Amit Shah Naxalism Claim: अमित शाह के दावों के बीच बस्तर में 30 हजार से ज्यादा जवान आज भी नक्सलियों के उस खतरनाक अंडरग्राउंड नेटवर्क को खत्म करने में जुटे हैं, जिसे वर्षों में जंगलों के नीचे तैयार किया गया।
जगदलपुर@आकाश मिश्रा। Naxal News: बस्तर से नक्सलवाद के खात्मे की आधिकारिक घोषणा भले ही 31 मार्च 2026 को कर दी गई हो, लेकिन चार दशकों के दौरान नक्सलियों द्वारा खड़े किए गए दुनिया के सबसे घातक ‘अंडरग्राउंड साम्राज्य’ का खतरा अब भी बरकरार है। घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और बीहड़ों के नीचे छिपा यह भूमिगत नेटवर्क आज भी सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसे पूरी तरह नेस्तनाबूद करने के लिए बस्तर के सात जिलों में देश का सबसे बड़ा और जटिल सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है, जिसमें 30 हजार से अधिक जवान जुटे हुए हैं।
इस बेहद संवेदनशील अभियान के दौरान हाल ही में कांकेर और नारायणपुर की सीमा पर हुए आईईडी ब्लास्ट में 4 जवान शहीद भी हो चुके हैं, जो इस छिपे हुए साम्राज्य की भयावहता को दर्शाता है।
सुरक्षा विशेषज्ञों और खुफिया एजेंसियों का मानना है कि दुनिया के किसी भी अन्य उग्रवादी या विद्रोही संगठन के पास ऐसा मजबूत और व्यापक भूमिगत नेटवर्क नहीं रहा है। कांकेर से लेकर कोंटा तक फैले बस्तर के जंगलों में नक्सलियों ने हजारों गुप्त बंकर, फॉक्स होल (फायरिंग पॉइंट), भूमिगत सुरंगें और खुफिया कमांड सेंटर बना रखे हैं।
नक्सलियों ने अपनी गुरिल्ला युद्ध नीति के तहत सुरक्षा बलों की हर हलचल पर नजर रखने के लिए ऊंची पहाड़ियों के भीतर बेहद चालाकी से 'ऑब्जर्वेशन पॉइंट' तैयार किए थे। इसके साथ ही, जमीन के नीचे ऐसे फॉक्स होल बनाए गए जहां नक्सली लड़ाके कई दिनों तक बिना किसी हलचल के छिपे रह सकते थे। इन ठिकानों का इस्तेमाल न केवल छिपने के लिए, बल्कि सुरक्षा बलों पर घात लगाकर बड़े हमलों (एंबुश) को अंजाम देने के लिए किया जाता था।
नक्सलियों के इस घातक नेटवर्क का इतिहास 1980 और 1990 के दशक से जुड़ा है। नक्सली संगठन के पूर्व कमांडर बसवाराजू ने श्रीलंका के उग्रवादी संगठन लिट्टे (एलटीटीई) से आईईडी बनाने और फॉक्स होल तैयार करने की घातक तकनीक सीखी थी। इसके बाद वह इस तकनीक को बस्तर लेकर आया।
हालांकि, समय के साथ नक्सलियों ने बस्तर की भौगोलिक परिस्थितियों और घने जंगलों के हिसाब से इस तकनीक को अपग्रेड कर लिट्टे से भी अधिक खतरनाक और मारक बना दिया। यही कारण है कि आज भी जंगलों में खोजी अभियान के दौरान जवानों को सबसे बड़ा नुकसान इन्हीं भूमिगत आईईडी नेटवर्क से हो रहा है।
बीजापुर जिले में स्थित 'कर्रेगुट्टा हिल्स' नक्सलियों का सबसे बड़ा और सुरक्षित अंडरग्राउंड मॉडल माना जाता है। पिछले साल सुरक्षा बलों ने यहां लगातार 15 दिनों तक एक व्यापक ऑपरेशन चलाया था। इस दौरान पहाड़ियों के भीतर मिले बंकरों की बनावट और मजबूती देखकर जवान भी हैरान रह गए थे।
ये बंकर कंक्रीट और प्राकृतिक पत्थरों से इस तरह ढके गए थे कि इनके ऊपर से गुजरने पर भी नीचे किसी सुरंग के होने का अंदाजा लगाना नामुमकिन था। इन बंकरों के भीतर आधुनिक हथियार, गोला-बारूद, वायरलेस संचार उपकरण, जीवन रक्षक दवाइयां और महीनों का राशन जमा था, जिससे साफ है कि नक्सलियों ने इसे लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए तैयार किया था।
जैसे-जैसे सुरक्षा बल बीजापुर से लेकर अबूझमाड़ के अबूझ जंगलों के भीतर दाखिल हो रहे हैं, नक्सलियों के इस साम्राज्य के आर्थिक पहलू भी उजागर हो रहे हैं। अब खुफिया ठिकानों और डंपिंग पॉइंट्स से केवल बंदूकें या बारूद ही नहीं, बल्कि भारी मात्रा में नकदी (कैश) और सोना (गोल्ड) भी बरामद हो रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, यह नक्सलियों का 'वार चेस्ट' (आर्थिक नेटवर्क) था, जिसे उन्होंने भविष्य के लिए छिपाकर रखा था। अकेले बीजापुर जिले के भूमिगत ठिकानों से अब तक 20 करोड़ रुपए से अधिक की नकदी और बेनामी सामग्री जब्त की जा चुकी है। 30 हजार जवानों का यह महा-अभियान तब तक जारी रहेगा, जब तक बस्तर की धरती के नीचे दबे इस अंतिम बारूदी तंत्र को पूरी तरह उखाड़ नहीं फेंक दिया जाता।
भारत सरकार ने देश से नक्सलवाद के पूरी तरह खात्मे के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की थी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बस्तर में नक्सलवाद के अंत का दावा भी किया था। लेकिन जमीनी हकीकत अब भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। डेडलाइन के बाद भी लगातार नक्सलियों के सरेंडर की खबरें सामने आ रही हैं, वहीं कई इलाकों में आईईडी ब्लास्ट और
सुरक्षाबलों पर हमले यह संकेत दे रहे हैं कि नक्सलियों का नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि संगठन भले कमजोर पड़ा हो, लेकिन जंगलों में छिपा उसका भूमिगत ढांचा, हथियारों के डंप और बारूदी तंत्र अब भी सक्रिय खतरा बने हुए हैं।