Bastar Wooden Art: बस्तर की वुडेन आर्ट सागौन की लकड़ी पर बारीक नक्काशी के जरिए कारीगरों की जिंदगी बदल रही है। गांवों से निकलकर यह कला अब देश-विदेश में पहचान बना रही है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर की पहचान सिर्फ उसकी प्राकृतिक खूबसूरती या आदिवासी संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के कारीगरों के हाथों में बसती वह कला भी है, जो लकड़ी को जीवंत बना देती है। यह सिर्फ कारीगरी नहीं, बल्कि उन हाथों की कहानी है जो हर दिन अपने हुनर से भविष्य गढ़ रहे हैं। हर नक्काशी में उम्मीद है, हर डिजाइन में संघर्ष और हर तैयार फर्नीचर में एक बेहतर कल की झलक दिखाई देती है।
बस्तर की गलियों और छोटे-छोटे वर्कशॉप में गूंजती हथौड़ी और छेनी की आवाज अब सिर्फ काम का संकेत नहीं, बल्कि बदलती जिंदगी की कहानी बन चुकी है। सागौन की लकड़ी पर उकेरी जा रही बारीक नक्काशी ने यहां के कारीगरों को नया सम्मान और स्थायी रोजगार दिया है। पहले जहां इस पेशे को सीमित नजरों से देखा जाता था, वहीं आज यह कारीगरी कई परिवारों की आर्थिक रीढ़ बन चुकी है। गांवों से निकलकर कारीगर अब शहरों तक पहुंचे हैं और अपनी पहचान बना रहे हैं।
करीब 25 वर्षों से इस कला से जुड़े कारीगर लैखूराम बघेल बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब इस काम को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था। लेकिन आज यही हुनर उनके परिवार की आजीविका का मुख्य साधन बन गया है। भोंड जैसे गांवों से आए कारीगर—जगबंधु, राम बघेल, चैतू बघेल, सुखमन नाग और महेंद्र नाग—ने अपनी मेहनत और लगन से इस कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। ये कारीगर अब जगदलपुर जैसे शहरों में काम कर न केवल खुद आत्मनिर्भर बने हैं, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य को भी संवार रहे हैं।
बस्तर की वुडेन आर्ट केवल फर्नीचर नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और परंपराओं का जीवंत रूप है। सागौन की मजबूत लकड़ी पर उकेरे गए भगवान गणेश, राम दरबार, आदिवासी जीवन और प्राकृतिक दृश्य हर कृति को खास बनाते हैं। हर डिजाइन में कारीगरों की भावनाएं और उनकी मेहनत झलकती है। तकनीकी दृष्टि से भी सागौन लकड़ी बेहद उपयुक्त मानी जाती है—यह मजबूत होती है, दीमक-रोधी होती है और इसमें महीन नक्काशी करना आसान होता है।
आज बस्तर में बने नक्काशीदार बेड, दीवान और अन्य फर्नीचर की मांग देशभर में तेजी से बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, केरल और पंजाब जैसे राज्यों तक यह कला अपनी पहुंच बना चुकी है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए भी ग्राहक इन उत्पादों को खरीद रहे हैं। कीमत की बात करें तो दीवान 14 हजार से 20 हजार रुपए और बेड 32 हजार से लेकर 80 हजार रुपए तक में बिक रहे हैं। कीमत ज्यादा होने के बावजूद ग्राहकों का भरोसा इस कला पर बना हुआ है, जो इसकी गुणवत्ता और लोकप्रियता को दर्शाता है।
बस्तर की इस कला को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल चुकी है। क्षेत्र के कारीगर कालिपद मंडल को राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, जो पूरे क्षेत्र के लिए गर्व की बात है। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान को दर्शाता है, बल्कि बस्तर की वुडेन आर्ट की बढ़ती प्रतिष्ठा का भी प्रमाण है।
वुडेन आर्ट ने बस्तर के सैकड़ों कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाया है। यह कला न सिर्फ रोजगार का साधन है, बल्कि सामाजिक बदलाव का भी जरिया बन रही है। कारीगर अब अपने हुनर के दम पर सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को भी इस दिशा में प्रेरित कर रहे हैं।
बस्तर की वुडेन आर्ट एक ऐसी कहानी है, जिसमें मेहनत, परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है। यह सिर्फ लकड़ी पर की गई नक्काशी नहीं, बल्कि एक पूरी संस्कृति, संघर्ष और सपनों का जीवंत रूप है। आने वाले समय में यह कला न केवल देश में, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनाएगी।