
शेख तैयब ताहिर/Bastar Special Story: आज पूरी दुनिया में Vegan Diet यानी पूरी तरह वनस्पति आधारित खानपान का चलन तेजी से बढ़ रहा है। सेहत का ख्याल रखने, पर्यावरण को बचाने और पशु कल्याण के प्रति जागरूकता के चलते लोग अपने खाने में बदलाव कर रहे हैं। कोई दूध और उससे बने उत्पाद छोड़ रहा है, तो कोई मांसाहार से दूरी बनाकर फल, सब्जियां, अनाज और पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों को अपनी डाइट का हिस्सा बना रहा है। लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर में प्रकृति से जुड़ा ऐसा खानपान कोई नया ट्रेंड नहीं है।
यहां की पारंपरिक रसोई में पीढ़ियों से महुआ के फूल, जंगल के कंद-मूल, मौसमी साग, बांस की कोपलें और दूसरी वन उपज से बने व्यंजन शामिल रहे हैं। बस्तर के कई पारंपरिक व्यंजन ऐसे हैं, जिनमें मांस, दूध या दूध से बने उत्पादों का इस्तेमाल नहीं होता। जंगल से मिलने वाली सामग्री और स्थानीय अनाज से तैयार ये पकवान यहां की जीवनशैली, संस्कृति और प्रकृति के साथ लोगों के रिश्ते को दिखाते हैं। यही वजह है कि आज जब दुनिया प्लांट बेस्ड फूड की ओर बढ़ रही है, तब बस्तर की पारंपरिक थाली भी एक खास चर्चा का विषय बन सकती है।
Vegan Diet का मतलब केवल शाकाहारी भोजन करना नहीं है। इसमें मांस, मछली, अंडे, दूध, दही, घी और शहद जैसे पशु-आधारित खाद्य पदार्थों से भी परहेज किया जाता है। इसके बजाय फल, सब्जियां, दालें, अनाज, बीज, मेवे और पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थ खाए जाते हैं। दुनिया के कई देशों में इसे अब एक आधुनिक लाइफस्टाइल के रूप में देखा जा रहा है। सोशल मीडिया से लेकर फिटनेस और फूड इंडस्ट्री तक Vegan Diet की चर्चा है।
वहीं बस्तर के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में जंगल से मिलने वाले कई खाद्य पदार्थ लंबे समय से रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा रहे हैं। यहां भोजन केवल पेट भरने का जरिया नहीं, बल्कि स्थानीय मौसम, जंगल और उपलब्ध संसाधनों से जुड़ी जीवनशैली का हिस्सा है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि बस्तर के सभी लोग पूरी तरह Vegan हैं। यहां खानपान की आदतें समुदाय, परिवार, क्षेत्र और उपलब्धता के अनुसार अलग-अलग हैं। लेकिन पारंपरिक भोजन में वनस्पति आधारित व्यंजनों की मजबूत मौजूदगी इस क्षेत्र को खास बनाती है।
बस्तर की पहचान जंगल और उसकी उपज से गहराई से जुड़ी है। महुआ इसका एक अहम हिस्सा है। महुआ के फूलों का इस्तेमाल केवल पारंपरिक पेय पदार्थों तक सीमित नहीं है, बल्कि इनसे कई तरह के व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। महुआ के लड्डू इसका एक उदाहरण हैं। महुआ के फूलों में प्राकृतिक मिठास होती है। इन्हें सुखाकर और स्थानीय तरीके से तैयार करके भोजन में इस्तेमाल किया जाता है। जंगल से मिलने वाला यह फूल स्थानीय लोगों के लिए खाद्य सामग्री के साथ आजीविका और परंपरा का भी हिस्सा है। इसी तरह इमली, विभिन्न जंगली फल और मौसमी वन उपज भी स्थानीय भोजन को अलग स्वाद देते हैं।
बस्तर के जंगलों में कई तरह के खाद्य कंद-मूल और पत्तेदार साग मिलते हैं। स्थानीय लोग मौसम और उपलब्धता के अनुसार इनका उपयोग भोजन में करते आए हैं। जंगल से मिलने वाली जड़ों और कंदों को साफ करके, उबालकर या स्थानीय तरीके से पकाकर खाया जाता है। बांस की कोपलें भी यहां के पारंपरिक खानपान का हिस्सा हैं। इनके अलावा अलग-अलग मौसम में मिलने वाली जंगली पत्तेदार सब्जियां और अन्य वनस्पतियां भोजन में विविधता लाती हैं।
इन खाद्य पदार्थों की खासियत यह है कि इनका इस्तेमाल स्थानीय जानकारी और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के आधार पर किया जाता है। बस्तर की यह खानपान शैली बताती है कि जंगल केवल लकड़ी और दूसरे संसाधनों का स्रोत नहीं है, बल्कि स्थानीय समुदायों के भोजन और जीवन का भी महत्वपूर्ण आधार है।
बस्तर के पारंपरिक भोजन में चावल की अहम भूमिका है। चावल के साथ दाल, मौसमी साग और स्थानीय सब्जियां मिलकर रोजमर्रा की थाली तैयार करते हैं। यहां पेय यानी चावल से तैयार पतला पारंपरिक भोजन भी प्रचलित है, जिसे स्थानीय तौर पर पेज कहा जाता है। पेज खासकर गर्मी और मेहनत वाले काम के दौरान शरीर को तरलता देने वाला भोजन माना जाता है। इसे स्थानीय खानपान और मौसम के हिसाब से उपयोग किया जाता है। इस तरह चावल, दाल, साग और वन उपज से तैयार भोजन बस्तर की रसोई को अपनी अलग पहचान देता है।
पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों में फाइबर, विटामिन, खनिज और ऊर्जा देने वाले पोषक तत्व मौजूद होते हैं। दालें प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं, जबकि हरी पत्तेदार सब्जियों से आयरन और दूसरे जरूरी पोषक तत्व मिल सकते हैं। फल और कंद-मूल भी भोजन में पोषण और विविधता जोड़ते हैं। हालांकि, पूरी तरह Vegan Diet अपनाने वालों के लिए संतुलित पोषण पर ध्यान देना जरूरी है। खासकर विटामिन B12, कैल्शियम, आयरन और पर्याप्त प्रोटीन की मात्रा सुनिश्चित करनी होती है। केवल मांस और दूध छोड़ देना संतुलित आहार की गारंटी नहीं है। इसके लिए सही खाद्य विकल्प और पोषण संबंधी जानकारी जरूरी है।
बस्तर की पारंपरिक भोजन संस्कृति की एक खास बात यह भी है कि यहां मौसम और जंगल में उपलब्ध खाद्य सामग्री के अनुसार खानपान बदलता रहता है। कौन-सा फल या साग किस मौसम में मिलता है, किस कंद को किस तरह पकाना है और जंगल से मिलने वाली उपज का उपयोग कैसे करना है, इसका पारंपरिक ज्ञान पीढ़ियों से आगे बढ़ता रहा है। यह परंपरा जंगल पर निर्भरता के साथ उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी याद दिलाती है। वन उपज का जरूरत के अनुसार और टिकाऊ तरीके से संग्रहण जरूरी है, ताकि प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव न पड़े और आने वाली पीढ़ियों को भी इनका लाभ मिल सके।
पोषण विशेषज्ञ और शोधकर्ता लक्ष्मण पोयाम के अनुसार, बस्तर के पारंपरिक खानपान में महुआ के फूल, इमली, कंद-मूल, मौसमी साग और जंगल में मिलने वाले खाद्य पौधों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्थानीय अनाज और वन उपज से तैयार कई व्यंजन पूरी तरह वनस्पति आधारित होते हैं। ये खाद्य परंपराएं आज चर्चा में आए Vegan और Plant Based Food की अवधारणा से काफी हद तक मेल खाती हैं। उनके मुताबिक, इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों को केवल पुराने खानपान के रूप में देखने के बजाय उनके पोषण मूल्य और स्थानीय महत्व को समझना भी जरूरी है। साथ ही, किसी भी तरह की डाइट अपनाते समय संतुलित पोषण का ध्यान रखना चाहिए।
आज जब दुनिया सेहत और पर्यावरण को ध्यान में रखकर खानपान के नए विकल्प तलाश रही है, तब बस्तर की पारंपरिक रसोई हमें प्रकृति से जुड़े भोजन की पुरानी समझ से परिचित कराती है। महुआ के फूल, जंगल के कंद-मूल, बांस की कोपलें, मौसमी साग और स्थानीय अनाज यहां के भोजन को एक अलग पहचान देते हैं। बस्तर की हर थाली Vegan नहीं है, लेकिन यहां की खानपान परंपरा में वनस्पति आधारित भोजन की मजबूत मौजूदगी जरूर है। यही इस खास कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है कि जिसे दुनिया आज नए ट्रेंड के रूप में देख रही है, उससे मिलती-जुलती भोजन परंपराएं बस्तर में लंबे समय से स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा रही हैं।