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Brown Fat vs White Fat: क्या शरीर की सारी चर्बी बुरी होती है? जानिए वेट लॉस और मेटाबॉलिज्म का विज्ञान ?

Brown Fat vs White Fat : क्या आप जानते हैं कि आपके शरीर में एक ऐसी 'जादुई चर्बी' है जो वजन बढ़ाती नहीं, बल्कि घटाती है? जानिए वाइट फैट और ब्राउन फैट के बीच का वैज्ञानिक अंतर और एक्सपर्ट टिप्स के साथ समझें कि कैसे आप अपने शरीर के नेचुरल 'फैट-बर्निंग इंजन' को एक्टिवेट कर सकते हैं।

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Apr 29, 2026

Brown Fat vs White Fat: अक्सर जब हम 'Fat' या 'चर्बी' शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले मोटापा, बढ़ता हुआ वजन और बीमारियां आती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर में मौजूद हर तरह की चर्बी (Adipose Tissue) हानिकारक नहीं होती? मेडिकल साइंस के अनुसार, हमारे शरीर में मुख्यत: दो मुख्य प्रकार की चर्बी होती है- वाइट फैट (White Fat) और ब्राउन फैट (Brown Fat)। जहां वाइट फैट को अक्सर वजन बढ़ने का कारण माना जाता है, वहीं ब्राउन फैट को 'Good Fat' कहा जाता है जो कैलोरी बर्न करने में मदद करता है। आइए, डॉ. कृष्ण बिहारी बाड़ोलिया से इसे विस्तार से समझते हैं।

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What is White Fat : वाइट फैट क्या है?

वाइट फैट उसे White Adipose Tissue(WAT) कहा जाता है, जो हमारे शरीर में सबसे अधिक मात्रा में पाया जाता है।

इसकी संरचना और कार्य

  • ऊर्जा का भंडार: हम जब अपनी जरूरत से ज्यादा कैलोरी का सेवन करते हैं, तो शरीर उस अतिरिक्त ऊर्जा को वाइट फैट के रूप में जमा कर लेता है।
  • इंसुलेशन और सुरक्षा: यह अंगों को बाहरी झटकों से बचाता है और शरीर के तापमान को बनाए रखने में मदद करता है।
  • हार्मोनल कार्य: यह 'लेप्टिन' (Leptin) जैसे हार्मोन बनाता है, जो हमें भूख लगने का एहसास कराते हैं।

समस्या कब शुरू होती है?

शरीर में जब वाइट फैट की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो यह कमर, जांघों और पेट के आसपास जमा होने लगता है। इसकी अधिकता से टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ जाता है।

What is Brown Fat : ब्राउन फैट क्या है?

ब्राउन फैट या Brown Adipose Tissue (BAT) वाइट फैट से बिल्कुल अलग होता है। इसे 'एक्टिव फैट' भी कहा जाता है।

यह 'ब्राउन' क्यों होता है?

ब्राउन फैट का रंग गहरा भूरा होता है क्योंकि इसमें माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria) की मात्रा बहुत अधिक होती है। माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का 'पावरहाउस' कहा जाता है, जिसमें आयरन (Iron) होता है, जो इसे भूरा रंग देता है।

इसका मुख्य कार्य : ब्राउन फैट का प्राथमिक काम Thermogenesis यानी शरीर में गर्मी पैदा करना है। जब हमें ठंड लगती है, तो ब्राउन फैट एक्टिव हो जाता है और जमा हुई कैलोरी को जलाकर गर्मी पैदा करता है।

ब्राउन फैट वजन घटाने में कैसे मददगार है?

डिजिटल हेल्थ कम्युनिटी में ब्राउन फैट को लेकर इतनी चर्चा क्यों है? इसका कारण है इसकी कैलोरी बर्निंग क्षमता ।

अध्ययनों से पता चला है कि महज 50 ग्राम ब्राउन फैट एक दिन में शरीर की 20% तक अतिरिक्त कैलोरी जला सकता है। यह मेटाबॉलिज्म ( Metabolisms) को बूस्ट करता है और इंसुलिन सेंसिटिविटी ( Insulin sensitivity) को सुधारता है, जिससे शुगर लेवल कंट्रोल में रहता है।

Natural Ways to Increase Brown Fat : शरीर में ब्राउन फैट कैसे बढ़ाएं?

वैज्ञानिकों का मानना है कि हम अपने शरीर के वाइट फैट को ब्राउन फैट (या बेज फैट) में बदलने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इसे 'Browning of Fat' कहा जाता है।

  • ठंडे तापमान का संपर्क (Cold Exposure) : ठंड ब्राउन फैट को एक्टिव करने का सबसे प्रभावी तरीका है।
  • कोल्ड शावर: ठंडे पानी से नहाना।
  • तापमान कम रखना: कमरे का तापमान 18°C-19°C के आसपास रखना।
  • नियमित व्यायाम (Exercise) : वर्कआउट के दौरान मांसपेशियों से 'इरिसिन' (Irisin) नामक हार्मोन निकलता है, जो वाइट फैट को ब्राउन फैट जैसी विशेषताओं वाले 'बेज फैट' में बदलने में मदद करता है।
  • अच्छी नींद (Melatonin) : नींद का हार्मोन 'मेलाटोनिन' न केवल अच्छी नींद लाता है, बल्कि ब्राउन फैट के उत्पादन को भी बढ़ाता है। अँधेरे कमरे में सोने से मेलाटोनिन का स्तर सही रहता है।

सही खान-पान से घटाये वजन

  • मिर्च (Capsaicin) : हरी मिर्च या लाल मिर्च में मौजूद कैप्साइसिन फैट बर्निंग को बढ़ाता है।
  • ग्रीन टी : इसमें मौजूद कैटेचिंस मेटाबॉलिज्म को तेज करते हैं।
  • हल्दी (turmeric curcumin ): हल्दी का सेवन भी फैट ब्राउनिंग में सहायक हो सकता है।

एक नई खोज बेज फैट (Beige Fat)

वैज्ञानिकों ने एक तीसरे प्रकार के फैट की भी पहचान की है, जिसे 'बेज फैट' कहा जाता है। यह वाइट फैट कोशिकाओं के भीतर ही पाया जाता है। जब हम एक्सरसाइज करते हैं या ठंड के संपर्क में आते हैं, तो ये वाइट फैट कोशिकाएं ब्राउन फैट की तरह व्यवहार करने लगती हैं। आजकल इसे 'वेप नाइस फैट' ((Vape nice fat) भी कहा जा रहा है।

पत्रिका की खास बातचीत डॉ. के.बी. बाड़ोलिया के साथ

क्या शरीर का मेटाबॉलिज्म स्लो होने के कारण ब्राउन फैट की कमी हो सकती है?

पत्रिका से बात करते हुए उन्होने इस सवाल के जवाब में बताया मेटाबॉलिज्म वह प्रक्रिया है जिससे हमारा शरीर कैलोरी को ऊर्जा में बदलता है। यहां ब्राउन फैट एक 'मेटाबॉलिक इंजन' की तरह काम करता है। सफेद चर्बी (White Fat) जहां ऊर्जा को जमा करके शरीर को सुस्त बनाती है, वहीं ब्राउन फैट में प्रचुर मात्रा में 'माइटोकॉन्ड्रिया' ( Mitochondria) होते हैं। ये माइटोकॉन्ड्रिया कैलोरी को जलाकर गर्मी पैदा करते हैं। यदि किसी व्यक्ति के शरीर में ब्राउन फैट की मात्रा बहुत कम है या वह निष्क्रिय (Inactive) है, तो उसका शरीर कैलोरी बर्न करने के बजाय उसे स्टोर करने लगता है। इसी स्थिति को हम 'स्लो मेटाबॉलिज्म' ( Slow metabolisms) कहते हैं।

क्या इसे सुधारा जा सकता है?

पत्रिका से बात करते हुए उन्होंने बताया कि अच्छी खबर यह है कि हम इसे सक्रिय कर सकते हैं। गतिहीन जीवनशैली और हमेशा एयर-कंडीशन्ड (AC) वातावरण में रहने से हमारा ब्राउन फैट 'सो' जाता है। यदि हम खुद को थोड़े ठंडे तापमान के संपर्क में लाएं और फिजिकल एक्टिविटी बढ़ाएं, तो शरीर में मौजूद वाइट फैट 'ब्राउन' या 'बेज' फैट में बदलने लगता है, जिससे मेटाबॉलिज्म को दोबारा रफ़्तार दी जा सकती है।

क्या कोई ऐसा मेडिकल टेस्ट है जिससे यह पता चल सके कि शरीर में ब्राउन फैट का स्तर कितना है?

उन्होंने बताया कि चिकित्सा विज्ञान में ब्राउन फैट (Brown Fat) का पता लगाने के लिए कुछ खास टेस्ट उपलब्ध हैं, लेकिन ये सामान्य ब्लड टेस्ट की तरह आसान नहीं होते। ब्राउन फैट की जांच के मुख्य तरीके:

  • PET-CT स्कैन (सबसे सटीक तरीका): वर्तमान में ब्राउन फैट के स्तर और उसकी सक्रियता को मापने के लिए Positron Emission Tomography (PET-CT) स्कैन को गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है। इस टेस्ट से पहले शरीर में एक विशेष रेडियोधर्मी शुगर (FDG) इंजेक्ट की जाती है। चूंकि ब्राउन फैट कैलोरी और शुगर को बहुत तेजी से जलाता है, इसलिए स्कैन में वह हिस्सा चमकता हुआ दिखाई देता है। अक्सर इसे 'कोल्ड चैलेंज' के साथ किया जाता है, यानी मरीज को कुछ देर ठंडे वातावरण में रखकर फिर स्कैन किया जाता है ताकि ब्राउन फैट एक्टिव हो सके।
  • MRI और थर्मल इमेजिंग: आधुनिक शोधों में Functional MRI का उपयोग भी किया जा रहा है, जो बिना रेडिएशन के फैट की संरचना देख सकता है। इसके अलावा, इन्फ्रारेड थर्मल इमेजिंग के जरिए शरीर की सतह के तापमान को मापा जाता है। चूंकि ब्राउन फैट गर्मी पैदा करता है, इसलिए गर्दन और कंधों के पास बढ़ता तापमान इसकी मौजूदगी का संकेत देता है।

वजन घटाने के लिए 'कोल्ड थेरेपी' (ठंडे पानी से नहाना) कितनी सुरक्षित है, और इसे कितनी देर तक करना चाहिए?

उन्होंने बताया कि वजन घटाने और मेटाबॉलिज्म को बूस्ट करने के लिए 'कोल्ड थेरेपी' आजकल काफी चर्चा में है, लेकिन इसे अपनाने से पहले इसकी सुरक्षा और सही तरीके को समझना बेहद जरूरी है । कोल्ड थेरेपी (जैसे ठंडे पानी से नहाना या आइस बाथ) स्वस्थ लोगों के लिए सुरक्षित है, लेकिन यह हर किसी के लिए नहीं है। ठंडे पानी के संपर्क में आते ही शरीर में 'कोल्ड शॉक रिस्पांस' होता है, जिससे हृदय गति और ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ सकते हैं। इसलिए, यदि किसी को हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर या सांस संबंधी समस्या है, तो उन्हें बिना डॉक्टरी सलाह के इसे बिल्कुल नहीं करना चाहिए।

कितनी देर करना चाहिए?

  • शुरुआती चरण: सामान्य गुनगुने पानी से नहाने के बाद अंत के 30 से 60 सेकंड तक ठंडे पानी की धार लें।
  • इंटरमीडिएट: धीरे-धीरे समय बढ़ाकर इसे 2 से 3 मिनट तक ले जाएं। ब्राउन फैट को एक्टिव करने के लिए इतना समय पर्याप्त माना जाता है।
  • अधिकतम सीमा: 5 से 10 मिनट से ज्यादा ठंडे पानी में रहना 'हाइपोथर्मिया' (शरीर का तापमान बहुत कम होना) का खतरा पैदा कर सकता है।

क्या बहुत ज्यादा वाइट फैट होने पर उसे वापस ब्राउन फैट में बदलना संभव है, या इसके लिए कोई खास तरह की एक्सरसाइज ज्यादा असरदार होती है?

उन्होंने बताया कि यह वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह संभव है और इस प्रक्रिया को "फैट ब्राउनिंग"(Fat Browning) कहा जाता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, हम सफेद चर्बी (White Fat) को सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन उसे एक मध्यवर्ती अवस्था जिसे 'बेज फैट' (Beige Fat) कहते हैं, उसमें बदल सकते हैं। बेज फैट दिखने में सफेद फैट जैसा होता है लेकिन काम बिल्कुल ब्राउन फैट की तरह (कैलोरी जलाना) करता है।

रिसर्च के मुताबिक, HIIT (High-Intensity Interval Training) और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग (Weight Lifting) इसके लिए सबसे प्रभावी हैं।

  • इरिसिन हार्मोन का जादू: जब हम अपनी मांसपेशियों पर दबाव डालते हैं (जैसे रेजिस्टेंस ट्रेनिंग या भारी वजन उठाना), तो मांसपेशियां 'इरिसिन' (Irisin) नामक एक खास हार्मोन रिलीज करती हैं। यह हार्मोन रक्त के जरिए सफेद फैट कोशिकाओं तक पहुंचता है और उन्हें 'बेज' या 'ब्राउन' की तरह व्यवहार करने के लिए प्रोग्राम करता है।
  • कार्डियो और स्ट्रेंथ का मेल: केवल धीमी गति से चलना काफी नहीं है। मांसपेशियों को चुनौती देने वाली एक्सरसाइज ही फैट की 'ब्राउनिंग' को ट्रिगर करती है।

क्या डाइट में मिर्च या ग्रीन टी शामिल करने से वाकई ब्राउन फैट एक्टिव होता है, या इसका असर बहुत मामूली होता है?

उन्होंने बताया कि डाइट में मिर्च और ग्रीन टी का प्रभाव वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है, लेकिन यह कोई जादुई समाधान नहीं है।मिर्च में मौजूद कैप्साइसिन (Capsaicin) यौगिक शरीर के तापमान को बढ़ाता है, जिससे ब्राउन फैट सक्रिय होकर कैलोरी जलाना शुरू कर देता है। वहीं, ग्रीन टी में पाए जाने वाले कैटेचिंस (EGCG) मेटाबॉलिज्म को गति देते हैं। हालांकि, शोध बताते हैं कि इनका असर मामूली (लगभग 50-100 एक्स्ट्रा कैलोरी प्रति दिन) होता है। ये चीजें ब्राउन फैट के लिए 'फ्यूल' या 'ट्रिगर' का काम तो करती हैं, लेकिन वजन घटाने के लिए केवल इनके भरोसे रहना काफी नहीं है। इन्हें एक स्वस्थ जीवनशैली और व्यायाम के सहायक (Supplement) के रूप में देखा जाना चाहिए।

क्या भविष्य में ऐसी कोई दवा या सप्लीमेंट आने की संभावना है जो सुरक्षित रूप से शरीर में ब्राउन फैट को बढ़ा सके?

हां, चिकित्सा विज्ञान इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है। वर्तमान में वैज्ञानिक ऐसी दवाओं (Pharmacological agents) पर शोध कर रहे हैं जो शरीर के 'थर्मोजेनिक पाथवे' (Thermogenic Pathway) को सक्रिय कर सकें। इनमें 'मिराबिग्रोन' जैसी दवाओं और कुछ ऐसे मॉलिक्यूल्स पर रिसर्च चल रही है जो वाइट फैट को सीधे ब्राउन फैट में बदलने (Browning) का संकेत देते हैं। हालांकि, इनके साइड इफेक्ट्स, जैसे हृदय गति और ब्लड प्रेशर का बढ़ना चुनौती है। अभी ऐसी कोई भी दवा 'ओवर-द-काउंटर' सप्लीमेंट के रूप में सुरक्षित घोषित नहीं हुई है। भविष्य में जीन थेरेपी या स्मार्ट ड्रग्स के जरिए यह संभव हो सकता है, लेकिन फिलहाल प्राकृतिक तरीके ही सबसे सुरक्षित विकल्प हैं।

डायबिटीज या हार्ट के मरीजों के लिए ब्राउन फैट को एक्टिव करने की कोशिश करना कितना सुरक्षित है?

उन्होंने बताया कि डायबिटीज और हार्ट के मरीजों के लिए ब्राउन फैट को एक्टिव करना फायदेमंद तो है, लेकिन सावधानी अनिवार्य है। डायबिटीज के मरीजों के लिए यह अच्छा है क्योंकि ब्राउन फैट ग्लूकोज को जलाता है, जिससे ब्लड शुगर लेवल सुधर सकता है। हालांकि, हार्ट पेशेंट्स के लिए 'कोल्ड थेरेपी' (ठंडा पानी) खतरनाक हो सकती है, क्योंकि अचानक ठंड से रक्त वाहिकाएं सिकुड़ती हैं और दिल पर दबाव बढ़ जाता है। इन मरीजों के लिए कोल्ड थेरेपी के बजाय हल्की एक्सरसाइज और सही डाइट अधिक सुरक्षित तरीके हैं। किसी भी नए प्रयोग से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें, ताकि हार्ट रेट या शुगर लेवल में अचानक उतार-चढ़ाव न आए।

क्या उम्र बढ़ने के साथ ब्राउन फैट अपने आप कम होने लगता है? इसे उम्र भर बनाए रखने के लिए क्या करें?

हां, उम्र बढ़ने के साथ शरीर में ब्राउन फैट प्राकृतिक रूप से कम होने लगता है और इसकी सक्रियता भी घटती है। इसे उम्र भर बनाए रखने के लिए नियमित व्यायाम (विशेषकर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग) करें, ठंडे वातावरण के संपर्क में रहें और पर्याप्त नींद लें। यह जीवनशैली मेटाबॉलिज्म को सक्रिय बनाए रखती है। शरीर के लिए वाइट फैट भी जरूरी है और ब्राउन फैट भी। समस्या तब होती है जब संतुलन बिगड़ जाता है। आज की गतिहीन जीवनशैली (Sedentary Lifestyle) के कारण हमारे शरीर में वाइट फैट जमा हो रहा है और ब्राउन फैट निष्क्रिय होता जा रहा है।

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