पाली जिले के केदला गांव की जया ने मां के हौसले से कठिन हालातों को मात दी और अब फिलिपींस की राजधानी मनीला में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार समारोह में ‘एजुकेट गर्ल्स’ संस्था का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। जया की कहानी बेटियों के लिए प्रेरणा बनी।
पाली: जया, जिसका अर्थ है विजय या विजयी। इस नाम को सार्थक किया है पाली जिले के छोटे से गांव केदला की रहने वाली जया ने। जिसका जीवन मां के हौसले ने बदल दिया।
उसने कठिन हालातों के बीच जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए वह मुकाम हासिल किया है, जो हर कोई महज सोचता है। वह फिलिपींस की राजधानी मनीला गई हैं। जहां शुक्रवार को मिलने वाले रेमन मैग्सेसे पुरस्कार में एजुकेट गर्ल्स संस्था का प्रतिनिधित्व करेंगी। जया से पत्रिका ने बातचीत की तो उन्होंने अपने जीवन की बातें साझा की।
प्रश्न: आपकी प्रारिभक शिक्षा कहां व कैसे हुई?
जवाब: आज मैं 24 साल की हूं। बचपन में पढ़ाई गांव के स्कूल में की। उसमें कई बाधाएं आई। मेरे कुछ परिजन कहते थे, लड़कियों को पढ़ाने की जरूरत नहीं है, लेकिन मां ने उनकी बातों को नजरअंदाज किया और उनसे कहा था मेरी बेटी पढ़ेगी…उनके इसी हौसले से आज मैं शारीरिक शिक्षा अध्यापिका हूं, अब मनीला में पुरस्कार लेने जा रही हूं।
प्रश्न: आपके जीवन में बड़ा बदलाव कब आया?
जवाब: मां के हौसले व परिश्रम के बावजूद मेरी पढ़ाई छूट जाती। मैं एजुकेट गर्ल्स से वर्ष 2011 में जुड़ी। उसम समय 10 वर्ष की थी। मैं छठी में थी। संस्था ने मेरा नामांकन कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय कराया, वहां से जीवन में पीछे मुड़कर नहीं देखा।
प्रश्न: अभी आप क्या करती हैं व शौक क्या है?
जवाब: मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी। पिता ड्राइवर हैं। घर का खर्च मुश्किल था। मैं अब दोपहर में स्कूल जाती हूं। शाम को एक एकेडमी में भी खेल सिखाने जाती हूं। रनिंग, आउटडोर गेम्स और खासतौर पर बेसबाल बेहद पसंद है। मैं नेपाल में इंटरनेशनल बेसबाल टूर्नामेंट में खेल चुकी हूं। पंजाब में राष्ट्रीय स्तर पर खेली।
प्रश्न: आपका कौन सा सपना अधूरा रह गया?
जवाब: मेरा सपना पुलिस अधिकारी बनने का था। जो पूरा नहीं हो सका। मुझे खुशी है कि खेलों के माध्यम से मैं लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई हूं। मैंने 30 से अधिक लड़कियों का स्कूल में दाखिला करवाने में मदद की है।
प्रश्न: आप समाज को क्या संदेश देंगी?
जवाब: लड़कियों को पंख फैलाकर उड़ने का मौका देना चाहिए। जो लोग मुझे व मेरी जैसी अन्य बालिकाओं के पढ़ाना नहीं चाहते थे, वे आज बदले हैं। मुझे व मेरी जैसी बेटियों को देखकर वे भी अपनी बेटियों को स्कूल भेजने लगे हैं। उनके परिवार की अन्य बेटियां भी शिक्षा प्राप्त कर रही हैं।