पाकिस्तान के लयारी में 27 पुस्तकालयों में से अब सिर्फ 11 रह गई हैं। सबसे बड़ी लाइब्रेरी की जगह सिविक सेंटर का निर्माण किया गया। वहीं पेशावर में अफगानी गायकों, नर्तकों पर सरकारी चाबुक चलाकर उन्हें बर्बाद किया जा रहा है। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Lyari libraries closing News : बॉलीवुड की फिल्म 'धुरंधर' में अक्षय खन्ना (Dhurandhar's Actor Akshaye Khanna) के एक डांस वीडियो ने वायरल के सारे रिकॉर्ड्स तोड़ डाले तो दूसरी ओर उन्हें 2025 में सबसे बड़ा हिट हीरो का दर्जा भी दिला दिया। उन्होंने एक अरबी गाने FA9LA (फ़स्ला) पर डांस किया है और इस फिल्म में उनका किरदार पाकिस्तान स्थित लयारी के रहमान डकैत (Story of Pakistan's Lyari) का है। यह जगह कराची के बीचोंबीच स्थित है। अब लयारी से एक खबर आई है कि करीब तीन दशक पहले लयारी में 27 बड़े पुस्तकालय (Pakistan's Layari Library) हुआ करता था। अब उनकी संख्या घटकर 11 रह गई और दो दशकों से नई किताबें भी आनी बंद हो गई।
Afghan singers leaving Peshawar : पाकिस्तान के एक दूसरे शहर पेशावर से संगीत की बर्बादी की भी खबर आई है। पेशावर में अफगानी गायकों की धूम रहती थी, अब उन्हें पाकिस्तान की डिपोर्टेशन पॉलिसी के चलते दर-ब-दर होना पड़ रहा है। किताब, गीत, संगीत, नृत्य अगर दुनिया में खत्म हो जाए क्या होगा, इस बारे में हंस ट्रस्ट की प्रबंध निदेशक, कथक नृत्यांगना और कॉरियोग्राफर रचना यादव ने पत्रिका से बातचीत में कहा- 'पाकिस्तान से दोनों ही खबरों को लेकर अचंभित हूं। किताब, गीत, संगीत के बगैर तो समाज पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा। पाकिस्तान में गीत, संगीत, शायरी की बड़ी अच्छी परंपरा रही है। अगर हुक्मरान और समाज उन्हें सहेजने और बढ़ाने की बजाय खत्म करना चाहता है तो यह निगेटिव ग्रोथ की ओर ले जाएगा। किसी भी व्यक्तित्व का मुकम्मल विकास गीत, संगीत, नृत्य, किताब, खेल के बगैर नहीं हो सकता है।'
कराची के लयारी में सबसे पहले मुल्ला फ़ाज़िल हॉल पुस्तकालय की स्थापना 1980 के दशक में हुई। यहां पूरे शहर के छात्र आते और किताबें पढ़ते। आज लयारी में मुल्ला फाजिल पुस्तकालय की जगह एक 'मिनी सिविक सेंटर' बना दिया गया है। सिंध सरकार ने 2022 के अंत में एक अधिसूचना जारी कर पुस्तकालय को ध्वस्त करने की घोषणा कर दी। सिंध सरकार ने 2 जनवरी 2023 को सिविक सेंटर के निर्माण का ठेका दिया। इस योजना के तहत एक तहखाना और पांच मंजिला इमारत बनाने का निर्णय लिया गया। कुछ दिनों के बाद इस योजना में छठी मंजिल शामिल की गई। इस योजना में पुस्तकालय, पुस्तकें और पाठकों के लिए कहां जगह होगी, शामिल नहीं किया गया।
लयारी साहित्यिक मंच के अध्यक्ष इमरान ने पाकिस्तानी मीडिया को बताया कि हम बलूच-आधारित साहित्यिक समूह के बैनर के तहत 2017 से इस इलाके में अध्ययन मंडलियां आयोजित करते आ रहे हैं। वह पुस्तकालय को याद करते हुए कहते हैं कि मुल्ला फाजिल पुस्तकालय उनके समूह के लिए घर जैसा था। वहां होने वाली सभाओं में, साहित्य से लेकर कला, समाजशास्त्र, दर्शन और अन्य विषयों पर घंटों चर्चाएं और बहसें चलती रहती थीं।
मुल्ला फाजिल पुस्तकालय में कुल 10,000 पुस्तकें थीं, जिनमें से केवल 7,000 ही अपने नए स्थान पर पहुंच पाईं। लयारी में पुस्तकालयों के तत्कालीन प्रभारी अकबर फैज ने स्थानीय मीडिया को बताया, 'पुस्कालय के स्थानांतरण के दौरान बहुत सी पुस्तकें और अलमारियां खो गईं।' मुल्ला फजल लाइब्रेरी को फुटबॉल हाउस में अस्थाई तौर पर पनाह दी गई है।
कराची के सबसे पुराने मोहल्लों में से एक लयारी दशकों से पाकिस्तान के साहित्यिक जगत की बड़ी हस्तियों को आकर्षित करता रहा है। प्रसिद्ध शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के लिए यह इलाका घर जैसा था। फ़ैज़ यहां अक्सर पढ़ाने, लिखने और पढ़ने आते थे। यहां उनके लिए शायरी की महफिलें भी सजाई जाती थीं। मुहम्मद बेग बलूच भी लयारी के ही एक बड़े साहित्यकार हैं, जिन्होंने उर्दू, अंग्रेजी, सिंधी और फ़ारसी में कई पुस्तकें लिखने के साथ-साथ कई प्रमुख साहित्यिक कृतियों का बलूची भाषा में अनुवाद भी किया।
लयारी के इतिहास और सामाजिक ताने-बाने पर सात पुस्तकें लिख चुके रमज़ान बलूच ने 1960 के दशक से इस प्रगति और पतन को देखा है। उन्होंने बताया, “1962 में लयारी में 27 नगर पालिका इकाइयां थीं, जिनमें से प्रत्येक में निर्वाचित सदस्य और एक अध्यक्ष होते थे। उस समय एक अध्यादेश के तहत प्रत्येक इकाई में वाचनालय बनाना अनिवार्य था – ऐसी जगहें जहां लोग काम पर जाने से पहले या शाम को घर लौटने के बाद अखबार और किताबें पढ़ने आते थे। इसके लिए अलग से बजट भी रखा गया था।”
1992 में लयारी में 27 पुस्तकालय थे। 2000 के दशक की शुरुआत में यह संख्या घटकर 11 रह गई और 2005 के बाद नई पुस्तकों का आना बंद हो गया।
वहीं पाकिस्तान के पेशावर शहर को अफगानी संगीतकारों की कई पीढ़ियों को पनाह देने के लिए जाना जाता था। इनमें वे संगीतकार भी शामिल थे जिन्होंने तालिबान से त्रस्त होकर अपने वतन से मजबूरी में दूर होकर ही सही अपने देश की समृद्ध गीत-संगीत परंपरा को संरक्षित रखा। लेकिन शादी के हॉलों, संगीत कार्यक्रमों के मंचों और अपार्टमेंट्स में गूंजने वाली लय अब खामोश होती जा रही है। यह पाकिस्तानी सरकार की नई निर्वासन नीति के चलते हो रहा है। पिछले साल से अब तक 10 लाख अफगानियों को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया जा चुका है।
इन 10 लाख लोगों में अफ़गान कलाकारों का वह समुदाय भी शामिल है, जो दशकों से यहां फल-फूल रहे थे। इनमें कालीन बुनकर और नर्तक भी शामिल हैं। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में वर्षों से चल रह युद्ध और राजनीतिक अस्थिरता से भाग रहे लाखों अफ़गानों को शरण दी। पहले 1980 के दशक में सोवियत आक्रमणकारियों से और बाद में 1990 में तालिबान से पस्त होने के बाद।
तालिबान ने 1990 के दशक में और 2021 में सत्ता पर पुनः कब्जा करने के बाद से संगीत पर प्रतिबंध लगाया है। कलाकारों को बड़े पैमाने पर सताया है। शासकों ने कलाकारों के वाद्य यंत्रों को आग के हवाले कर दिया या तोड़ डाले।
पाकिस्तानी अधिकारियों ने वर्ष 2023 से सार्वजनिक रूप से तालिबान सरकार पर पाकिस्तान को निशाना बनाने वाले विद्रोहियों का समर्थन करने का आरोप लगाया है और जवाबी कार्रवाई में लाखों अफगानों को अवैध घोषित कर दिया है, जिनमें वे लोग भी शामिल हैं जो तालिबान के सत्ता संभालने के बाद भाग गए थे।
इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार अफगानी नागरिक और संगीत प्रेमी जमरी अपने पास 2000 कैसेट टेपों के बारे में कहते हैं, 'मैं इन्हें अफगानिस्तान नहीं ले जा सकता क्योंकि तालिबान इन्हें जला देंगे।' जमरी 1980 के दशक में अफगानिस्तान से भागकर पाकिस्तान के पेशावर आए थे। 52 वर्षीय जमरी के पास 1950 के दशक से लेकर अब तक की रिकॉर्डिंग का एक निजी संग्रह है।
निर्वासित अफगान कलाकारों ने पड़ोसी देशों, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में भी अफगान संगीत को जीवित रखा है। लेकिन पाकिस्तान और विशेष रूप से पेशावर में संगीतकारों का इतना समृद्ध विकास कहीं और नहीं हुआ है। अफगानिस्तान की सबसे मशहूर गायिका कमर गुला 1980 के दशक के शुरुआती दौर में पाकिस्तान आई थीं। उनकी प्रसिद्धि 1979 में सोवियत आक्रमण के खिलाफ प्रतिरोध के गीत गाने के चलते हुई थी।
1990 के दशक में अफगानिस्तान गृहयुद्ध में डूब गया था। गीत, संगीत, नृत्य से जुड़े पेशेवर बड़ी संख्या में जान बचाने के लिए पाकिस्तान के पेशावर पहुंचे और यहां तबला और रुबाब (एक वाद्य यंत्र) की ताल पर प्रदर्शन करने लगे। स्थानीय पाकिस्तानी कलाकारों और वहां रह रहे साथी अफगान संगीतकारों ने नए आने वालों का स्वागत किया। यहां के छोटे-छोटे अपार्टमेंट अस्थायी प्रतिभा एजेंसियों में तब्दील हो गए। पाकिस्तान में होने वाली शादियों के लिए अफगान बैंड किराए पर लेने का चलन बढ़ता गया। पाकिस्तानी मीडिया समाचार रिपोर्टों के अनुसार, 2000 के दशक की शुरुआत तक पेशावर में 500 से अधिक अफगान संगीतकार रहते थे।
वर्ष 2021 में तालिबान ने दूसरी बार अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। अफ़गान कलाकारों की एक नई पीढ़ी ने दोबारा से पेशावर की ओर रुख किया। अब उनके गाने टिकटॉक और यूट्यूब पर प्रचारित किए जा रहे हैं। पश्तो गायक बरयाली वली के बारे में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, 2021 में तालिबान द्वारा सत्ता हथियाने के एक महीने बाद अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अपने वाद्य यंत्र छिपाए और सीमा पार कर पाकिस्तान चले गए।
अफगानिस्तान राष्ट्रीय संगीत संस्थान के निर्वासित संस्थापक अहमद सरमस्त ने मीडिया से बताया कि सत्ता पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के बाद से तालिबान ने धीरे-धीरे अपने शासनकाल के पहले दौर जैसी ही दमनकारी सांस्कृतिक नीतियां लागू कर दी हैं। उन्होंने कहा, 'अब अफगानिस्तान शायद दुनिया का एकमात्र मौन राष्ट्र है।'
कॉस्ट्स ऑफ वॉर प्रोजेक्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में चल रहे संघर्ष में अबतक 176,000 लोग मारे गए, जिसमें 46,319 नागरिक, 69,095 सैन्य और पुलिसकर्मी और कम से कम 52,893 विपक्षी लड़ाकों की जान जा चुकी है।