
Rakshabandhan 2026 : दस साल की बहन पालने में लेटे अपने एक साल के भाई की कलाई पर धागा बांधती है और कहती है, 'भैया, मेरी रक्षा करना'; और वह बच्चा उस समय रो रहा होता है। रस्म के नाते यह दृश्य आज भी प्यारा लग सकता है, पर उपहारों और मिठाइयों की चहल-पहल के बीच यह चुपचाप एक सवाल भी पूछता है, जिसे अक्सर बाज़ार की आवाज़ में हम अनसुना कर दिया जाता है: रक्षा आख़िर किसे चाहिए, और किससे?
ख़ासकर आज, जब बहुत-सी महिलाएं स्वयं कमा रही हैं और कई घरों में पिता और भाई भी उन्हीं पर आश्रित हैं। इस पर्व का इतिहास सर्वविदित है और वह बताता है कि रक्षाबंधन बहन और भाई के बीच का ही पर्व कभी नहीं रहा। भविष्यपुराण में देव-दानव युद्ध के समय इंद्राणी का तैयार किया हुआ रक्षासूत्र गुरु बृहस्पति, इंद्र की कलाई पर बांधते हैं: दो पुरुष, और उनमें भी एक गुरु और एक शिष्य। जिस मंत्र से यह बाँधा जाता है, वही कहता है कि जैसे राजा बलि को धर्म के बंधन में बाँधा गया था, वैसे ही तुम्हें बाँधा जा रहा है, अब संकल्प से विचलित न होना; और उसी कथा में माता लक्ष्मी ब्राह्मण का रूप धरकर बलि को यह धागा बाँधती हैं।
श्रावणी पूर्णिमा पर ब्राह्मण अपने जजमानों की कलाई पर रक्षा बांधकर उन्हें स्मरण कराते थे कि वे निस्वार्थ भाव से धर्म में अडिग रहेंगे। लेकिन कथाओं और पुराणों के इन ब्योरों में उलझने से बेहतर है सीधे उस मनोविज्ञान तक पहुँचना जो इस पर्व की जड़ में है।
रक्षा की ज़रूरत केवल उसे होती है जो दुर्बल है। कोई यह नहीं मानेगा कि किसी धनकुबेर को या किसी देश की सेना को रक्षा चाहिए। तो यदि बहनों के लिए, स्त्रियों के लिए एक रक्षा-दिवस की ज़रूरत पड़ी, तो यह दर्शाता है कि समाज के एक बड़े वर्ग को इतना सशक्त कभी बनने ही नहीं दिया गया कि उसे रक्षा न मांगनी पड़े। भारत में स्त्री को शक्ति कहा गया है; उसी शक्ति को शक्ति से वंचित रखना धर्म नहीं। और वास्तविक रक्षा तो वही है जिसके बाद रक्षित को फिर किसी से रक्षा मांगनी न पड़े; असली रक्षा सशक्तिकरण है।
तो आज सचमुच दुर्बल कौन है? आज की स्त्रियां नहीं, और न ही उनके बाद आने वाली पीढ़ी की लड़कियां, जो लड़कों जितनी ही सक्षम हैं। दुर्बल है वह गौरैया, जो शहरों से लगभग ग़ायब हो चुकी है; और गौरैया शोषित प्रकृति का, दुर्बल पड़ी स्त्री-शक्ति का एक बहुत मार्मिक प्रतीक है। कहते हैं, कोई शहर जितना विकसित होता गया, गौरैया उतनी ही वहाँ से मिटती गई; दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में तो उसकी आबादी का बमुश्किल बीस प्रतिशत बची है, क्योंकि घोंसले की जगह, चुग्गे के कीड़े और हरियाली, सब लुप्त हो चले। आज गौरैया ही वह बहन है, और हर मनुष्य को, अपने शारीरिक स्त्री या पुरुष होने से परे, उसका भाई बनना है। जीवों की प्रजातियाँ सामान्य दर से दस से सौ गुना तेज़ी से लुप्त हो रही हैं, और यह विनाश पूरी तरह मानवजनित है; जलवायु परिवर्तन भी हमारा ही किया हुआ है। नदियों को, पर्वतों को और समुद्रों को आज रक्षा चाहिए।
जो लुप्त हो रहा है, वह केवल भौतिक नहीं है। आज पूरी दुनिया का साझा आदर्श यही बनता जा रहा है कि उपभोग करो और खुश रहो। मानो मनुष्य होने का प्रयोजन बस उपभोग हो। आत्म-निरीक्षण की सहज प्रवृत्ति, सीधी-सादी ईमानदारी, यही आज लुप्तप्राय है। धर्म का मर्म कहीं गिरवी रख दिया गया है, और उसकी जगह या तो भावुक भक्ति का सस्तापन है या रहस्यवाद और तंत्र-मंत्र का अंधकार; जबकि असली अध्यात्म, जो आत्म-अवलोकन ही है, सबसे ज़्यादा रक्षा मांगता है। वेदान्त कहता है कि मन को शुद्धि और शांति की ओर ले जाना ही धर्म है, और धर्म बिना ज़िम्मेदारी के होता ही नहीं। यह ज़िम्मेदारी अपने परिवार के दो-चार लोगों तक सीमित नहीं रह सकती।
पिछले कुछ दशकों में दुनिया भर में जिसे हम विकास कहते हैं, उसका बड़ा हिस्सा पृथ्वी को उजाड़कर ही खड़ा किया गया है; धरती की प्राकृतिक संपदा नष्ट की गई और उस नाश को राष्ट्रों की आमदनी में गिन लिया गया। अपनी विरासत को बेचकर उसे नक़दी में बदल देना क्या सचमुच मुनाफ़ा है? यह पर्व तो उसका है जिसके पास सामर्थ्य है, शक्ति है, और जो उस शक्ति के साथ ज़िम्मेदारी का संकल्प उठाता है। शक्ति के साथ दायित्व आता है, और आज वह दायित्व इस पृथ्वी की रक्षा है।
रक्षासूत्र आज भी प्रासंगिक है, पर आपको सही कलाई खोजनी होगी। अपनी बहन का ध्यान रखिए, अवश्य रखिए; पर करुणा का घेरा अब फैलना चाहिए, गौरैया तक, नदी तक, और उन महीन मूल्यों तक जिनके बिना हम मनुष्य कहलाने योग्य ही नहीं। आज तो पृथ्वी स्वयं हर व्यक्ति के पास यह धागा लेकर आ सकती है और कह सकती है, 'मेरी रक्षा करो, मैं मां हूं।' इसलिए राखी बांधिए, ज़रूर बांधिए, पर पूरी समझ और ऊंची भावना के साथ; और यह देखिए कि आपके आस-पास कौन है जो सच्चा है, पर कमज़ोर पड़ रहा है। चाहे स्त्री हो या पुरुष, भाई हो या बहन, उसकी रक्षा का संकल्प ही इस पर्व के प्रति सच्चा सम्मान होगा, और इसी से रक्षाबंधन जीवित और प्रासंगिक बना रह सकता है।
(आचार्य प्रशांत दार्शनिक और लेखक हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं। आचार्य प्रशांत का कार्य आत्म-परीक्षण और समकालीन जीवन में उसके प्रयोग पर केंद्रित है।)