ते होने से इसकी डिमांड लगातार बढ़ रही है, इसलिए लोग सरसों तेल के बजाय इसका उपयोग अधिक करने लगे हैं। इसके चलते यह कारोबार दिनों-दिन प्रभावित होने से तेल मिलें बंद होती जा रही है। बंद पड़ी इंडस्ट्रीज का भी उद्योगपतियों को बिजली बिल, स्टाफ, लोन का ब्याज आदि पर हर माह करीब 2.50 से 3 लाख रुपए का खर्चा वहन करना पड़ रहा है। इसके अलावा तेल मिलें बंद होने से दोनों शहरों में ही करीब 1 हजार से अधिक लोग बेरोजगार हो गए हैं।
सुमेरपुर-शिवगंज क्षेत्र में बड़ी तादाद में सरसों का उत्पादन होता है। सुमेरपुर कृषि मंडी में सरसों की काफी आवक होती है। यही सरसों तेल मिलों में काम आ जाती थी। इसी कारण उद्यमियों ने आसपास में तेल मिलें लगाई। तेल मिल से जुड़े उद्योगपतियों ने बताया कि शिवगंज-सुमेरपुर की तेल इंडस्ट्रीज का कोई जमाने में नाम था। यहां की मिलों से निकाले जाने वाला सरसों तेल संपूर्ण राजस्थान, गुजरात, मुबई, बंगाल, बिहार सहित कई राज्यों में जाता था, लेकिन अब बाहर से आ रहा पाम ऑयल इससे सस्ता मिलने से इसकी खपत धीरे-धीरे कम होने लगी है। जिससे घाटे में चल रही तेल मिलें धीरे-धीरे दम तोड़ने लगी हैं।
तेल मिल मालिक ताराराम कुमावत के मुताबिक वर्ष 1980-82 में सरकार के छूट देने पर सिरोही जिले के शिवगंज और पाली जिले के सुमेरपुर रीको में तेल मिल लगना शुरू हुई थी। इसके बाद जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो तेल मिलें भी बढ़ती गई। उस दौरान सीजन में करीब 20 हजार बोरी सरसों की खपत हो जाती थी। दोनों शहरों में वर्तमान में करीब 100 तेल मिलें है, जिनमें से पिछले 2-3 सालों में ही करीब 80 तेल मिलें बंद हो चुकी हैं। वर्तमान में 15 से 20 इंडस्ट्रीज चालू हालत में है, लेकिन वे भी घाटे में चल रही है।
इंपोर्ट ऑयल सस्ता और इंपोर्ट ड्यूटी कम होने से एग्रोबेस इंडस्ट्रीज खत्म हो रही है। इससे सभी को नुकसान है। उद्योगपतियों ने सरसों तेल मिलों में करोड़ों रुपए की मशीनें लगाई। जिनमें तेल भी अच्छा बनता है, लेकिन विदेश से आयात हो रहा सोया व पाम ऑयल सस्ता है और इंपोर्ट ड्यूटी भी कम है। सरसों के तेल की डिमांड कम होने से देश की तेल मिलें बंद होती जा रही है। राजस्थान में करीब ढाई हजार इंडस्ट्रीज प्रभावित हैं। करीब 25 प्रतिशत उत्पादन रह गया। इस उद्योग को बचाने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाना चाहिए।
दिनेश बिन्दल, अध्यक्ष ऑयल एण्ड दाल मिल संस्थान, शिवगंज-सुमेरपुर