Odisha Dalit Women Struggle : ओडिशा के नुआगांव आंगनबाड़ी केंद्र से दलित महिला कुक शर्मिष्ठा के संघर्ष की कहानी सामने आई है। इस केंद्र में उसके ज्वाइन करने के तीन महीने तक एक भी बच्चा नहीं आया। ग्रामीणों ने उसका बहिष्कार किया। अब प्रशासन की पहल के बाद वहां बच्चे पहुंचने लगे हैं। पत्रिका ने उनसे बातचीत की। पढ़िए पूरी खबर।
Odisha Dalit Women Sarmistha Sethi Struggle: देश में दलित और पिछड़ों को लेकर अभी भी समाज का रवैया बहुत ज्यादा बदला नहीं है। अभी ऐसा ही एक मामला ओडिशा के केंद्रपाड़ा जिले के नुआगांव (Anganwadi centre at Nuagaon, Odisha) से सामने आया है। नुआगांव के आंगनबाड़ी केंद्र में तीन महीने पहले एक 21 वर्षीय दलित सहायिका-सह-रसोइया की नियुक्ति हुई। समाज में अगड़ी जातियों के लोगों ने गोलबंद होकर यह फैसला लिया कि वह अपने बच्चों को इस केंद्र में नहीं भेजेंगे।
3 month boycott over Dalit cook in Odisha: आलम यह रहा कि तीन महीने तक वहां अजीबोगरीब सन्नाटा पसरा रहा और दलित युवती जातिगत खामोश उत्पीड़न की शिकार होती रही। शुक्र है कि प्रशासन के लगातार हस्तक्षेप से सन्नाटा टूटा और अब इस आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों ने सोमवार से आना-जाना शुरू कर दिया। यहां अब मुर्दा उदासी की जगह बच्चों की खिलखिलाहट पसरने लगी है।
शर्मिष्ठा सेठी ने 20 नवंबर 2025 को आधिकारिक रूप से केंद्रपाड़ा जिले के नुआगांव आंगनबाड़ी में सहायिका-सह-रसोइया के रूप में कार्यभार संभाला था। नवंबर से लेकर लगभग आधा फरवरी गुजर जाने तक शर्मिष्ठा यहां बच्चों को अपने हाथ का पका हुआ भोजन कराने का बेसब्री से इंतजार करती रही, लेकिन यहां इस अवधि में कोई फटका तक नहीं। इस केंद्र में ना ही तीन वर्ष से कम आयु के बच्चों के अभिभावक और ना ही स्तनपान कराने वाली माताएं पहुंचीं। केंद्र से स्तनपान कराने वाली माताओं को राशन दिया जाता है। यहां पढ़ने के लिए भी कोई बच्चा भी नहीं पहुंचा।
जिला प्रशासन के अधिकारियों ने ग्रामीणों के साथ कई दौर की बैठकें की। जागरूकता अभियान चलाए। जनसंपर्क प्रयास किए, तब जाकर ग्रामीण अपने बच्चों को केंद्र भेजने के लिए राजी हुए।
शर्मिष्ठा ने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि अभिभावक अपने बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्र लेकर पहुंच रहे हैं और उन्होंने आश्वासन दिया है कि वे उन्हें प्रतिदिन भेजेंगे। मैं चाहती हूं कि वे सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं का लाभ उठाएं। वह यहां पौष्टिक आहार ग्रहण करें। अच्छी शिक्षा प्राप्त करें। ये बच्चे इस गांव के और देश के भविष्य हैं।'
हमने जब उनके संघर्षों के बारे में उनसे बात की तो उन्होंने थोड़े से रूंधे गले से कहा, 'मैंने अपनी पढ़ाई के लिए बहुत संघर्ष किया है। मेरे पिता खेती-किसानी करते हैं। मेरे पिता के पास खेती का छोटा सा टुकड़ा है। वह धान की खेती करते हैं। मेरी मां गृहिणी है और वह खाली समय में पिताजी की खेतों में मदद करती है। मैं नौकरी कर रही हूं और अब मैं चाहती हूं कि मेरे घर के बच्चे भी पढ़-लिख लें। मैं उनकी मदद भी करती हूं। मैं अपने घरवालों का मेरे लिए किए संघर्ष को याद करती हूं। मैं अपने घरवालों की हरसभव मदद करती हूं और आगे भी करूंगी।'
आप यहां आने वाले बच्चों को क्या संदेश देना चाहते हैं? इस सवाल के जवाब में वह कहती हैं, 'जीवन में अगर किसी को पढ़ने का, जिंदगी में आगे बढ़ने का कोई मौका मिलता है तो उसे जरूर भुनाने की कोशिश करना चाहिए। संघर्ष से डरने की बजाय, खूब मेहनत करना चाहिए जिससे अगली पीढ़ी की राह आसान हो सके।
प्रशासन की पहल के बाद सोमवार को तीन से छह वर्ष आयु वर्ग के नामांकित 20 बच्चों में से 15 बच्चे केंद्र पहुंचे और शर्मिष्ठा द्वारा पकाया गया भोजन ग्रहण किया। छोटे बच्चों के अभिभावकों ने भी सरकारी राशन लेने पर सहमति जताई। स्थानीय बीजद विधायक ध्रुव साहू और वरिष्ठ अधिकारियों ने गांव का दौरा किया और बच्चों के साथ केंद्र तक पहुंचे।
केंद्रपाड़ा की बाल विकास परियोजना अधिकारी दीपाली मिश्रा ने मीडिया से बातचीत में कहा, 'यह समाज के लिए सकारात्मक संदेश है। वरिष्ठ जिला अधिकारियों ने ग्रामीणों की मांगों, जैसे आंगनवाड़ी केंद्र के लिए स्थायी भवन उपलब्ध कराने, को पूरा करने का आश्वासन दिया है।'
गांव के लोगों ने मीडिया से बताया कि शनिवार की बैठक के बाद ग्रामीणों का रुख बदल गया है और उन्होंने यह प्रण लिया है कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी। केंद्रपाड़ा के भाजपा सांसद बैजयंत पांडा ने रविवार को इस आंगनबाड़ी केंद्र का दौरा कर ग्रामीणों और सामुदायिक नेताओं के साथ भोजन किया। बैजयंत पांडा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, 'नुआगांव आंगनवाड़ी में बच्चों को पौष्टिक भोजन करते देखकर खुशी हुई। कल मैंने यहां का निरीक्षण किया और स्थानीय नेताओं व ग्रामीणों के साथ इकट्ठा बैठकर भोजन किया। बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए समुदाय को एकजुट होते देखना सुखद है।'
शर्मिष्ठा अपने गांव के अपने समुदाय की पहली स्नातक हैं। उन्होंने उड़िया भाषा में स्नातक की पढ़ाई की है। वह इस पद के लिए आवेदन करने वाली अपने गांव की एकमात्र उम्मीदवार थीं। इस नौकरी में उन्हें प्रति माह 5,000 रुपये का मानदेय मिलता है।
हालांकि, वह इस पद के लिहाज से अधिक शिक्षित हैं, लेकिन वह इस आय से अपने परिवार की आर्थिक मदद करना चाहती हैं और आगे चलकर शिक्षिका बनने का सपना पूरा करना चाहती हैं। इसके लिए वह प्रारंभिक बाल्य शिक्षा में दूरस्थ डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी कर रही हैं। उन्होंने कहा, 'वह गांव, समाज में शिक्षा की रोशनी से उजाला भरना चाहती है।
शर्मिष्ठा के संघर्ष को लेकर दलित अधिकारों और स्त्री अधिकारों को लेकर मुखर रहने वाली अनिता भारती ने पत्रिका से कहा कि एक तो स्त्री और उसके ऊपर दलित स्त्री होना, संघर्ष को और बढ़ा देता है। मैं शर्मिष्ठा के संघर्ष में हुई जीत के लिए उसे बधाई देती हूं और उसके इस काम में जो भी अधिकारी सहायक रहे, उन्हें धन्यवाद देती हूं।
अनिता पत्रिका के पाठकों से अहमदाबाद के पास की बस्तियों में कूड़ा बीनने वाली सविता बेन परमार की कहानी साझा करते हुए बताती हैं कि कभी सविता को लोग 'कूड़ा बीनने वाली' कहकर पुकारते थे। फैक्ट्री के पीछे पड़े जले-अधजले कोयले के टुकड़े चुनना ही उसकी रोज़ी थी। लेकिन वही हाथ, जिन्हें समाज ने 'गंदे काम' से जोड़ दिया था, आज सिरेमिक टाइल्स बनाने वाली फैक्ट्री चला रही हैं।
वह बताती हैं कि सविता के लिए दलित महिला होने के कारण गरीबी तो एक बड़ी चुनौती थी ही लेकिन उससे बड़ी चुनौती जाति की तय की गई ‘हद’ थी। समाज ने उसके लिए झाड़ू, कूड़ा और मज़दूरी की जगह तय कर रखी थी। मगर उसने उस जगह से उठकर उद्यमिता की राह चुनी। उसने एक दिन तय किया कि वह सिरेमिक का काम शुरू करेगी। यह कोई आसान बात नहीं थी क्योंकि यह काम अबतक पुरुषों का माना जाता था। सविताबेन ने इस काम के लिए छोटे-छोटे सौदे किए। उधार लिया। घाटा भी उठाया और धीरे-धीरे अपनी फैक्ट्री खड़ी की। आज उसकी फैक्ट्री में वही लोग काम कर रहे हैं, जिन्हें समाज अक्सर गन्दे गरीब कहकर किनारे कर देता है। साविताबेन की जीत करोड़ों के कारोबार से कहीं बड़ी है। असली जीत यह है कि गुजरात की एक दलित महिला को अब लोग “उद्यमी” बुलाते हैं। जिन हाथों को अपवित्र कहा गया था, वही हाथ आज रोज़गार रच रहे हैं।
वह कहती हैं, 'दलित महिला की व्यक्तिगत सफलता तभी मायने रखती है जब वह सामूहिक आत्मसम्मान में बदलती है। साविताबेन परमार या शर्मिष्ठा की कहानी से यह साबित होता है कि जाति व्यवस्था की दीवारें एक-एक ईंट निकालकर भी गिराई जा सकती हैं।'