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Childhood Bullying : अगर बच्चा अचानक बदलने लगे तो समझिए कुछ है गड़बड़, डॉक्टर से समझिए Warning

Childhood Bullying : स्कूल या ऑनलाइन बुलिंग से बच्चे को कैसे बचाएं? अगर आपका बच्चा बुलिंग का शिकार हो रहा है या हुआ है तो उसके बिना बताएं आप कैसे समझ सकते हैं। डॉक्टर से समझिए क्या हैं शुरुआती संकेत, कानूनी नियम, S.A.F.E पेरेंटिंग मॉडल और मनोचिकित्सक की सही सलाह।
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Jul 23, 2026
Chilhood Bullying Empowerment Cyberbullying AI Deepfakes
बुलिंग से बच्चे को कैसे बचाएं? (AI)

Childhood Bullying : बचपन खिलखिलाने, सीखने और बेफिक्र होकर जीने के लिए होती है। लेकिन कभी-कभी इस सुनहरे दौर पर 'बुलिंग' (Bullying) का काला साया मंडराने लगता है। स्कूल का मैदान हो, क्लासरूम, बस या फिर इंटरनेट की दुनिया (साइबर बुलिंग) ।कई बार बच्चे दोस्तों या सीनियर्स के दुर्व्यवहार का शिकार हो जाते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बुलिंग का शिकार होने वाले ज्यादातर बच्चे घर आकर इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोलते। वे डर, शर्म या इस झिझक में चुप रह जाते हैं कि कहीं माता-पिता उन्हीं को न डांटने लगें।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब बच्चा अपनी जुबान से कुछ नहीं कह पाता, तो उसका व्यवहार बहुत कुछ बयां कर देता है। आइए विस्तार से समझते हैं उन संकेतों (Bullying Warning Signs) को, जो बताते हैं कि आपका बच्चा चुपचाप बुलिंग का शिकार हो रहा है। साथ ही जानिए, ऐसी स्थिति में माता-पिता को क्या कदम उठाने चाहिए।

बच्चा चुप है तो कैसे पहचानें?

व्यवहार और मूड में अचानक बदलाव: अगर हंसता-खेलता बच्चा अचानक शांत, गुमसुम या बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगे, तो इसे महज 'मूड स्विंग' समझकर नजरअंदाज न करें। बुलिंग के शिकार बच्चे अक्सर तनाव में रहते हैं। जो खेल या हॉबीज़ उन्हें पहले बहुत पसंद थीं, अब उनसे भी उनका मन अचानक भर जाता है।

  • स्कूल जाने से कतराना और रोज नए बहाने : सुबह उठते ही पेट दर्द, सिर दर्द, उल्टी या बुखार का बहाना बनाना इस बात का इशारा हो सकता है कि बच्चा स्कूल के माहौल से डर रहा है। अगर पढ़ाई में अच्छे भले बच्चे के ग्रेड्स अचानक गिरने लगें या वह स्कूल की एक्टिविटीज से भागने लगे, तो सतर्क हो जाएं।
  • नींद और खाने-पीने का पैटर्न बिगड़ना: बुलिंग का असर बच्चे की मानसिक शांति पर सीधा पड़ता है। रात को ठीक से नींद न आना, बार-बार चौंक कर उठ जाना, डरावने सपने देखना या अचानक बिस्तर गीला कर देना तनाव के स्पष्ट लक्षण हैं। इसके अलावा, अचानक भूख कम लगना या स्कूल से आते ही बहुत तेज भूख लगना (क्योंकि हो सकता है उनका टिफिन छीना जा रहा हो) भी एक बड़ा संकेत है।
  • बिना वजह की चोटें और सामान का गायब होना: अगर बच्चे के शरीर पर अक्सर खरोंच, नीले निशान या चोटें दिखें और पूछने पर वह कोई अस्पष्ट बहाना बनाए (जैसे 'मैं गिर गया था'), तो सावधान रहें। इसके अलावा, बार-बार बैग, किताबें, महंगी स्टेशनरी, खिलौने या कपड़े फटे या गायब मिलना भी बुलिंग की ओर इशारा करता है।
  • सामाजिक दूरी (Social Withdrawal) : क्या आपके बच्चे ने अपने पुराने दोस्तों से बात करना बंद कर दिया है? क्या वह शाम को खेलने जाने के बजाय कमरे में बंद रहना पसंद करता है? यह सामाजिक दूरी इस बात का संकेत है कि उसका आत्मविश्वास डगमगा चुका है। अगर वह फोन या लैपटॉप इस्तेमाल करने के बाद अचानक बहुत परेशान दिखता है, तो यह साइबर बुलिंग का मामला हो सकता है।
  • खुद को दोष देना और लो-कॉन्फिडेंस : बुलिंग बच्चे के स्वाभिमान को तोड़कर रख देती है। बच्चा खुद को "बेकार" या "कमजोर" समझने लगता है। अगर आपका बच्चा बातों-बातों में कहे "मेरा कोई दोस्त नहीं है", "सब मुझसे नफरत करते हैं" या "मैं ही खराब हूं", तो समझ जाएं कि उसे आपकी तुरंत मदद की जरूरत है।

क्या है बुलिंग को लेकर भारत में कानून? (Rulesfor Bullying in India)

भारत में बुलिंग के खिलाफ कोई एक अकेला 'बुलिंग एक्ट' नहीं है, लेकिन CBSE गाइडलाइंस, UGC नियमों और भारतीय न्याय संहिता (BNS) / पॉक्सो (POCSO) के तहत इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान है।

स्कूलों के लिए नियम

एंटी-बुलिंग कमेटी (Anti-Bullying Committee): केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के निर्देशानुसार, हर स्कूल में 'एंटी-बुलिंग कमेटी' का होना अनिवार्य है। इसमें स्कूल हेड, शिक्षक, काउंसलर, पीटीए (PTA) प्रतिनिधि और डॉक्टर शामिल होते हैं।

  • पहला अपराध होने पर: चेतावनी देना और काउंसलिंग करना।
  • गंभीर या बार-बार बुलिंग करने पर:
  • लिखित में माफी मंगवाना।
  • स्कूल से निलंबन (Suspension)।
  • टीसी (Transfer Certificate) देकर स्कूल से निष्कासित (Expel) करना।

टीचर की जिम्मेदारी: यदि कोई शिक्षक या स्कूल प्रशासन बुलिंग की शिकायत पर कार्रवाई नहीं करता, तो उन पर भी प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है।

क्या कहती हैं कानूनी धाराएं (Criminal & Cyber Laws)

यदि बुलिंग का स्तर शारीरिक हिंसा, मानसिक प्रताड़ना या ऑनलाइन (Cyberbullying) तक पहुंच जाता है, तो कानून लागू होते हैं:

  • भारतीय न्याय संहिता (BNS): मारपीट, गाली-गलौज या मानसिक प्रताड़ना के मामलों में चोट पहुंचाने या धमकी देने की धाराओं के तहत पुलिस केस दर्ज हो सकता है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम: सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, अश्लील कमेंट्स या किसी बच्चे की तस्वीरें/वीडियो गलत तरीके से शेयर करने (Cyberbullying) पर IT Act की धाराओं के तहत जेल और जुर्माना दोनों का प्रावधान है।
  • पॉक्सो (POCSO Act): अगर बुलिंग में कोई यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) या अनुचित शारीरिक स्पर्श शामिल है, तो पॉक्सो एक्ट के तहत गैर-जमानती मामला बनता है।

कॉलेजों/यूनिवर्सिटीज के लिए नियम (Ragging Laws)

उच्च शिक्षण संस्थानों में बुलिंग को 'रैगिंग' के तहत कवर किया जाता है। UGC Anti-Ragging Regulations के तहत रैगिंग पूरी तरह से बैन है। दोषी पाए जाने पर छात्र को गिरफ्तार किया जा सकता है और उसकी डिग्री रद्द हो सकती है।

अंतरराष्ट्रीय नियम (International Rules & Standards)

संयुक्त राष्ट्र (UNICEF & UN Rules) : UN Convention on the Rights of the Child (UNCRC) अनुच्छेद 19 के तहत हर बच्चे को किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक हिंसा, दुर्व्यवहार और बदसलूकी (बुलिंग) से सुरक्षा पाने का अधिकार है।

UNESCO की 'Safe to Learn' पहल: इसके तहत वैश्विक स्तर पर स्कूलों में 'जीरो टॉलरेंस पॉलिसी' लागू की गई है, ताकि स्कूल हिंसा और बुलिंग-मुक्त रहें।

विकसित देशों के सख्त कानून

अमेरिका (USA):

  • अमेरिका के सभी 50 राज्यों में 'Anti-Bullying Laws' लागू हैं।
  • स्कूलों को बुलिंग की शिकायत मिलते ही 24 से 48 घंटे के भीतर जांच शुरू करनी होती है।
  • साइबरबुलिंग (Cyberbullying) के लिए वहां कई राज्यों में आपराधिक कानून (Criminal Offenses) हैं।

ब्रिटेन (United Kingdom):

  • The Equality Act 2010 & Education Act: यूके के हर स्कूल के लिए कानूनी रूप से 'Anti-Bullying Policy' बनाना और उसे लागू करना अनिवार्य है।
  • नस्लीय (Racial), धार्मिक या लिंग-आधारित बुलिंग को 'Hate Crime' माना जाता है और इसमें पुलिस सीधे हस्तक्षेप करती है।

ऑस्ट्रेलिया (Australia):

  • ऑस्ट्रेलिया में 'Brodie's Law' (एंटी-बुलिंग कानून) के तहत गंभीर बुलिंग करने पर 10 साल तक की जेल की सजा का प्रावधान है।
  • E Safety Commissioner: इंटरनेट पर बच्चों को साइबर बुलिंग से बचाने के लिए एक सरकारी एजेंसी है, जो 24 घंटे के अंदर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से बुलिंग वाले कंटेंट को हटवाने का कानूनी अधिकार रखती है।

डॉ. सुनील शर्मा से पत्रिका के सवाल-जवाब

बॉडी शेमिंग या शारीरिक बनावट को लेकर की जाने वाली बुलिंग बच्चों की आत्म-छवि (Self-Image) को किस हद तक नुकसान पहुंचाती है?

बॉडी शेमिंग बच्चे की 'सेल्फ इमेज' पर बहुत गहरा और स्थाई नकारात्मक असर डालती है। इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव कई परतों (Layers) में काम करता है। शुरुआत में जब कोई बच्चा आलोचना का शिकार होता है, तो उसे लगता है कि शायद उसी में कोई कमी है या वह दूसरों से अलग है। धीरे-धीरे यह भावना शर्म (Shame) और अपराधबोध (Guilt) में बदल जाती है, जिससे बच्चा लोगों से दूरी बनाने यानी 'सोशल विड्रॉल' करने लगता है। इस तरह बच्चे के भीतर एक 'नेगेटिव सेल्फ इमेज' बन जाती है, जो आगे चलकर डिप्रेशन, एंग्जायटी और ईटिंग डिसऑर्डर्स (Eating Disorders) जैसी गंभीर मानसिक समस्याओं का कारण बन सकती है।

अगर किसी बच्चे ने हिम्मत जुटाकर माता-पिता को बताया कि उसके साथ बुलिंग हो रही है, तो पेरेंट्स को सबसे पहला शब्द या रिएक्शन क्या देना चाहिए?

जब बच्चा हिम्मत जुटाकर अपने साथ हुई किसी घटना को शेयर करता है, तो माता-पिता के लिए वह बेहद नाजुक क्षण होता है। ऐसे में पेरेंट्स की प्रतिक्रिया सबसे अहम भूमिका निभाती है। सबसे पहले बच्चे की हिम्मत की सराहना करें कि उसने खुलकर बात की। एक बेहतर श्रोता (Good Listener) बनते हुए पहले पूरी बात सुनें और उसकी भावनाओं को समझें जैसे उससे कहें, 'मैं समझ सकता/सकती हूं कि यह सुनना तुम्हारे लिए कितना कठिन रहा होगा।' अक्सर बुलिंग के शिकार बच्चे खुद को ही दोषी मानने लगते हैं, इसलिए उन्हें भरोसा दिलाएं कि इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। बच्चे से कभी यह न कहें कि 'इतनी सी बात पर रो रहे हो', 'तुमने भी कुछ किया होगा' या 'इसे इग्नोर करो'। इसके बजाय उसे सशक्त (Empower) महसूस कराएं और कहें कि अब हम दोनों मिलकर इसका सही समाधान निकालेंगे।

अक्सर माता-पिता बच्चों को सलाह देते हैं "तुम भी उसे पलटकर मारो या जवाब दो।" एक मनोचिकित्सक के रूप में क्या आप इस सलाह को सही मानते हैं?

बुलिंग का शिकार बच्चे को 'पलटकर मारो' या 'बदला लो' जैसी सलाह देना अधूरा और नुकसानदायक (Harmful) साबित हो सकता है। अगर बच्चा पलटकर हमला करता है, तो सामने वाले का आक्रामकता और बढ़ सकती है और बुलिंग का दायरा बढ़ सकता है। वहीं, अगर बच्चा आपकी सलाह के बावजूद ऐसा नहीं कर पाता, तो उसके अंदर हीनभावना और अपराधबोध (Guilt & Shame) बढ़ जाता है कि वह कमजोर है।

सही रणनीति यह होनी चाहिए:

  • शांत और दृढ़ आवाज: बच्चा शांत लेकिन आत्मविश्वास से भरी आवाज में कहे 'मुझे इस तरह की बात पसंद नहीं है, इसे तुरंत बंद करें।
  • शारीरिक हमले की स्थिति में मदद लें: अगर मारपीट की आशंका हो, तो तुरंत पास मौजूद टीचर या किसी वयस्क (Adult) को बताएं। मदद मांगने को कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी समझें।
  • अभिभावक और स्कूल का तालमेल: अगर बुलिंग बार-बार हो रही है, तो माता-पिता और स्कूल प्रशासन मिलकर इस पर सख्त कदम उठाएं।
  • साइबर बुलिंग पर एक्शन: अगर ऑनलाइन प्रताड़ना या धमकियां मिल रही हैं, तो तुरंत स्क्रीनशॉट लें, संबंधित अकाउंट को ब्लॉक करें और शिकायत (Report) दर्ज कराएं।

आजकल स्कूल जाने वाले बच्चों में साइबरबुलिंग (Cyberbullying) और एआई (AI Deepfakes) से जुड़ा तनाव कितना बढ़ गया है? इसे बच्चों के विकास में क्या असर पड़ता हैं ?

स्कूलों में होने वाली पारंपरिक (ट्रैडिशनल) बुलिंग की तुलना में साइबर बुलिंग और एआई (AI) का प्रभाव कहीं अधिक चिंताजनक और नुकसानदायक होता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि साइबर बुलिंग 24/7 (हर समय) जारी रहती है। घर के भीतर भी इंटरनेट के जरिए हजारों लोग एक्टिव रहते हैं। डिजिटल बुलिंग में स्क्रीनशॉट वायरल होने का डर बना रहता है और अक्सर आरोपी की असली पहचान छिपी रहती है, जिससे यह और खतरनाक रूप ले लेती है।

  • मानसिक स्वास्थ्य पर चरणबद्ध प्रभाव: तत्काल प्रभाव (Immediate Impact): डीपफेक के जरिए असली तस्वीरों से आपत्तिजनक कंटेंट बनाया जाता है, जिससे बच्चों में तुरंत तीव्र घबराहट (Panic Attacks), गहरी शर्मिंदगी (Shame) और गिल्ट (Guilt) की भावना पैदा हो सकती है।
  • मध्यकालिक प्रभाव (Intermediate Impact): बच्चा धीरे-धीरे समाज से कटने लगता है (Social Withdrawal) और उसका मन बार-बार स्कूल छोड़ने या वहां से भागने का करने लगता है।
  • दीर्घकालिक प्रभाव (Long-term Impact): यदि यह प्रताड़ना लंबे समय तक बनी रहे, तो बच्चे में पीटीएसडी (Post-Traumatic Stress Disorder) जैसे गंभीर मानसिक लक्षण दिख सकते हैं और आत्महत्या के विचार (Suicidal Thoughts) भी आ सकते हैं।

कुल मिलाकर, यह बच्चे के समग्र विकास, विशेष रूप से उसकी आत्म-पहचान (Identity) और दूसरों पर विश्वास (Trust) करने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करता है।

सोशल मीडिया पर होने वाली बुलिंग का बच्चों की नींद, एकाग्रता और पढ़ाई पर क्या असर पड़ता है?

सोशल मीडिया पर होने वाली बुलिंग सीधे तौर पर बच्चों की नींद, एकाग्रता और प्रदर्शन (Performance) को प्रभावित करती है।

इसका शरीर और मस्तिष्क पर प्रभाव:

  • तनाव व नींद में खलल: जब बच्चा कोई प्रताड़ित करने वाला मैसेज देखता है, तो शरीर में तनाव बढ़ाने वाले 'कॉर्टिसोल' (Cortisol) हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। इससे उसकी नींद प्रभावित होती है और औसतन नींद में लगभग 3 घंटे की कमी आ जाती है।
  • सुबह की थकान व फोकस की कमी: नींद पूरी न होने के कारण अगली सुबह बच्चा फ्रेश महसूस नहीं करता, जिससे उसकी याददाश्त और ध्यान केंद्रित करने (Focus) की क्षमता कमजोर होने लगती है।
  • व्यवहार में बदलाव: नींद और एकाग्रता की कमी से बच्चे की निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making) प्रभावित होती है। वह चिड़चिड़ा (Irritable) और आक्रामक (Aggressive) हो सकता है।
  • हाइपरविजिलेंस (Hypervigilance): बच्चा अपनी एकाग्रता खो देता है और हर समय अत्यधिक सतर्क या डरा हुआ (Hypervigilant) रहने लगता है कि कहीं दोबारा कोई मैसेज या ट्रॉलिंग न हो जाए।

क्या बचपन में हुई बुलिंग का असर किसी व्यक्ति के वयस्क (Adult) होने के बाद भी उसके रिश्तों और आत्मविश्वास पर रहता है?

बचपन व्यक्ति के विकास का सबसे महत्वपूर्ण चरण (Developmental Phase) होता है। इस दौरान मिलने वाले अनुभव व्यक्ति के वयस्क (Adult) जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। यदि कोई बच्चा बचपन में बार-बार बुलिंग का शिकार होता है, तो उसके मस्तिष्क का 'एमिग्डाला' (Amygdala - मस्तिष्क का वह हिस्सा जो डर और भावनाओं को नियंत्रित करता है) अत्यधिक संवेदनशील (Sensitive) हो जाता है।

  • हाइपरएक्टिव मस्तिष्क: एमिग्डाला के अत्यधिक संवेदनशील हो जाने के कारण, बड़ा होने पर जब भी व्यक्ति के सामने कोई तनावपूर्ण स्थिति आती है, तो उसका मस्तिष्क तुरंत प्रतिक्रिया देने लगता है।
  • 'फाइट या फ्लाइट' रिस्पॉन्स: ऐसे व्यक्तियों में 'फाइट या फ्लाइट' (स सामना करो या भाग जाओ) की स्थिति बहुत जल्दी एक्टिवेट हो जाती है। वे छोटी-छोटी बातों पर भी अत्यधिक भयभीत, आक्रामक या असुरक्षित महसूस करने लगते हैं।

हमारे पाठकों के लिए आपकी सबसे बड़ी सलाह क्या होगी कि वे अपने घर में ऐसा माहौल कैसे बनाएं जहां बच्चा बिना किसी डर के अपनी बात रख सके?

घर पर ऐसा माहौल बनाने के लिए जहां बच्चा बिना किसी डर के अपनी बात शेयर कर सके, एक्सपर्ट्स S.A.F.E. (सेफ) मॉडल अपनाने की सलाह देते हैं:

  • सुरक्षा और संवाद (Safety): बच्चे को यह विश्वास दिलाएं कि घर पर अपनी बात कहने पर उसे डांट, जजमेंट या सजा का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके लिए रोज कम से कम 10 मिनट बिना किसी गैजेट या फोन के बच्चे से खुलकर बात करें। गलती होने पर उसकी कमियां निकालने के बजाय उसके साथ खड़े होकर समस्या को सुलझाएं।
  • बिना शर्त स्वीकारना (Acceptance): बच्चे के रंग, रूप, वजन या रुचियों को लेकर किसी भी प्रकार की टिप्पणी या बॉडी शेमिंग न करें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी तुलना (Comparison) कभी दूसरे बच्चों से न करें। वह जैसा भी है, उसे बिना किसी शर्त के स्वीकार करें।
  • भावनाओं को प्राथमिकता (Feelings First): बच्चे की समस्या सुनते ही उसे "रोना बंद करो" कहने के बजाय पहले उसकी भावनाओं को समझें। उससे कहें "मैं समझ सकता/सकती हूं कि तुम्हें दुख हो रहा है, बताओ क्या हुआ? पहले पूरी बात ध्यान से सुनें, फिर मिलकर समाधान निकालें।
  • सशक्तिकरण (Empowerment): बच्चे को घर के छोटे-छोटे फैसलों (Decisions) में शामिल करें और उसकी राय लें। उसकी छोटी-छोटी सफलताओं पर उसकी तारीफ करें और उसे सच्चा प्रोत्साहन (Genuine Reward) दें, जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़े।
Updated on:
23 Jul 2026 06:18 pm
Published on:
23 Jul 2026 06:17 pm