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Tiger Died in Thailand : थाईलैंड में 10 दिनों में 72 बाघों की मौत, क्या गुजरात के गिर के शेरों पर भी है खतरा?

Tiger Died in Thialand: थाईलैंड में सिर्फ 10 दिनों के भीतर 72 बाघों की मौत ने एक बार फिर से भारत में पाई जाने वाली एशियाटिक लायन प्रजाति के संरक्षण को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। आइए एक्सपर्ट से इंडो चाइनीज बाघ और गिर के शेरों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

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Feb 27, 2026
थाईलैंड में बाघों के अस्तित्व पर संकट छा गया है।

Tiger Died in Thailand : थाईलैंड के चियांग माई स्थित टाइगर किंगडम की दो यूनिट माए ताएंग (51 बाघ) और माए रिम (21 बाघ) में 8 से 19 फरवरी के बीच 72 बाघों की मौत हो गई। टाइगर किंगडम के अधिकारियों के अनुसार प्रारंभिक जांच में एवियन इन्फ्लूएंजा बताया गया था, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया। अब प्रयोगशाला में जांच परीक्षणों में मायकोप्लाज़्मा संक्रमण और कैनाइन डिस्टेंपर वायरस की पुष्टि हुई। ये दोनों ही बीमारियां मौजूदा परिस्थितियों में और तेजी से बढ़ सकती है। आइए जानते हैं कि आखिर किन वजहों से बाघों की मौत होने लगी?

इस घटना के बाद दोनों सेंटर को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। परिसर को कीटाणुरहित किया गया, बचे हुए बाघों को क्वारंटीन में रखा गया और टीकाकरण व स्वास्थ्य निगरानी की प्रक्रिया शुरू की गई। कर्मचारियों और हाल ही में आए पर्यटकों की भी एहतियातन निगरानी की जा रही है।

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टाइगर किंगडम के अधिकारियों ने बताया कि बंदी वातावरण में मायकोप्लाज़्मा संक्रमण और कैनाइन डिस्टेंपर वायरस का प्रसार बहुत तेजी से होता है। यही वजह है कि दोनों यूनिट को तुरंत कीटाणुशोधन और रोग नियंत्रण के लिए बंद कर दिया गया और एहतियात के तौर पर कर्मचारियों तथा हाल ही में आए आगंतुकों की निगरानी की जा रही है।

'बाघों को छूना और सहलाना सिर्फ पर्यटकों को अच्छा लगता है'

जंगल कथा के अन्तर्गत चीता समेत कई पुस्तकें लिख चुके कबीर संजय पत्रिका से बताते हैं, बहुत सारे लोग थाइलैंड के टाइगर किंंगडम में बाघों के साथ फोटो खिंचाने के लिए थाईलैंड जाते हैं। यहां पर वे विशालकाय बाघों को छूते-सहलाते, मनचाहे पोज मारते हैं। इन सुखद स्मृतियों को वे हमेशा के लिए समेट लेना चाहते हैं। पर खुद बाघों के लिए यह स्मृतियां कुछ खास सुखद नहीं।

'बाघ शिकारी जानवर हैं, पालतू बनाने की कोशिश ठीक नहीं'

वह बाघों को पालतू बनाने की कोशिश के बारे में कहते हैं कि बाघ पूरी तरह से वन्यजीव हैं और वे खाद्य श्रृंखला में सबसे ऊपर रहने वाले शिकारी जानवर होते हैं। उन्हें पालतू बनाने की तमाम कोशिशों के बावजूद उनके अंदर का वन्य जीव बचा रहता है। कुत्ते-बिल्लियों की तरह ही उनके बीमारी का आसानी से पता लगाना भी मुश्किल होता है।

एकांतप्रिय जानवर होते हैं बाघ

उन्होंने बताया कि सिर्फ दो सप्ताह की छोटी अवधि में ही 72 बाघों की मौत ने एक बार फिर से एक ही स्थान पर बिग कैट को बड़ी संख्या में रखने के नतीजों को लेकर लोगों को आशंकित कर दिया है। जंगल में बाघ अपने खास इलाके में रहता है। बाघ एकांतप्रिय जानवर होता है और यही वजह है कि उनका आपस में आमना-सामना कम ही मौकों पर होता है। इसके चलते उन्हें जंगल के खुले माहौल में संक्रमण वाली बीमारी होने की संभावना न्यूनतम होती है।

'इंसानों के संपर्क से प्रतिरोधी क्षमता होती है कमजोर'

वन्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के पर्यटन केंद्रों में अत्यधिक प्रजनन, मनुष्यों से नजदीकी संपर्क और तनावपूर्ण परिस्थितियां जानवरों की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देती हैं, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। यह घटना बंदी वन्यजीव पर्यटन मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करती है और पशु कल्याण व जैव-सुरक्षा मानकों की सख्त समीक्षा की मांग करती है।

थाइलैंड में किस प्रजाति के बाघ पाए जाते हैं?

थाईलैंड में पाए जाने वाली बाघ प्रजाति इंडोचाइनीज है। इसे पैंथेरा टाइग्रिस (Panthera tigris) के नाम से जाना जाता है। थाईलैंड के जंगलों में अभी भी यह प्रजाति पाई जाती है। यह हमारे यहां पाई जाने वाली रॉयल बंगाल टाइगर प्रजाति से थोड़ा अलग है। बंगाल टाइगर से यह थोड़ा छोटा और गहरे रंग की धारियों वाला होता है। थाईलैंड में पर्यटकों के मनोरंजन के लिए बाघों की तुलनात्मक तौर पर बड़ी आबादी पार्कों में रखी जाती है। गौरतलब है कि इंडो चाइनीज टाइगर की आबादी बहुत तेजी से कम होती जा रही है।

'पालतू बनाने के लिए बाघों के साथ की जाती है क्रूर हरकत'

संजय बताते हैं कि थाईलैंड के मनोरंजन पार्कों में रखे जाने वाले इन बाघों के साथ किए जाने वाले सलूक और दुर्व्यवहार के बारे में तमाम वन्यजीवन प्रेमियों की ओर से सवाल उठाए जाते रहे हैं। पर्यटकों के मनोरंजन के अनुकूल बनाने के लिए बाघ शावकों को बहुत कम उम्र में ही उनकी मां से अलग कर दिया जाता है और उन्हें पालतू बनाने की कोशिश की जाती है। वह यह भी कहते हैं कि वयस्क बाघों को भारी मात्रा में नशा दिया जाता है, ताकि वे किसी तरह का हमला करने के काबिल नहीं रहें। इसके साथ ही उन्हें अलग-अलग किस्म से दंड देकर भी भयभीत रखा जाता है और मनचाहा काम कराने का प्रयास होता है। पर्यटकों को खुशी देने वाले बाघ खुद तमाम दुर्व्यहार का शिकार होते हैं।

थाइलैंड के टाइगर किंगडम में 2009 में थे सिर्फ 33 बाघ

संजय की बात को हमारे वाइल्डलाइफ रिसर्च और वेटरनरी विशेषज्ञता के निदेशक डॉ. जान श्मिट-बर्बैक इशारों ही इशारों में समझाते हुए थाइलैंड की स्थानीय मीडिया से बातचीत में कहा, 'बाघों का स्थान कैद में नहीं है। मैं 2009 से इस टाइगर किंगडम का दौरा करता रहा हूं, जब यहां सिर्फ 33 बाघ थे। उस समय के आकलन को हमारी ‘वाइल्डलाइफ ऑन अ टाइट रोप’ रिपोर्ट और एक समीक्षित शोध पत्र में शामिल किया गया था। बाद में ‘टाइगर सेल्फीज एक्सपोज्ड’ रिपोर्ट के तहत हमने 17 प्रमुख टाइगर मनोरंजन स्थलों का गुप्त रूप से दौरा किया, जिनमें चियांग माई का टाइगर किंगडम भी शामिल था। सभी 17 स्थलों पर क्रूर और अप्राकृतिक गतिविधियां कराई जाती थीं। टाइगर किंगडम उन जगहों में था जहां पर्यटकों को बड़े बाघों और शावकों के साथ सेल्फी लेने की अनुमति थी।

देशअनुमानित बाघों की संख्याप्रमुख प्रजाति
भारत3,700बंगाल टाइगर
रूस650साइबेरियन टाइगर
इंडोनेशिया600सुमात्रन टाइगर
नेपाल360बंगाल टाइगर
भूटान150बंगाल टाइगर
बांग्लादेश120बंगाल टाइगर
थाईलैंड200इंडो चाइनीज टाइगर
मलेशिया150मलायन टाइगर
म्यांमार30इंडो चाइनीज टाइगर
चीन50साइबेरियन टाइगर

दुनिया में बाघों की पाई जाती हैं 5 प्रजातियां

दुनिया में पांच किस्मों के बाघ पाए जाते हैं। बाघों की बहुतायत एशियाई देशों में सर्वाधिक है। उनकी प्रमुख प्रजातियां बंगाल टाइगर, इंडोचाइनीज टाइगर, मलायन टाइगर, साइबेरियन टाइगर (अमूर टाइगर) और सुमात्रन टाइगर हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा बाघ भारत में ही पाए जाते हैं।

जंगल के राजा गिर में सिमट कर रह गए!

संजय बताते हैं कि भारत में पाई जाने वाली एशियाटिक लायन प्रजाति के संरक्षण को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुनिया में शेरों की दो प्रजाति पाई जाती है। एक अफ्रीकी शेर, दूसरी एशियाई शेर। एशियाई शेरों की यह प्रजाति कभी भारत के एक बड़े भू-भाग में पाई जाती थी। लेकिन, शेरों के भारी शिकार और पर्यावास समाप्त होने के चलते इनकी संख्या कम होती गई। अब सिर्फ गुजरात के गिर में ही इनकी आबादी रहती है। एक ही स्थान पर शेरों की पूरी आबादी रहने के चलते इस बात की आशंका जताई जाती रही है कि अगर यहां पर कोई सीडीवी जैसा संक्रमण होता है तो सभी शेर खतरे में आ सकते हैं। इसलिए शेरों की कुछ आबादी को दूसरी जगह बसाने को लेकर लंबी लड़ाई चली। वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके पक्ष में फैसला भी दिया जा चुका है। लेकिन, अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं हो पाया है। थाईलैंड में बाघों की मौत के बाद एक बार फिर से शेरों की आबादी के कुछ हिस्से को अन्यत्र बसाए जाने की जरूरत बढ़ गई है। ताकि, अगर आबादी के किसी एक हिस्से में वायरस संक्रमण होता भी है तो दूसरे हिस्से को उससे अछूता रखा जा सके।

वर्षशेरों की संख्या
2015523
2020674
2023750

नोट: भारत में शेरों की आधिकारिक गणना हर पाँच साल में की जाती है।

Published on:
27 Feb 2026 06:00 am
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