Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy: भोपाल के 3200 करोड़ के वेस्टर्न बायपास प्रोजेक्ट पर मचा हड़कंप! आरोप देश के 50 IAS IPS अधिकारियो ने प्रोजेक्ट मंजूर होने से पहले ही Bhopal Land Scam: राजधानी भोपाल के गुराड़ी घाट गांव में कौड़ियों के भाव खरीदी जमीन, जो अब 60 करोड़ की हो चुकी है, जानिए इनसाइडर इन्फॉर्मेशन और एलाइन्मेंट बदलने के खेल ने कैसे खड़े किए गंभीर सवाल, पढ़ें Bhopal Land Scam इनसाइड स्टोरी
Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy: भोपाल में प्रस्तावित 3200 करोड़ रुपए के वेस्टर्न बायपास प्रोजेक्ट ने अब सिर्फ विकास की नहीं बल्कि देश की सबसे ताकतवर नौकरशाही की नैतिकता पर सवाल उठा दिए हैं। यह कोई सामान्य जमीनी विवाद नहीं बल्कि, देशभर के 50 IAS और IPS अफसरों पर इन्फॉर्मेशन एडवांटेज का फायदा उठाकर करोड़ों रुपए का मुनाफा कमाने के गंभीर आरोप लगे हैं। अब मामले में सिस्टम परिवर्तन अभियान के अध्यक्ष और रिटायर्ड IFS अधिकारी आजाद सिंह डबास की सीएम मोहन यादव से की गई शिकायत के बाद इस पूरे मामले ने 'रियल एस्टेट इनसाइडर ट्रेडिंग' और कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' की एक नई बहस छेड़ दी है। पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…
आरोप यह है कि भविष्य की परियोजनाओं की जानकारी का फायदा उठाकर देशभर के 50 IAS-IPS अधिकारियों ने भोपाल के कोलार रोड पर गुराड़ी घाट गांव की जमीन खरीद ली। जहां बाद में हजारों करोड़ के बायपास (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) को आधिकारिक मंजूरी मिली।
भ्रष्टाचार विरोधी संगठन सिस्टम परिवर्तन अभियान (SPA) के अध्यक्ष और रिटायर्ड IFS अधिकारी आजाद सिंह डबास ने इस मामले की शिकायत प्रदेश के मुखिया सीएम मोहन यादव से की है। उनका दावा है कि 4 अप्रैल 2022 को अलग-अलग राज्यों और कैडर से जुड़े करीब 50 IAS और IPS अधिकारियो ने भोपाल (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) के कोलार इलाके के गुराड़ी घाट गांव में 2.023 हेक्टेयर कृषि भूमि खरीदी। दस्तावेज के मुताबिक यह खरीद एक ही रजिस्ट्री के माध्यम से की गई। क्या यह महज एक इत्तेफाक ही है या फिर सिस्टम का खेल... क्योंकि कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
जमीन खरीदने के 16 महीने बाद यानी 31 अगस्त 2023 को अचानक जैसे चमत्कार होता है। इसी इलाके के पास 3200 करोड़ रुपए के वेस्टर्न बायपास (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) को मंजूरी मिलती है। फिर जून 2024 में उसी जमीन का लैंड यूज बदलकर उसे रिहायशी कर दिया जाता है।
2022 में जिस जमीन को 5 करोड़ का बताया गया। आज इस जमीन की कीमत 55 से 60 करोड़ रुपए तक बताई जा रही है। लेकिन अब सवाल जमीन का नहीं बल्कि, सूचना का लाभ (Information Adventage) उठाने का है।
एक आम नागरिक को यह नहीं पता होता कि अगले दो साल में कहां सड़क बनने वाली है, कौन सा इलाका मास्टर प्लान में शामिल होगा या किस जमीन का डायवर्जन होने वाला है। लेकिन प्रशासनिक सिस्टम में बैठे लोगों के पास विकास योजनाओं, रोड नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर फाइलों की शुरुआती हलचल तक पहुंच होती है। यही वजह है कि अब यह मामला कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट और इंफॉर्मेशन एडवेंटेज की बहस में बदल चुका है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि देशभर के इतने प्रभावशाली अधिकारी एक ही दिन एक ही गांव और एक ही जमीन तक आखिर पहुंचे कैसे? इसके बाद सवाल आता है कि क्या वाकई यह केवल एक सामान्य निवेश था (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) या फिर सिस्टम के भीतर मौजूद जानकारी का इस्तेमाल?2013 में UPSC ने सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में एथिक्स, इंटीग्रीटी एंड एप्टिट्यूट नाम का एक पेपर एड किया था। जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर इस पेपर की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल 2013 से पहले यूपीएससी की परीक्षा मुख्य रूप से कैंडिडेट का ज्ञान, उसके रटने की क्षमता, इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र की समझ को परखती थी। लेकिन यह देखने में आया कि व्यक्ति बहुत बुद्धिमान हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वो ईमानदार या संवेदनशील भी हो। ऐसे में एथिक्स पेपर का उद्देश्य यही परखना है कि संकट या लालच के समय अधिकारी का नैतिक दृष्टिकोण कैसा रहता है।
भारत सरकार द्वारा गठित द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी चौथी रिपोर्ट में प्रशासन में नैतिकता में साफ तौर पर कहा था कि सिविल सेवा में भ्रष्टाचार को कम करने और शुचिता लाने के लिए अधिकारियों के चयन के समय ही उनकी नैतिक अभिरुचि की जांच होनी चाहिए। इसी सिफारिश को लागू करने के लिए यह पेपर यूपीएससी ने 2013 में जोड़ा गया था।
लेकिन गुराड़ी घाट का यह मामला (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) अब वही असहज सवाल खड़े कर रहा है। अगर सरकारी सिस्टम के भीतर मौजूद लोग भविष्य की परियोजनाओं वाले इलाकों में सामूहिक निवेश करने लगें, तो क्या यह कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट का मामला नहीं है, जिसे UPSC की किताबों में गलत बताया जाता है?
सेवा में रहते हुए IAS और IPS अधिकारियों द्वारा संयुक्त रूप से जमीन खरीदने पर All India Services (Conduct) Rules 1968 के तहत सीधे तौर पर पाबंदी नहीं है, लेकिन यदि यह खरीद नियमों के दायरे से बाहर या संदिग्ध परिस्थितियों में की जाती है, तो यह निम्न नियमों का उल्लंघन मानी जाएगी।
(1)- [Rule 3(1) - अखंडता और कर्तव्यनिष्ठा (Integrity and Devotion to Duty)] - सभी अधिकारियों को हर समय पूर्ण अखंडता और उच्च नैतिक मानकों को बनाए रखना होता है। यदि अधिकारी अपने पद या गोपनीय सरकारी सूचना का उपयोग करके निजी लाभ के लिए ऐसी जमीन खरीदते हैं, तो यह सीधे तौर पर कदाचार (Misconduct) और Rule 5(1A) के तहत 'हितों के टकराव' (Conflict of interest) का उल्लंघन है।
(2)- [Rule 16(2)] and [16(3)] - पूर्व अनुमति या सूचना (Previous Sanction and Intimation). All India Services (Conduct) Rules 1968 के तहत सरकारी अधिकारियों को कोई भी अचल संपत्ति (Immovable Property) खरीदने या बेचने से पहले सरकार को जानकारी देनी होती है या अनुमति लेनी अनिवार्य होती है। Rule 16(4) के अनुसार एक तय सीमा (आमतौर पर 15000 रु. से अधिक) के लेनदेन की सूचना एक महीने के भीतर सरकार को देना जरूरी है यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो यह नियमों का उल्लंघन है।
(3) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और लोकपाल (Prevention of Corruption & Lokpal) - यदि जांच में यह साबित होता है कि अधिकारियों ने पद का दुरुपयोग किया या उनके पास पहले से ही उस क्षेत्र में 'इनसाइडर ट्रेडिंग' (Inside Information) के जरिए भविष्य में सरकारी प्रोजेक्ट (जैसे बायपास या रोड प्रोजेक्ट) आने की जानकारी थी, तो यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) और Lokpal Act के तहत दंडनीय अपराध बन जाता है।
आइपीआर दस्तावेज में इस जमीन (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) को Like Minded officers की प्रॉपर्टी बताया है। यानी यह कोई व्यक्तिगत निवेश नहीं, बल्कि सामूहिक निवेश जैसा दिखाई देता है। यही वह पॉइंट है, जिसने इस पूरे मामले को संवेदनशील बना दिया है।
क्योंकि अलग-अलग पोस्टिंग और कैडर वाले अफसरों का एक ही निवेश नेटवर्क में दिखाई देना (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) कई नए सवाल खड़े करता है। क्या कोई अनौपचारिक अफसर निवेश समूह सक्रिय था? क्या भविष्य की परियोजनाओं की जानकारी आपस में साझा हुई? क्या बायपास के अलाइनमेंट बदलने से इस जमीन को फायदा पहुंचा?
SPA ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया है कि बायपास का अलाइन्मेंट तीन बार बदला गया। हर बार रास्ता अधिकारियों की खरीदी जमीन के करीब आता गया। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होना अभी बाकी है।
अब तक किसी जांच एजेंसी ने इन अधिकारियों को दोषी नहीं ठहराया, न ही मामले में किसी तरह की जांच के निर्देश या आदेश जारी किए गए? लेकिन प्रशासनिक नैतिकता के एक्सपर्ट्स एक IAS अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि, हर सवाल कानून से तय नहीं होता। कई बार काम तकनीकी रूप से वैध हो सकता है, लेकिन उस पर नैतिक सवाल उठ सकते हैं। गुराड़ी घाट का यह मामला (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) अब उसी श्रेणी में देखा जा रहा है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता सिर्फ ईमानदार प्रशासन नहीं, बल्कि ऐसा प्रशासन भी चाहती है, जो निष्पक्ष दिखाई दे।
लगभग 53 किमी का ईस्टर्न बायपास पहले से है। जो बिल्कुल खाली पड़ा रहता है। लेकिन अब सवाल ये है कि ये पश्चिमी बायपास बन क्यों रहा है? क्योंकि भोपाल जिसे हराभरा शहर, झीलों की नगरी और प्राकृतिक सौंदर्य कहते हैं वो वास्तव में वो भोपाल के पश्चिमी क्षेत्र में है। जल संग्रहण के क्षेत्र, जैसे बड़ा तालाब, कलियासोत, केरवा, सारा वाइल्डलाइफ एरिया पश्चिमी क्षेत्र में है, टाइगर मूवमेंट एरिया पश्चिमी क्षेत्र में है। अगर वेस्टर्न बायपास बनता है, तो इसका असर इन सभी क्षेत्रों पर नजर आएगा, जो सही नहीं है। इसीलिए हमेशा कहा जाता है कि पश्चिमी क्षेत्र में मानवीय बसाहट और गतिविधियां कम होनी चाहिएं। लेकिन अब इस प्रोजेक्ट के आने से सारे नियम ताक पर रखे जा रहे हैं। न वाइल्डलाइफ की चिंता है और न ही जल संग्रहण क्षेत्रों और पर्यावरण की।
क्या इस पूरे मामले (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) में स्वतंत्र जांच होगी? क्या बायपास अलाइनमेंट बदलने की प्रक्रिया सार्वजनिक की जाएगी? क्या अधिकारियों के निवेश और सरकारी फैसलों के बीच संबंधों की जांच होगी? और सबसे अहम क्या भारत में IAS IPS अधिकारियों के लिए कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट पर अलग और सख्त कानून की जरूरत है?
ये ऐसा रूट है जिस पर अभी ट्रैफिक भी नहीं है। ऐसे में जब वहां पहले से ही ईस्टर्न बायपास है, तो वेस्टर्न बायपास की जरूरत ही नहीं है। वहीं जहां वाइल्डलाइफ क्षेत्र है, टाइगर मूवमें का एरिया है, बड़ा तालाब का कैचमेंट एरिया है तो ये बहुत बड़ा डिस्टर्बेंस होगा। इस वेस्टर्न बायपास के पास 300 कॉलोनियां प्रस्तावित हैं। सरकार पेड़ों की कटाई को 3 हजार के आसपास दिखा रही है, लेकिन हकीकत में ये 30 हजार से ज्यादा हैं, जिन्हें काटा जाएगा। ये तो सीधा-सीधा एन्वायरमेंटल डैमेज्ड करना है। दूसरा हमारे प्रदेश पर आज की तारीख में साढ़े पांच करोड़ का कर्ज है। 18000 करोड़ तो सरकार ने अकेले मार्च में लिया। सरकार हर महीने 8-10 हजार करोड़ का कर्ज ले रही है, तब तन्ख्वाह बंटती है। ऐसे में सरकार जहां पहले से ही कर्ज में डूबी है, तो इसे (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) बनाना फीजूल खर्च करना है। इससे तो बेहतर है कि वह ईस्टर्न बायपास को ही 6 लेन करने की प्लानिंग करे, उसे इम्प्रूव किया जाना अच्छा ऑप्शन है, इससे 100-200 करोड़ के खर्च में ही काम चल जाएगा। ऐसे में वेस्टर्न डिस्टर्बेंस प्रोजेक्ट केंसिल होना चाहिए।
-आजाद सिंह डबास, रिटायर्ड IFS अधिकारी, SPA अध्यक्ष, एमपी।
कहना होगा कि भोपाल के कोलार स्थित गुराड़ी घाट की ये जमीन (Bhopal Bypass Ias IPS Land Controversy) अब सिर्फ रियल एस्टेट नहीं रही, बल्कि उस भरोसे की परीक्षा बन चुकी है, जिस पर भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी है।