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राजा ने बनवाया था ये रहस्यमयी शिव मंदिर, आज भी नहीं सूखता चमत्कारी जलकुंड, जानें कांकेर के इस शिवधाम की अनसुनी कहानी

Mysterious Temple: कांकेर के घने जंगल और पहाड़ों के बीच करीब 11वीं सदी का एक रहस्यमयी शिवधाम आज भी लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि पुजारी के सपने के बाद हुई खुदाई में प्राचीन शिवलिंग और दुर्लभ मूर्तियां मिली थीं।
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Updated: 6 Sep 2026, 11:52 AM IST
Kanker Shiva Dham
शिवधाम (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Ancient Shiva Temple: कांकेर जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर रिसेवाड़ा के घने जंगल और पहाड़ों के बीच एक ऐसा शिवधाम स्थित है, जिसका इतिहास सोमवंशी काल से जुड़ा हुआ है। देऊर मंदिर के बारे में आम लोग ज्यादा नहीं जानते, लेकिन बुजुर्ग इसे चमत्कारिक मानते हैं। लगभग 11वीं सदी की बात है, जब रिसेवाड़ा गांव पहले पहाड़ी की तलहटी में बसा हुआ था। पीने के पानी की किल्लत और जंगली जानवरों के आतंक से जूझ रहे ग्रामीणों ने गांव को सड़क किनारे स्थानांतरित कर लिया।

हालांकि, नई जगह पर भी रात में शेर की दहाड़ से ग्रामीणों में दहशत बनी रहती थी। इसी दौरान गांव के पुजारी को लगातार एक सपना आने लगा। सपने में देवी-देवता पहाड़ के नीचे एक तालाब के पास जमीन में धंसे होने की बात कहते हुए उन्हें बाहर निकालने की पुकार कर रहे थे। गांव वालों ने पंचायत बुलाई और तत्काल उसी जगह पर खुदाई शुरू कर दी। हफ्तों की अथक खुदाई के बाद वहां से काले पत्थर से बना एक प्राचीन शिवलिंग और कई दुर्लभ मूर्तियां बाहर निकलीं।

इस अपूर्व खोज की खबर कांकेर रियासत के राजा तक पहुंची। सोमवंशी राजा अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचे और विधि-विधान से उसी स्थान पर मंदिर की स्थापना कराई। तभी से इस स्थल को देऊर मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।

कभी आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र रहा

ग्रामीणों के अनुसार, यहां स्थित करीब एक हजार वर्ष पुराना प्राचीन मंदिर उपेक्षा के कारण अब खंडहर में तब्दील हो रहा है। यह स्थल कभी ग्रामीणों की आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। ग्रामीणों के अनुसार, मंदिर की स्थापना के बाद एक अपूर्व घटना हुई। मंदिर परिसर में एक प्राकृतिक जलस्रोत फूट पड़ा।

इस जलकुंड ने गांव की पानी की समस्या को स्थायी रूप से समाप्त कर दिया। आज भी जब आसपास के सभी कुएं और नाले सूख जाते हैं, तब भी इस कुंड का पानी निरंतर बारह महीने बहता रहता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि सावन मास में यहां जल अर्पित करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

ऐतिहासिक विरासत को पहुंची क्षति

यह ऐतिहासिक धरोहर वर्तमान में अनदेखी का शिकार है। मंदिर की कई प्राचीन मूर्तियां अब खुले में पड़ी हैं, जिनमें से कुछ चोरी भी हो चुकी हैं। इससे इसकी ऐतिहासिक विरासत को क्षति पहुंची है। मंदिर परिसर और पहाड़ी पर कुकर और गोइहा जैसे आकार के विशाल पत्थर आज भी स्थानीय लोगों के लिए रहस्य बने हुए हैं।

इस प्राचीन स्थल के संरक्षण और जीर्णोद्धार की तत्काल आवश्यकता है, ताकि इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को सुरक्षित रखा जा सके।

बन सकता है बड़ा हेरिटेज टूरिज्म स्पॉट

  • पहुंच मार्ग: गांव से मंदिर तक 1.5 किलोमीटर का पक्का रास्ता और साइनेज बनाया जाए।
  • जलकुंड संरक्षण: कुंड के चारों ओर घाट और स्नान के लिए उचित व्यवस्था की जाए।
  • इंटरप्रिटेशन सेंटर: एक छोटा शेड बनाया जाए, जहां मंदिर का इतिहास, सोमवंशी काल की जानकारी और मूर्तियों की प्रतिकृतियां प्रदर्शित की जाएं।
  • रोजगार: ग्रामीणों के लिए प्रसाद, जैविक उत्पाद और गाइड के रूप में रोजगार के अवसर विकसित किए जा सकते हैं।
  • सुरक्षा: मंदिर परिसर में फेंसिंग की जाए, ताकि प्राचीन मूर्तियों की चोरी रोकी जा सके।

कैसे पहुंचे

कांकेर से नरहरपुर मार्ग पर रिसेवाड़ा गांव पहुंचा जा सकता है। गांव से करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल खेतों को पार कर पहाड़ की तलहटी में स्थित मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। स्थानीय ग्रामीण की मदद से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।

Updated on:
6 Sep 2026, 11:52 AM IST
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