Big Cat Diplomacy: चीन ने 1950 के दशक में साम्यवादी सरकार के सत्ता में आने के बाद पांडा डिप्लोमेसी की शुरुआत की। भारत अब बिग कैट डिप्लोमेसी के जरिए विश्व का नेतृत्व करने की दिशा में बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य सिर्फ वन्यजीव का संरक्षण भर नहीं, बल्कि भारत की ग्रीन डिप्लोमेसी को आगे बढ़ाना है।
Big Cat Diplomacy : सामान्य तौर पर एक देश के राष्ट्राध्यक्ष किसी दूसरे देश जाते हैं तो वहां के राष्ट्राध्यक्ष को अपने देश की कोई खास चीज उपहार के तौर पर देते हैं। इस गिफ्ट में शॉल से लेकर बुद्ध की प्रतिमा तक हो सकती है। इसे कूटनीति का हिस्सा माना जाता है। इस आदान-प्रदान में जानवर भी जुड़ गए। चीन ने सोवियत संघ और कुछ अन्य मित्र देशों को 1950 के दशक में पांडा उपहार में दिए। दुनिया में इसे पांडा डिप्लोमैसी (Panda Diplomacy) नाम दिया गया। अब जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता संकट के दौर में भारत पर्यावरण को कूटनीति का नया हथियार बना रहा है। आइए जानते हैं कि भारत कैसे ‘बिग कैट डिप्लोमेसी’ (Big Cat Diplomacy) के जरिए खुद को जैव विविधता संरक्षण के वैश्विक नेता के रूप में स्थापित करना चाहता है।
पुराने जमाने में राजा और महाराजा जानवरों के जरिए कूटनीतिक संबंध का विस्तार करते रहे हैं। वह दूसरे शासकों को अपने राज्य के दुर्लभ पशु-पक्षी उपहार में भेजकर मित्रता और परस्पर सहयोग करने का संदेश दिया करते थे। वर्तमान समय में इसे 'एनिमल डिप्लोमेसी' या 'वाइल्डलाइफ डिप्लोमेसी' कहा जाता है। भारत ने 'बिग कैट डिप्लोमैसी'को अपना हथियार बनाया है।
आज की विश्व राजनीति में 'सॉफ्ट पावर' का महत्व तेजी से बढ़ा है। सॉफ्ट पावर का अर्थ ऐसी सांस्कृतिक, पर्यावरणीय, मानवीय या वैचारिक शक्ति से है, जिसके माध्यम से कोई देश बिना दबाव डाले विश्व समुदाय को प्रभावित करता है। इसी सॉफ्ट पावर का एक नया और रोचक रूप है- 'बिग कैट डिप्लोमैसी'। इसके तहत बिग कैट प्रजातियों जैसे बाघ, शेर, चीता, तेंदुआ या पांडा का उपयोग अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करने, वैश्विक छवि बनाने तथा पर्यावरणीय नेतृत्व प्रदर्शित करने के लिए करता है। यह अवधारणा वन्यजीव संरक्षण और विदेश नीति का एक अनोखा संगम है।
बिग कैट परिवार में आते हैं ये जंगली जानवर
वन्यजीव विज्ञान में 'बिग कैट' शब्द का उपयोग मुख्यतः बिल्ली परिवार (Felidae) की बड़ी प्रजातियों के लिए किया जाता है। इनमें प्रमुख हैं- बाघ, शेर, तेंदुआ, चीता, जगुआर, और हिम तेंदुआ।
China Panda Diplomacy: 1950 के दशक में जानवरों के जरिए दुनिया में कूटनीति करने की पहल सबसे पहले चीन ने की। चीन में साम्यवादी सरकार की स्थापना के बाद वह अपने सहयोगी देशों को एक संदेश देना चाहता था। दरअसल उस दौर में चीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ने से बचना चाहता था, इसलिए उसने दुर्लभ और आकर्षक जीवों को 'सॉफ्ट पावर' के रूप में इस्तेमाल किया। पांडा चीन की सांस्कृतिक पहचान और शांति के प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए वे कूटनीति का प्रभावी माध्यम बने। दुनिया ने इसे 'पांडा डिप्लोमेसी' का नाम दिया गया है।
1957 में चीन ने सोवियत संघ को 'पिंग-पिंग' नामक विशाल पांड उपहार में दिया। इसके दो साल बाद यानी 1959 में चीन ने सोवियत संघ को एक और विशाल पांडा गिफ्ट में दिया। के दशक में चीन ने रूस को व अन्य मित्र देशों को पांडा उपहार के बतौर दिए। यह सिर्फ वन्यजीव उपहार नहीं था, बल्कि चीन ने दुनिया को यह संदेश दिया कि दोनों साम्यवादी देश वैचारिक मित्रता के साथ रणनीतिक साझेदार बन गए। इसके बाद चीन ने उत्तरी कोरिया को भी पांडा भेजा।
चीन ने विश्व के दो ताकतवर देशों से 1950 के दशक में दोस्ती करने के बाद अब एक और विश्व महाशक्ति की ओर हाथ बढ़ाया। 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) की चीन बुलाया। उनके यात्रा से लौटने के बाद चीन ने अमेरिका को दो विशाल पांडा भेजे- 'लिंग-लिंग' और 'हसिंग-हसिंग'। इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने और नए संबंध स्थापित करने में मदद मिली। इसके बाद में चीन ने जापान, ब्रिटेन, फ्रांस सहित कई देशों को पांडा देकर अपने राजनयिक संबंध मजबूत किए।
भारत में अंतरराष्ट्रीय बिग कैट अलायंस (IBCA 2026) शिखर सम्मेलन 1 और 2 जून 2026 को होने जा रहा है। केवल वन्यजीव संरक्षण का मंच नहीं, बल्कि भारत की ग्रीन डिप्लोमेसी का बड़ा प्रदर्शन माना जा रहा है। इसमें 95 देशों के राष्ट्राध्यक्ष, सरकार प्रमुख और प्रतिनिधियों की भागीदारी होगी। इस सम्मेलन के जरिए भारत खुद को ग्लोबल साउथ के पर्यावरणीय नेतृत्वकर्ता व जैव विविधता संरक्षण के वैश्विक मॉडल के रूप में स्थापित करना चाहता है। भारत लंबे समय से बाघ संरक्षण में सफलता को वैश्विक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। एशियाई शेरों का संरक्षण, हिम तेंदुआ संरक्षण व अफ्रीकी चीतों के पुनर्वास जैसी योजनाओं के जरिए भारत यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि विकास व संरक्षण साथ चल सकते हैं।
Tiger Conservation India: भारत ने बीते पांच दशकों में दुर्लभ और संकटग्रस्त जंगली जीवों को बचाने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए। भारत में 1972 में राष्ट्रीय गणना में बाघों की संख्या 1,827 बताई गई थी। रह गई थी। उस समय केंद्र में इंदिरा गांधी की नेतृत्व वाली सरकार थी। भारत सरकार ने 1973 में बाघ परियोजना शुरू किया। इस परियोजना के शुरुआती चरण में बनाए गए 9 टाइगर रिजर्वों में केवल 268 बाघ दर्ज किए गए थे। वर्ष 2022 में बाघों की गणना हुई तब इनकी संख्या बढ़कर 3,167 हो गई। हालांकि इस बीच टाइगर रिजर्व की संख्या बढ़कर 9 से 58 हो चुके हैं। यही वजह है कि आज दुनिया के बाघों की लगभग 75 प्रतिशत आबादी भारत में पाई जाती है। यह दुनिया की सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण योजनाओं में से एक बना।
भारत में एशियाई शेर भी विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए थे। 20 सदी की शुरुआत तक आते-आते इनकी संख्या घटकर सिर्फ 20 रह गई थी। शेरों को बचाने के लिए भारत सरकार ने गिर राष्ट्रीय उद्यान (Gir National Park) और आसपास के क्षेत्रों को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया। इसके अलावा वन विभाग ने शेरों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने, जल स्रोत विकसित करने और शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाने पर काम किया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंचे शेरों की संख्या अब 600 से अधिक हो चुकी है।
भारत में कभी चीतों की संख्या हजारों में थी। लेकिन 1952 में छत्तीसगढ़ के कोरिया क्षेत्र में 1952 में तीन आखिरी चीतों का शिकार कर एशियाई चीता का देश से अस्तित्व ही मिटा दिया गया। इस बीच चीतों का नाम गाड़ी की स्पीड नापने और कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापन में ही लिया गया। वर्ष 2022 में नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में चीतों (Project Cheetah) को फिर से बसाने के बारे में ठान लिया। 17 सितंबर 2022 को नामीबिया से 8 अफ्रीकी चीतों को भारत लाया गया और उन्हें कुनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park) में छोड़ा गया। इसके बाद 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते लाए गए। इस प्रकार कुल 20 चीतों को भारत में लाकर छोड़ा गया, कुछ की मौत भी हो गई। आज इनकी आबादी बढ़कर 50 से ज्यादा हो चुकी है।
इसी तरह भारत ने स्नो लैपर्ड (Snow Leopard) और गैंडों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं।