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Dengue : भारत बनाम 5 देश: डेंगू से जंग में किसकी रणनीति सबसे कारगर?

Dengue drone surveillance : श्रीलंका के बाद अब भारत में भी डेंगू के खिलाफ ड्रोन से निगरानी शुरू! जानिए कैसे 'फ्लाइंग कैमरे' और दवा के छिड़काव से रुकेगा मच्छरों का प्रकोप। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
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Jul 25, 2026
Dengue drone surveillance sri lanka model India
ड्रोन vs डेंगू: जंग शुरू!( AI)

Dengue Fever : हर साल मानसून के दस्तक देते ही दक्षिण एशियाई देशों में एक पुरानी और खौफनाक बीमारी फिर से सिर उठाने लगती है डेंगू। डेंगू और मलेरिया फैलाने वाले मच्छर इंसानी आबादी के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहे हैं। लेकिन इस बार मच्छरों और स्वास्थ्य विभागों के बीच छिड़ी इस जंग में एक नया और आधुनिक योद्धा शामिल हो गया है। वह है ड्रोन (Drone)।

हाल ही में श्रीलंका ने डेंगू के बढ़ते मामलों पर काबू पाने के लिए आसमान से निगरानी और ड्रोन तकनीक का सहारा लिया है। श्रीलंका की इस पहल के बाद अब भारत में भी यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या 'फ्लाइंग कैमरे' और एंटी-लार्विसाइड स्प्रे करने वाले ड्रोन भारत की शहरी स्वास्थ्य व्यवस्था की किस्मत बदल सकते हैं?

श्रीलंका का 'ड्रोन मॉडल': क्यों पड़ी आसमान से निगरानी की जरूरत?

श्रीलंका में इस साल डेंगू के मामलों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई। 70,000 से अधिक लोग इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि सरकार को सेना और वायुसेना की मदद लेनी पड़ी।

डेंगू फैलाने वाला एडीज (Aedes) मच्छर साफ और ठहरे हुए पानी में पनपता है। श्रीलंका के कोलंबो जैसे घने आबादी वाले शहरों में बहुमंजिला इमारतों की छतों, बंद पड़े घरों, गटर और छतों पर पड़ी पानी की टंकियों में पानी जमा हो जाता है। स्वास्थ्य कर्मियों के लिए हर घर की छत पर चढ़कर जांच करना लगभग असंभव था।

ऐसे में श्रीलंका की वायुसेना ने स्पेशल मिलिट्री ड्रोन उतारे। ये ड्रोन हवा में उड़कर इमारतों की छतों की हाई-रिज़ॉल्यूशन फोटो और वीडियो लेते हैं, जहां भी जमा पानी दिखता है, उसकी मैपिंग की जाती है और फिर नगर निगम की टीमें तुरंत वहां पहुंचकर दवा का छिड़काव करती हैं।

क्या भारत के लिए यह मॉडल वरदान साबित होगा?

भारत के मेट्रो शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता कंक्रीट के जंगल हैं। मानसून के दौरान यहां पानी जमा होने के चलते समस्या विकराल रूप ले लेती है।

जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (जैसे आशा वर्कर या नगर निगम के कर्मचारी) के सामने कई सीमाएं होती हैं:

  • निजी संपत्तियों में प्रवेश न मिलना: कई बार लोग कर्मचारियों को अपने घर या छत पर जाने की अनुमति नहीं देते।
  • ऊंची और असुरक्षित इमारतें: बंद पड़े कंस्ट्रक्शन साइट्स और बहुत ऊंची इमारतों की छतों की जांच करना जानलेवा हो सकता है।
  • कर्मचारियों की कमी: लाखों की आबादी वाले शहरों में गिने-चुने स्वास्थ्यकर्मी हर नुक्कड़ तक नहीं पहुंच सकते।
  • 'ड्रोन सर्विलांस' (Drone Surveillance) भारत के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। एक ड्रोन महज 15 से 20 मिनट में कई एकड़ के इलाके की सटीक स्कैनिंग कर सकता है।

भारत में जमीनी हकीकत: कहां-कहां हो रहा है इस्तेमाल?

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भारत श्रीलंका के इस मॉडल से पूरी तरह अंजान नहीं है। भारत के कई प्रगतिशील शहरों में परीक्षण के तौर पर ड्रोन का उपयोग शुरू भी हो चुका है।

  • मध्य प्रदेश (इंदौर): देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर ने डेंगू के खिलाफ जंग में ड्रोन का इस्तेमाल किया है। यहाँ बड़े तालाबों और सीवेज लाइनों में ड्रोन से सीधे दवा का छिड़काव (Anti-larvae Spraying) किया गया।
  • उत्तर प्रदेश (लखनऊ और वाराणसी): घने रिहायशी इलाकों और गंगा के मैदानी इलाकों के आसपास जमा पानी का पता लगाने के लिए लखनऊ और वाराणसी नगर निगम ने भी ड्रोन सर्वे की मदद ली है।
  • दक्षिण भारत के शहर: बेंगलुरु और चेन्नई में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स के तहत ड्रोन मैपिंग के जरिए ऐसे स्पॉट्स पहचाने गए हैं जहां मच्छरों के प्रजनन की संभावना सबसे अधिक होती है।

ड्रोन कैसे करता है काम?

  • थर्मल और हाई-डेफिनिशन मैपिंग: ड्रोन में लगे कैमरे जमा पानी की सतह से परावर्तित होने वाली रोशनी और तापमान के अंतर को पहचान लेते हैं। इससे पता चल जाता है कि पानी कितने दिनों से ठहरा हुआ है।
  • स्प्रे ड्रोन (Spray Drones): ये विशेष प्रकार के भारी ड्रोन होते हैं जिनमें एंटी-लार्विसाइड (लार्वा नष्ट करने वाली दवा) का टैंक लगा होता है। यह उन नालों या झीलों में दवा छिड़कते हैं जहाँ इंसान आसानी से नहीं पहुंच सकते।

चुनौतियां: क्या सब कुछ इतना आसान है?

भले ही यह तकनीक बहुत आकर्षक और प्रभावी लगती हो, लेकिन भारत जैसे विशाल देश में इसे पूरी तरह लागू करने में कुछ प्रमुख चुनौतियां भी हैं।

  • भारी लागत (High Cost): एडवांस सेंसर और कैमरों वाले ड्रोन काफी महंगे आते हैं। छोटे नगर निगमों के लिए इन्हें खरीदना और बनाए रखना बजट के बाहर हो सकता है।
  • निजता का मुद्दा (Privacy Concerns): रिहायशी इलाकों के ऊपर ड्रोन उड़ाने से आम नागरिकों की प्राइवेसी प्रभावित हो सकती है।
  • नो-फ्लाई ज़ोन (No-Fly Zones): हवाई अड्डों, सैन्य ठिकानों और वीआईपी इलाकों के पास ड्रोन उड़ाने पर सख्त कानूनी पाबंदियां होती हैं, जिसके लिए लंबी कागजी कार्रवाई की जरूरत होती है।

Detailed Analysis : पड़ोसी देश में क्या हैं हालात?

श्रीलंका (Sri Lanka): तकनीक आधारित सख्त निगरानी

  • स्थिति: श्रीलंका में डेंगू की स्थिति काफी संवेदनशील रहती है। मानसून के दौरान रोजाना सैकड़ों मामले सामने आते हैं।
  • विशेषता: यहां सरकार स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए सेना और ड्रोन जैसी तकनीकों का सीधे इस्तेमाल करती है। छतों पर जमा पानी को ढूंढने के लिए मिलिट्री ड्रोन उड़ाए जाते हैं और लापरवाही बरतने वाले मकान मालिकों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है।

बांग्लादेश (Bangladesh): उच्च मृत्यु दर की चुनौती

स्थिति: पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश (विशेषकर ढाका) डेंगू के सबसे खतरनाक दौर से गुजरा है।

विशेषता: बांग्लादेश में डेंगू के म्यूटेंट स्ट्रेन और समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण मृत्यु दर अन्य एशियाई पड़ोसियों की तुलना में चिंताजनक रही है। यहां बहुमंजिला इमारतों के बेसमेंट और कंस्ट्रक्शन साइट्स मच्छरों के मुख्य अड्डे हैं।

भारत (India): विशाल पैमाना और आधुनिक प्रयोग

स्थिति: भारत में डेंगू अब केवल शहरों तक सीमित न रहकर छोटे कस्बों में भी तेजी से पैर पसार चुका है।

विशेषता: भारत के पास विशाल स्वास्थ्य ढांचा है, फिर भी आबादी के बड़े पैमाने के कारण प्रबंधन चुनौतीपूर्ण रहता है। हालांकि, इंदौर, लखनऊ, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहर अब डेंगू कंट्रोल के लिए ड्रोन सर्विलांस, AI मैपिंग और स्मार्ट ऐप जैसे डिजिटल टूल्स अपना रहे हैं।

पाकिस्तान (Pakistan): प्राकृतिक आपदाओं और संसाधनों का असर

स्थिति: पाकिस्तान में लाहौर, कराची और रावलपिंडी जैसे बड़े शहर हर साल डेंगू की चपेट में आते हैं।

विशेषता: हाल के वर्षों में आई विनाशकारी बाढ़ ने स्थिति को और गंभीर बनाया है। स्थिर पानी जमा रहने और संसाधनों की कमी के कारण पाकिस्तान में फॉगिंग और पारंपरिक दवा के छिड़काव पर ही अधिक निर्भरता है।

अफ्रीका महाद्वीप (Africa Region): 'अदृश्य' डेंगू की समस्या

स्थिति: अफ्रीका में डेंगू व्यापक रूप से फैला है, लेकिन इसे "Silent Threat" कहा जाता है।

विशेषता: अफ्रीका में मलेरिया और येलो फीवर का प्रकोप ज्यादा होने के कारण डेंगू के मामलों की समय पर पहचान या रिपोर्टिंग नहीं हो पाती। तकनीक का उपयोग बहुत सीमित है और अधिकांश देशों में ब्लड-टेस्टिंग सुविधाओं की भारी कमी है।

डॉ. के.बी.बाड़ोलिया के साथ पत्रिका की बातचीत

डेंगू के मरीज अक्सर सिरदर्द या बदन दर्द के लिए पेनकिलर (जैसे एस्पिरिन या इबुप्रोफेन) ले लेते हैं। यह कितना खतरनाक हो सकता है और सिर्फ कौन सी दवा सुरक्षित है?

डेंगू बुखार के दौरान होने वाले तीव्र सिरदर्द और बदन दर्द (Breakbone Fever) से राहत पाने के लिए इबुप्रोफेन (Ibuprofen), एस्पिरिन (Aspirin), डिक्लोफेनाक (Diclofenac) या मेफेनामिक एसिड जैसी एनएसएआईडी (NSAIDs - Non-Steroidal Anti-inflammatory Drugs) दवाएं लेना बेहद खतरनाक और जानलेवा साबित हो सकता है। इसमें इंटरनल ब्लीडिंग (आंतरिक रक्तस्राव) का खतरा और डेंगू में शरीर के प्लेटलेट्स (Platelets) का स्तर पहले से ही तेजी से गिरता है। एस्पिरिन और इबुप्रोफेन जैसी दवाएं खून को पतला (Blood Thinning) कर देती हैं। इससे पेट, मसूड़ों या आंतों में आंतरिक रक्तस्राव होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

  • डेंगू हेमोरेजिक फीवर (DHF): गलत पेनकिलर लेने से सामान्य डेंगू का बुखार 'डेंगू हेमोरेजिक फीवर' या 'डेंगू शॉक सिंड्रोम' जैसी गंभीर और जानलेवा स्थिति में बदल सकता है।
  • लिवर और पेट को नुकसान: डेंगू वायरस का असर लिवर पर भी होता है। भारी पेनकिलर्स लेने से लिवर टॉक्सिसिटी और पेट में अल्सर की समस्या बढ़ जाती है।

कौन सी दवा सबसे सुरक्षित है?

  • केवल पैरासिटामोल (Paracetamol): डेंगू में बुखार और बदन दर्द से राहत पाने के लिए केवल पैरासिटामोल ही सबसे सुरक्षित विकल्प है।
  • खुराक पर ध्यान दें: पैरासिटामोल की भी ओवरडोज से बचें। एक दिन में डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही सीमित मात्रा में लें और दवा लेते समय सही हाइड्रेशन (पर्याप्त पानी/तरल पदार्थ) जरूर बनाए रखें।

डेंगू के मरीज को घर पर क्या खाना चाहिए और डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) से बचने के लिए सबसे सही डाइट क्या है?

डेंगू में मरीज के शरीर का हाइड्रेटेड रहना और आसानी से पचने वाला पौष्टिक भोजन मिलना ही सबसे बड़ा इलाज है।

  • नारियल पानी: इलेक्ट्रोलाइट्स का प्राकृतिक स्रोत है, जो कमजोरी दूर करता है।
  • ORS (ओआरएस) और नींबू पानी: शरीर में नमक और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखते हैं।
  • ताजा छाछ, सूप और दाल का पानी: पचने में आसान होते हैं और शरीर को ताकत देते हैं।
  • सादा पानी: दिन में कम से कम 3-4 लीटर तरल पदार्थ (Fluids) का सेवन करें।

घर पर क्या खाना चाहिए?

  • हल्का और सुपाच्य भोजन: मूंग दाल की खिचड़ी, दलिया, उबले आलू और पतली साबूदाने की खीर खाएं।
  • एंटीऑक्सीडेंट युक्त फल: अनार (हीमोग्लोबिन के लिए), कीवी, पपीता, सेब और संतरा (विटामिन C) का सेवन करें।
  • हरी सब्जियां: उबली हुई लौकी, तोरई और गाजर पचाने में आसान होती हैं।
  • क्या न खाएं: तला-भुना, मसालेदार, कैफीन (चाय/कॉफी) और पैकेज्ड जूस से बचें।

कई देश और भारत के शहर अब डेंगू के खिलाफ ड्रोन से दवाओं का छिड़काव और मैपिंग कर रहे हैं। एक डॉक्टर के तौर पर आप मच्छरों के लार्वा को खत्म करने में तकनीक के इस इस्तेमाल को कितना प्रभावी मानते हैं?

एक डॉक्टर और जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ के तौर पर, डेंगू के खिलाफ ड्रोन से मैपिंग और लार्वा-रोधी दवा के छिड़काव को मैं एक अत्यंत प्रभावी और आधुनिक पहल मानता हूं।

  • सटीक और त्वरित पहचान: डेंगू फैलाने वाला 'एडीज' मच्छर साफ और ठहरे पानी में पनपता है। बहुमंजिला इमारतों की छतों, बंद पड़ी कंस्ट्रक्शन साइट्स और खुले बड़े नालों तक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का पहुंचना कठिन होता है। ड्रोन थर्मल कैमरों और मैपिंग के जरिए मिनटों में इन 'हॉटस्पॉट्स' का पता लगा लेते हैं।
  • लार्विसाइड स्प्रे में दक्षता: ड्रोन के जरिए जमा पानी में 'एंटी-लार्विसाइड' दवा का छिड़काव करने से मच्छरों के लार्वा शुरुआती चरण में ही नष्ट हो जाते हैं, जिससे वयस्क मच्छरों की आबादी अचानक बढ़ने से रुकती है।
  • समय और संसाधनों की बचत: यह तकनीक स्वास्थ्य कर्मियों के श्रम और समय को 10 गुना तक बचाती है।

क्या डेंगू से बचाव के लिए कोई टीका (Vaccine) उपलब्ध है या आने वाले समय में इसकी क्या उम्मीद है?

हां, वैश्विक स्तर पर डेंगू से बचाव के लिए टीके (Vaccines) उपलब्ध हैं, और भारत में भी जल्द ही इसके आने की बड़ी उम्मीद है।

  • वैश्विक स्थिति Dengvaxia (सैनोफी पाश्चर): यह पहली डेंगू वैक्सीन है, जिसे अमेरिका (FDA) और कई देशों में मंजूरी मिली हुई है। यह मुख्य रूप से केवल उन्हीं लोगों को दी जाती है जिन्हें पहले कम से कम एक बार डेंगू हो चुका हो।
  • Qdenga (टाकेडा): यह दूसरी और अधिक उन्नत वैक्सीन है, जिसे यूरोप, इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे कई देशों में मंजूरी मिल चुकी है। यह उन लोगों को भी दी जा सकती है जिन्हें पहले कभी डेंगू नहीं हुआ है।

भारत में क्या है स्थिति और भविष्य की उम्मीद?

भारत में Qdenga और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के सहयोग से स्वदेशी डेंगू वैक्सीन (जैसे सेरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक द्वारा) के फेज़-3 क्लिनिकल ट्रायल्स (Clinical Trials) तेज़ी से चल रहे हैं।

हमारे पाठकों के लिए कोई एक ऐसी सलाह या संदेश, जिससे वे डेंगू के डर से बच सकें और सही समय पर सही कदम उठा सकें?

डेंगू एक ऐसी बीमारी है जिससे घबराने की बिलकुल जरूरत नहीं है, बल्कि समझदारी और सही समय पर सही कदम उठाने की जरूरत है।

  • सप्ताह में केवल 10 मिनट दें: हर सप्ताह अपने घर, बालकनी और आसपास जमा पानी (कूलर, गमले, पक्षियों के बर्तन) को खाली करें। अगर मच्छर का लार्वा ही नहीं पनपेगा, तो बीमारी फैलेगी ही नहीं।
  • सही समय पर सही जांच: बुखार आने पर पैनिक होकर तुरंत दर्जनों टेस्ट न कराएं। 24 से 48 घंटे तक बुखार रहने पर ही डॉक्टर की सलाह से जांच (NS1/CBC) करवाएं।
  • तरल पदार्थ ही असली दवा है: डेंगू का सबसे बड़ा इलाज मरीज को हाइड्रेटेड रखना है। नींबू पानी, नारियल पानी और ओआरएस (ORS) का सेवन लगातार करते रहें और बिना डॉक्टर की सलाह के कोई पेनकिलर (जैसे इबुप्रोफेन या एस्पिरिन) न लें।
Updated on:
25 Jul 2026 11:13 am
Published on:
25 Jul 2026 11:13 am