लालू यादव की बेटी और राजद नेता रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर महिला आरक्षण बिल के औचित्य पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने एक विस्तृत पोस्ट के जरिए समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति और उनके संघर्षों को उजागर किया है।
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य विभिन्न मुद्दों पर लगातार सरकार पर हमलावर रहती हैं। इस बार उन्होंने महिला आरक्षण बिल को लेकर केंद्र सरकार और सामाजिक व्यवस्था पर कड़ा प्रहार किया है। रोहिणी ने सवाल उठाया कि जब जमीनी हकीकत में महिलाएं आज भी असुरक्षित और भेदभाव का शिकार हैं, तो ऐसे महिला आरक्षण बिल का क्या औचित्य है?
रोहिणी आचार्य ने अपनी पोस्ट में उन तमाम अड़चनों का जिक्र किया है जो एक महिला को आगे बढ़ने से रोकती हैं। रोहिणी ने लिखा, 'हमारे देश में महिलाओं की सुरक्षा, उनके सच्चे सशक्तिकरण, उनकी शिक्षा और उनकी आत्मनिर्भरता के महत्व पर ही सवाल उठाए जाते हैं। एक ऐसे राष्ट्र में जहां गरीबों की आबादी बहुत बड़ी है, आज भी गरीब महिलाओं को शिक्षा के अवसर से वंचित किया जा रहा है।'
रोहिणी ने आगे लिखा कि महिलाओं के सामाजिक, सार्वजनिक और पेशेवर प्रयासों में उनके साथ भेदभाव आज भी जारी है और उन्हें आगे बढ़ने के अवसरों में अनगिनत बाधाओं का सामना करना पड़ता है। महिलाओं की आबादी का एक बड़ा हिस्सा पढ़ने-लिखने के बाद भी चूल्हा-चौका करने को ही मजबूर हैं।
रोहिणी आचार्य ने लिखा, 'देश के लगभग हर एक राज्य में अभी भी पर्दा करने की प्रथा का प्रचलन है। शहरों से लेकर गांवों तक, महिलाएं जो कपड़े पहनना चुनती हैं, उन पर आपत्तियां उठाई जाती हैं। जो महिलाएं लगातार होने वाले बलात्कार, दहेज से जुड़ी क्रूरता, यौन उत्पीड़न और यौन शोषण का शिकार होती हैं, उन्हें अक्सर न्याय से वंचित रखा जाता है।'
रोहिणी ने अपनी पोस्ट में 'पितृसत्तात्मक सोच' के वर्चस्व पर कड़ा हमला किया। उन्होंने कहा कि जब महिलाएं अपने आत्म-सम्मान के लिए आवाज उठाती हैं, तो उन्हें घरेलू हिंसा और सोशल मीडिया ट्रोलिंग जैसी आधुनिक बुराइयों का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। उन्हें अपने मायके और ससुराल के बीच होने वाले भेदभाव की अग्निपरीक्षा से गुज़रने के लिए मजबूर किया जाता है और वे पितृसत्तात्मक मानसिकता के वर्चस्व के अधीन बनी रहती हैं।
रोहिणी आचार्य ने पोस्ट के अंत में लिखा, 'आजादी मिलने के लगभग आठ दशक बाद भी महिलाएं वास्तविकता में सच्ची समानता का दर्जा हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। महिलाओं का आत्मविश्वास टूट रहा है, क्योंकि वे अपने परिवारों और समाज के लिए जो बलिदान देती हैं, उन्हें संकीर्ण सोच के साथ महज सौदेबाजी कहकर खारिज कर दिया जाता है। अपने माता-पिता की संपत्ति में समान कानूनी अधिकार होने के बावजूद, महिलाओं और बेटियों को उनके हक के हिस्से से लगातार वंचित रखा जा रहा है आखिर क्यों?'