Diabetes reversible series: पत्रिका की इस खास सीरीज के पहले भाग में हम आपको लेकर जा रहे हैं सेहत की उन गलियों में जहां से हुई जरा सी लापरवाही पूरी दुनिया की सेहत के लिए खतरा बन गई। हम अक्सर पूछते हैं कि भारत डायबिटीज की राजधानी क्यों बन गया? इस सवाल का जवाब इतिहास के पन्नों में छिपा है, जानें कैसे 1970 की एक रिपोर्ट ने हमारी थाली बदल दी... और भारत एक 'डायबिटीज महामारी' बन कर उभरा।
Diabetes reversible: आज भारत को सिर्फ भारत नहीं बल्कि दुनिया की डायबिटीज कैपिटल के रूप में जाना जाता है। कहा भी क्यों न जाए? क्योंकि यहां हर दूसरे घर में एक शुगर का मरीज है और हर कोई मीठा खाने से डर रहा या फिर अपनों को रोक रहा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है हमारे पूर्वज जो खूब घी-शक्कर और दूध-दही खाते थे… उन्हें यह बीमारी क्यों नहीं थी? क्या यह सिर्फ हमारी बदलती लाइफ स्टाइल है या इसके पीछे कोई वैश्विक कहानी है…?
patrika.com ने जाना डायबिटीज का खौफनाक इतिहास, एक ऐसा सच जो हमसे बरसों तक छिपाया गया और फिर एक दिन किसी बुलबुले सा फुटकर दुनिया के सामने आ गया। अमरीका से शुरू हुई ऐसी कहानी जिसकी एक जरा सी लापरवाही ने भारत ही नहीं बल्कि, पूरी दुनिया की थाली और सेहत बदलकर रख दी। पढ़ें संजना कुमार की 'Diabetes Reversible' सीरीज में भारत में बीमारी की शुरुआत से लेकर लक्षण, असर और ट्रीटमेंट के साथ ही आजकल ट्रेंड में आया रिवर्सेबल डायबिटीज का पूरा सच सिलसिलेवार…
बात 1970 के दशक की है। अमरीका में दिल की बीमारियों के मामले अचानक बढ़ने लगे। वहां की सरकार ने आनन-फानन में एक कमेटी बनाई (McGovern Committee)। 1977 में एक रिपोर्ट जारी हुई जिसने पूरी दुनिया को एक ही मंत्र दिया 'फैट (Fat) दुश्मन है और अनाज (Carbs) दोस्त।' उस समय अमरीका ने अपना प्रसिद्ध 'फूड पिरामिड' बनाया। इस पिरामिड में सलाह दी गई कि एक स्वस्थ इंसान को अपनी डाइट का 60% हिस्सा ब्रेड, पास्ता, चावल और अनाज से लेना चाहिए। वहीं घी, मक्खन, अंडे जैसी चीजों को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। इसी को 'मजदूरों वाली डाइट' या 'लो-फैट डाइट' कहा गया। क्योंकि यह सस्ती थी और पेट भरकर इंस्टेंट एनर्जी देने वाली डाइट थी। लेकिन पोषण की जगह यह शरीर में ग्लूकोज का अंबार लगा रही थी।
यह वही समय था जब भारत अनाज की भारी कमी से जूझ रहा था। जिसे देखते हमने अमरीका से गेहूं का आयात करना शुरू किया और 'हरित क्रांति' के दौर में हमारा पूरा फोकस मोटे अनाज (बाजरा, रागी, कोदो) से हटकर हाई-यील्ड गेहूं और चावल पर आ गया। भारत ही नहीं दुनिया भर के कई देशों ने अनजाने में अमरीका के उस 'लो-फैट' मॉडल को आधुनिकता मानकर फॉलो करना शुरू कर दिया। लेकिन भारत के लोग अलग थे। हमने शुद्ध सरसों तेल और घी छोड़कर 'रिफाइंड वेजिटेबल ऑयल' अपनाने शुरू कर दिए। हमने सुबह नाश्ते में दलिये की जगह 'कॉर्नफ्लेक्स' और 'ब्रेड' को मेज पर सजा लिया। नतीजा? जो शरीर सदियों से कॉम्प्लेक्स अनाज (मोटा अनाज) पचाने के लिए बना था, उसे अचानक 'रिफाइंड शुगर' और 'मैदे' ने तगड़ा झटका दे दिया।
मामले में हार्ट, अस्थमा और डायबिटीज एक्सपर्ट डॉ. विनोद कोठारी ने बताया कि कैसे उस समय टाइप- 2 डायबिटीज शुरु हुई होगी। उन्होंने बताया कि 'जब हम अनाज (Carbs) खाते हैं, तो शरीर उसे ग्लूकोज में बदलता है। इस ग्लूकोज को सेल तक पहुंचाने का काम 'इंसुलिन' करता है। लेकिन जब पूरी दुनिया ने लो-फैट के नाम पर हाई-कार्ब खाना शुरू किया, तो शरीर में इंसुलिन का स्तर कभी-कभी नहीं, हमेशा ही ऊंचा रहने लगा। नतीजा ये हुआ कि धीरे-धीरे कोशिकाओं ने इस इंसुलिन को पहचानना बंद कर दिया, जिसे मेडिकल भाषा में इंसुलिन रेजिस्टेंस (Insulin Resistance) कहते हैं। इंसुलिन रेजिस्टेंस ही टाइप-2 डायबिटीज की असली जड़ है।'
JAMA Internal Medicine जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रांसिस्को के डॉ. क्रिस्टिन कियर्न्स, उनके साथ हार्वर्ड और UCSF के अन्य शोधकर्ताओं की टीम ने यह आरोप लगाए कि 1960 में शुगर रिसर्च फाउंडेशन अब शुगर एसोसिएशन ने हार्वर्ड के कुछ वैज्ञानिकों को फंडिग दी, ताकि वे ऐसी रिसर्च प्रकाशित करें जिसमें दिल की बीमारी के लिए वसा (FAT) को मुख्य कारण माना जाए। वहीं चीनी (Sugar) के नुकसान को कम करके आंका जाए और शो किया जाए।
1967 की न्यू इंग्लैंड जर्नल मेडिसिन स्टडी में दावा किया गया कि इस जर्नल में प्रकाशित एक रिव्यू पेपर को शुगर इंडस्ट्री ने फंड दिया था, लेकिन उस समय फंडिंग का खुलासा नहीं किया गया। उस पेपर में निष्कर्ष निकाला गया कि हृदय रोग का बड़ा कारण सैचुरेटेड फैट है, चीनी नहीं। इसे बड़ी साजिश माना गया।
हालांकि कोलंबिया यूनिवर्सिटी और सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क के इतिहासकारों ने उन दावों को चुनौती दी, जिनमें कहा गया कि 1960 के दशक में शुगर इंडस्ट्री ने वैज्ञानिकों को पैसा देकर चीनी के नुकसान को कम और वसा के खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर बताया। शोधकर्ताओं ने अभिलेखों और साक्ष्यों की समीक्षा की। इस समीक्षा के बाद निष्कर्ष निकाला गया कि किसी 'शुगर साजिशट का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता। उनका कहना था कि उस दौर में लो फैट का सिद्धांत पहले से ही प्रमुख था। उद्योगों और शोध को वित्तीय सहयोग देना आम बात थी। वे चेतावनी देते हैं कि षडयंत्र या साजिश जैसी कहानियां वैज्ञानिक तथ्यों की जटिलता को नजरअंदाज कर सकती हैं।
भारत के लिए यह और भी बुरा साबित हुआ, क्योंकि भारतीयों की शारीरिक संरचना (Phenotype) अलग है। हमारे पास 'मसल मास' कम है और पेट की चर्बी ज्यादा। जब हमने विदेशी 'हाई-कार्ब' डाइट को अपनाना शुरू किया, तो हमारे शरीर ने इसे और भी बुरी तरह हैंडल किया। आज स्थिति यह है कि हम चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया के सबसे बड़े डायबिटीज हब बनने की कगार पर खड़े हैं।
वर्षों बाद, जब अमरीका और यूरोप में मोटापे और डायबिटीज की सुनामी आ गई, तो वहां के वैज्ञानिकों ने फिर से शोध किया। 2015 के बाद कई ग्लोबल गाइडलाइंस में यह स्वीकार किया गया कि 'शुगर और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स' तो असल दुश्मन थे, फैट नहीं। अमरीका ने अपनी गलतियों को सुधारते हुए अब 'लो-कार्ब' और 'हेल्दी फैट्स' की वकालत शुरू कर दी है। लेकिन भारत जैसे देशों में, यह गलत डाइट प्लान हमारी रगों में इतना उतर चुका है, कि आज भी ज्यादातर लोग वही डाइट फॉलो करते हैं। इस रिपोर्ट में क्या ऐसे समझें फैक्ट
-चीनी पर लगाम लगाने की हिदायत दी गई। इसमें पहली बार हिदायत दी गई कि आपकी कुल कैलोरी का 10% से ज्यादा हिस्सा ऊपर से डाली गई चीनी यानी Added Sugar से नहीं लेना चाहिए।
-फैट से डर खत्म करने के लिए इससे पाबंदी हटाई गई। दशकों बाद इस रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल(Egg and Fat) पर लगी पाबंदी को हटाया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि फेट उतना खतरनाक नहीं है, जितना पहले बताया गया था।
-इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य टाइप-2 डायबिटीज और दिल की बीमारियों को रोकना था। भारत समेत पूरी दुनिया के आधुनिक डाइट प्लान इसी रिपोर्ट के बाद बदलने शुरू हुए।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जिस तरह एक गलत डाइट ने हमें बीमार बनाया, उसी तरह 'सही डाइट' हमें ठीक भी कर रही है। आज पूरी दुनिया में 'Diabetes Reversible' एक नया ट्रेंड बन चुका है। भारतीय लोग भी अब कैलोरी गिनने के बजाय 'इंसुलिन रिस्पॉन्स' को समझने की कोशिश कर रहे हैं और समझकर 'Diabetes Reversible' की ओर बढ़ रहे हैं। 'इंटरमिटेंट फास्टिंग' और 'कीटो' या 'लो-कार्ब' जैसी डाइट ने यह साबित भी कर दिया है कि अगर हम अपनी जड़ों की ओर लौटें, तो इस बीमारी को न केवल कंट्रोल किया जा सकता है, बल्कि जड़ से मिटाया भी जा सकता है।
तो क्या हम एक ऐसी डाइट का बोझ ढो रहे हैं जो हमारे लिए बनी ही नहीं थी? 1977 की उस रिपोर्ट हमारे लिए एक बड़ी हेल्थ इंसीडेंट साबित हुई। हमने अपनी थाली से उन चीजों को हटाया जिसके हम आदी थे और उन्हें शामिल किया जिसे हमारा शरीर पहचानता ही नहीं था। अब सवाल हमारे जहन में है कि क्या आपको लगता है कि सिर्फ इस डाइट को बदलने मात्र से सबकुछ पहले जैसा नॉर्मल हो जाएगा? क्या आप जानते हैं कि शुगर आने से पहले आपका शरीर आपसे बहुत कुछ कह चुका होता है? पत्रिका की 'Diabetes Reversible' के अगले यानी एपिसोड 2 में हम आपको बताएंगे आपके शरीर के भीतर चल रहे उस साइलेंट म्यूटिनी यानी खामोश विद्रोह का पर्दाफाश करेंगे, जिसे आप आज भी मामूली थकान या फिर उम्र का असर समझकर नजर अंदाज कर देते हैं।
'Diabetes Reversible' Episode 2 में आप जानेंगे भारत कैसे बना शुगर कैपिटल क्या कहते हैं फैक्ट, मध्यप्रदेश के आकड़े भी भयावह, यानी भारत और मध्यप्रदेश की सेहत का ऐसा सच जो आपको आज ही अपनी जीवनशैली बदलने को मजबूर कर देगा। क्या आप जानना चाहेंगे...अगर हां तो.. हेल्थ के इस सफर में जुड़े रहिए patrika.com के साथ।