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परंपरा से प्रोफेशन तक! 8वीं पास महिला का कमाल, गांव की इस कला को देशभर में पहुंचाया

Self Employment Women: छत्तीसगढ़ के कोटानपानी गांव की सुखमिला पैकरा ने पारंपरिक कला को नवाचार के साथ नई पहचान दी है। 8वीं पास होने के बावजूद उन्होंने खजूर के पत्तों से बने उत्पादों को देशभर में पहुंचाया।

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Apr 12, 2026
परंपरा से नवाचार तक (photo source- Patrika)
परंपरा से नवाचार तक (photo source- Patrika)

छत्तीसगढ़ के छोटे से गांव कोटानपानी, जो विष्णुदेव साय के गृह क्षेत्र के पास स्थित है, आज अपनी पारंपरिक कला के कारण पूरे प्रदेश में पहचान बना चुका है। इस पहचान के केंद्र में हैं 51 वर्षीय सुखमिला पैकरा, जिन्होंने खजूर के पत्तों और कासी के पौधों से बनने वाली बॉस्केट, टोकनी और बैग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।

गांव से निकली कला, देशभर में पहचान

सुखमिला आत्मविश्वास के साथ कहती हैं कि उनके गांव से कई हुनरमंद लोग निकले हैं, जो देशभर में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके बनाए उत्पाद न सिर्फ पूरे प्रदेश में लोकप्रिय हैं, बल्कि राजधानी दिल्ली तक में उनकी मांग है।

कम पढ़ाई, लेकिन बड़ा हुनर

सिर्फ आठवीं तक पढ़ाई करने वाली सुखमिला का हुनर इतना मजबूत है कि कॉर्पोरेट क्षेत्र के लोग भी उनसे सीखने के लिए महीनों इंतजार करते हैं। खजूर के पत्तों और कासी से टोकनी और बॉस्केट बनाने में उनकी महारत ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई है।

महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर

सुखमिला ने अपने हुनर को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने गांव और आसपास की कई महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार का रास्ता दिखाया। आज कई महिलाएं इस कला के माध्यम से आत्मनिर्भर बन रही हैं।

परंपरा में नवाचार का रंग

सुखमिला बताती हैं कि पहले उनके पूर्वज पारंपरिक तरीके से टोकनी बनाते थे, लेकिन उन्होंने समय के साथ इसमें बदलाव किया। डिजाइन में नए प्रयोग किए और रंगीन ऊन का इस्तेमाल कर उत्पादों को आकर्षक बनाया, जिससे बाजार में उनकी मांग बढ़ गई।

सीखने की कहानी: घर से शुरू हुआ सफर

सुखमिला कहती हैं कि पहले वे सिर्फ घर के काम में व्यस्त रहती थीं। घर के बुजुर्गों को टोकनी बनाते देखकर उन्होंने यह कला सीखी। पिछले 12 वर्षों से वे लगातार इस काम को कर रही हैं और अब यह उनकी पहचान बन चुका है।

खेत से कारीगरी तक का संतुलन

सुखमिला का जीवन सिर्फ कारीगरी तक सीमित नहीं है। वे खेतों में भी काम करती हैं, महुआ भी बीनती हैं और घर की जिम्मेदारियां भी निभाती हैं। इसके साथ-साथ समय निकालकर टोकनी, बैग और गुलदस्ते बनाती हैं। उनके परिवार के पुरुष भी इस काम में उनका सहयोग करते हैं।

अब दुकान खोलने का सपना

अब सुखमिला का सपना है कि वे अपनी एक दुकान खोलें, जहां अपने उत्पाद बेचने के साथ-साथ और महिलाओं को इस कला की ट्रेनिंग भी दे सकें। उनका मानना है कि अगर सही अवसर मिले, तो यह पारंपरिक कला कई परिवारों की आर्थिक स्थिति बदल सकती है।

Published on:
12 Apr 2026 04:15 pm