पटना

Bharat Tiwari Encounter: सुप्रीम कोर्ट ने PIL सुनने से किया इनकार, कहा- हाई कोर्ट जाइए

Bharat Tiwari Encounter: भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को पटना हाई कोर्ट जाने को कहा है।
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Jun 30, 2026
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भरत तिवारी एनकाउंटर केस में सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार

Bharat Tiwari Encounter Case: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के भोजपुर में 17 जून को हुए भरत भूषण तिवारी के कथित पुलिस एनकाउंटर की CBI से स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज तो नहीं किया, लेकिन याचिकाकर्ता को अपनी अर्जी और मांगों के साथ संबंधित हाई कोर्ट (पटना हाई कोर्ट) जाने की सलाह दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा हाई कोर्ट क्यों नहीं गए

आज इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विशाल तिवारी ने अपनी दलीलें पेश कीं, तो पीठ ने इस पर विचार करने से मना कर दिया। जस्टिस एम. एम. सुंदरेश ने कहा कि हम इस जनहित याचिका पर विचार नहीं करेंगे। जज ने याचिकाकर्ता से पूछा कि वो अपनी याचिका लेकर हाई कोर्ट क्यों नहीं गए? ऐसे मामलों में उच्च न्यायालयों के पास जाना ज्यादा बेहतर होता है, क्योंकि वे स्थानीय स्तर पर चल रही कानूनी प्रक्रियाओं की कहीं अधिक प्रभावी ढंग से निगरानी कर रहे होते हैं।

याचिका में क्या की गई थी मांग?

सुप्रीम कोर्ट में वकील विशाल तिवारी की ओर से दायर इस रिट याचिका में 17 जून 2026 को हुए भरत भूषण तिवारी के कथित एनकाउंटर जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए। याचिका में इस एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए मांग की गई कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र एक्सपर्ट कमेटी बनाई जाए, जो पूरे मामले को CBI को सौंपे और अपनी देखरेख में जांच पूरी करवाए।

फेसबुक लाइव का दिया गया था हवाला

याचिका में कहा गया है कि एनकाउंटर से पहले भरत भूषण तिवारी ने अपने फेसबुक पेज पर लाइव आकर घोषणा की थी कि अगर उनकी कुछ प्रशासनिक मांगें मान ली जाएं, तो वे सरेंडर करने और हथियार डालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। याचिका में भरत तिवारी के पिता काशीनाथ तिवारी के बयानों का भी ज़िक्र किया गया है, जिन्होंने दावा किया था कि उनके बेटे का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और न ही उनके खिलाफ कोई FIR दर्ज थी। वे सिर्फ समाज सेवा में सक्रिय थे और सरेंडर के बाद भी पुलिस ने उन्हें गोली मार दी।

याचिका में दलील दी गई थी कि जब पुलिस खुद ही जज और सज़ा देने वाले की भूमिका निभाने लगती है, तो कानून का शासन पूरी तरह से खत्म हो जाता है और यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

Updated on:
30 Jun 2026 01:05 pm
Published on:
30 Jun 2026 12:52 pm