
Karkabhat Megalithic Site: छत्तीसगढ़ की प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत अब सात समंदर पार अपनी चमक बिखेर रही है। बालोद जिले में स्थित लगभग 5000 वर्ष पुराना ’करकाभाट’ महापाषाणीय स्थल अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। हाल ही में दक्षिण कोरिया से दो विदेशी शोधकर्ता इस ऐतिहासिक स्थल का अध्ययन करने पहुंचे, जो प्रदेश के पर्यटन के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
करकाभाट का यह स्थल उस कालखंड की गवाही देता है जब मानव समाज ने पूर्वजों की स्मृति में विशाल पत्थरों के स्मारक बनाने की परंपरा शुरू की थी। यहां स्थित मेनहिर, डोलमेन और पत्थरों के वृत्त न केवल तत्कालीन अंतिम संस्कार की रीतियों को दर्शाते हैं, बल्कि प्रागैतिहासिक समाज की धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं का भी खुलासा करते हैं। पुरातात्विक दृष्टि से महानदी घाटी का यह क्षेत्र पाषाणकाल से महापाषाणीय काल तक के मानव विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
बालोद इको टूरिज्म के अध्यक्ष सूरज करियारे ने बताया कि पिछले पांच वर्षों से जिले की धरोहरों को वैश्विक पटल पर लाने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें कोरियाई शोधकर्ताओं ने गाइड यशकांत गढ़े और टोमेश ठाकुर के मार्गदर्शन में यहां की संस्कृति और इतिहास का गहन अध्ययन किया। विदेशी पर्यटकों ने इस अनुभव को अद्भुत और अविस्मरणीय बताते हुए यहां दोबारा आने की इच्छा जाहिर की है।
इस उपलब्धि पर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम अब वैश्विक स्तर पर दिखने लगे हैं। उन्होंने कहा कि करकाभाट जैसे अद्वितीय स्थलों तक विदेशी पर्यटकों का पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर मजबूती से स्थापित हो रहा है। हमारा उद्देश्य स्थानीय धरोहरों को संरक्षित करते हुए पर्यटन के जरिए रोजगार के नए अवसर सृजित करना है।
छत्तीसगढ़ का करकाभाट क्षेत्र उन दिनों आबाद था। बालोद धमतरी मार्ग पर शिवनाथ और महानदी के बीच के लगभग 10 किलोमीटर क्षेत्र में ये अवशेष फैले हुए हैं। वर्ष 1999 के सर्वे में ग्राम करकाभाट, करहीभदर, सोरर, चिरचारी, मुजगहन, कन्नेवाड़ा, बरही, बरपारा, कपरमेटा, धोबनपुरी, धनोरा, भरदा आदि गांव में लगभग 5 हजार प्राचीन कब्रों को चिन्हांकित किया गया था। इनमें से अनेक कब्रें बीते दो दशकों में ध्वस्त हो चुकी हैं।
वहीं पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर अरुण कुमार शर्मा के मुताबिक बस्तर, नागालैंड, मणिपुर तथा अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में पाए गए ऐसी कब्रों में से ग्राम करकाभाट का कब्र समूह सबसे बड़ा है। यहां मुख्यतः तीन तरह के स्मारक पत्थर (मेनहीर) मिलते हैं। नुकीले (कोनिकल), मछली की पूंछ जैसे विभाजित शीर्ष वाले (फिशटेल) और एक तरफ से नुकीले सिरे वाले। पत्थरों की खूबी यह है कि इन्हें एक ही तरफ से तराशा गया है। तराशा हुआ भाग उत्तर की ओर है।
इसके अलावा कैर्न, वृत, डोलमेन आदि भी हैं। इनके आसपास पिरामिड की शक्ल में सजाए गए पत्थरों के स्तूप मिलते हैं। खुदाई में यहां से भाला और तीर के सिरों पर लगने वाले नुकीले अंश तथा कृषि के औजार मिले हैं। दुःखद यह है कि यहां रहने वाले बहुत कम लोगों को इस स्थल की जानकारी है। इससे कम लोगों ने कभी इसे देखा है। सड़क किनारे संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग का बोर्ड भी लगा हुआ है। जिसमें महापाषाणीय स्मारक स्थल की संस्कृति के बारे में जानकारी दी गई है।
बताया जाता है कि समाज में उच्च पद प्राप्त लोगों को ही खास कब्रें नसीब होती थीं। कुछ कब्रें यहां जोड़ों में मिली हैं जो संभवतः पति-पत्नी के हैं। कुछ बड़ी सामूहिक कब्रें भी मिली हैं। कालांतर में इसमें भिन्नता आई। महत्व के हिसाब से अलग-अलग तरह की चट्टानों का, अलग अलग कोणों पर उपयोग प्रारंभ हुआ। यह प्रक्रिया लगभग एक ही समय पर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में प्रारंभ हुई। हजारों मील के फासले के बाद भी इनमें गजब की समानता थी।
आखिर ये कब्र किसके हैं और इस जगह पहले क्या था। इसे जानने के लिए 90 के दशक में यहां पर दिल्ली से लेकर रायपुर के पुरातत्व के जानकारों ने खुदाई शुरू की थी। खुदाई में यहां पर भाला और तीर के सिरों पर लगने वाले नुकीले अंश और कृषि के औजार मिले थे। जिसे टीम अपने साथ ले गई। अब भी ये जगह लोगों के लिए कौतूहल का विषय है। जिसके बारे में लोग जानना चाहते हैं।
ग्राम करकाभाट के आसपास अन्य गांवों में जब सर्वे के दौरान खुदाई हुई थी, तो पाषाण एवं धातु से निर्मित कई उपकरण, हथियार, सोने, चांदी और तांबा की मुद्राएं मिली थी। गुरुर ब्लॉक के ग्राम कुलिया, कनेरी में स्मारक के नीचे खुदाई में चुकिया मिट्टी की एक छोटी कलशी में रखे 30 साने के सिक्के मिले थे। जिसमें 25 सिक्के सामपुरीय नरेश महेन्द्रादित्य के, राजा भवदत्त के और एक सिक्का राज अर्थपति के शासन का था। ये सिक्के विरासत के रूप में आज भी गुरु घासीदास संग्रहालय में सुरक्षित रखे गए हैं। वहीं धनोरा में 500 पाषाणीय स्मारक मिले थे।
यहां आने वाले पर्यटक व लोगों की माने तो यहां की भव्यता देखती ही बनती है। यहां की कलाकारी देखकर यहां आने वाले सोचते है कि यहां कभी बस्ती रही होगी या मंदिर रहा होगा या कोई भी युद्ध स्थल रहा होगा। चाहे जो भी हो इतिहास किसी को नहीं पता। लेकिन यहां के पत्थर और पिरामिड मंत्र मुग्ध करने वाला है।