
Neet Paper Leak Protest:बिहार विधानसभा के मानसून सत्र के अंतिम दिन (शुक्रवार) NEET पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन का मुद्दा इतना गरमा गया कि विधानसभा अध्यक्ष को सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायक आमने-सामने आ गए। दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक और नारेबाजी हुई, जिससे सदन का माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि अपनी जायज मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज और गोलीबारी की गई तथा सरकार उनकी आवाज को बल प्रयोग के जरिए दबाने की कोशिश कर रही है। इसी के विरोध में विपक्षी विधायकों ने सदन में सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
वहीं, सत्ता पक्ष ने विपक्ष के आरोपों का कड़ा जवाब दिया। सत्ताधारी दल के विधायकों ने कहा कि पिछले दो दिनों से आंदोलन की आड़ में उपद्रवी और असामाजिक तत्व आम लोगों तथा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस, प्रशासन और मीडिया कर्मियों पर पथराव किया गया। ऐसे लोगों के खिलाफ सरकार सख्त कार्रवाई करेगी और इसमें किसी तरह की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। लगातार बढ़ते हंगामे और शोर-शराबे के बीच विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार ने सदन की कार्यवाही दोपहर 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी। हालात ऐसे रहे कि मानसून सत्र के चौथे दिन की पहली पाली में सदन की कार्यवाही महज पांच मिनट ही चल सकी।
आरजेडी विधायक आलोक मेहता ने सदन में छात्र आंदोलन और पुलिस लाठीचार्ज का मुद्दा उठाते हुए कहा कि बुधवार और गुरुवार को आंदोलन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और गोलियां भी चलाईं। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों पर हर स्तर पर दमन किया गया। आलोक मेहता ने कहा कि पटना से लेकर दिल्ली तक आंदोलनकारी छात्रों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया, जो लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक है।
आलोक मेहता के यह कहते ही बीजेपी और जदयू के कई विधायक अपनी सीटों से खड़े हो गए और इसका कड़ा विरोध किया। सत्ता पक्ष के विधायकों ने कहा कि सड़कों पर छात्र नहीं, बल्कि उपद्रवी और असामाजिक तत्व उत्पात मचा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन की आड़ में तोड़फोड़ की गई, पुलिस, मीडिया कर्मियों, विधायकों और आम लोगों पर हमला किया गया तथा नेताओं के वाहनों को भी निशाना बनाया गया। सत्ता पक्ष का कहना था कि ऐसे लोगों को छात्र या आंदोलनकारी नहीं कहा जा सकता और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है।