
Gen Z To Gen Alpha: सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, जर्जर भवन, शौचालय और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव के खिलाफ अब सिर्फ अभिभावक ही नहीं, बल्कि जेन अल्फा (Gen Alpha) भी खुलकर आवाज उठाने लगी है। स्कूलों में तालेबंदी से लेकर प्रशासनिक कार्यालयों तक मार्च, घेराव और प्रदर्शन इस बात के संकेत दे रहे हैं कि नई पीढ़ी अब अपने अधिकारों को लेकर पहले से अधिक सजग और मुखर है।
छत्तीसगढ़ में पिछले महीने-डेढ़ महीने के दौरान सामने आए दर्जन से अधिक मामले देश की सरकारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था की खोखली तस्वीर पेश करते हैं। कहीं शिक्षक नहीं हैं, कहीं जर्जर भवनों में बच्चों की पढ़ाई हो रही है, तो कहीं पेयजल और शौचालय जैसी न्यूनतम सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट इन अव्यवस्थाओं पर कड़ी टिप्पणियां करते हुए कई बार जुर्माना भी लगा चुके हैं। लेकिन वर्षों से चली आ रही इन समस्याओं के बीच अब छात्र स्वयं विरोध का चेहरा बन रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग में पल रही यह पीढ़ी अपने अधिकारों और सरकारी दावों के बीच का अंतर तुरंत समझ लेती है। मोबाइल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए जानकारी तक आसान पहुंच ने उन्हें सवाल पूछने और अपनी मांगों के लिए संगठित होने का आत्मविश्वास भी दिया है। जेन अल्फा में डिजिटल सोच और मनोवैज्ञानिक बदलाव के कारण अब वह नारे से आगे बढ़कर यह पीढ़ी अपने हक की आवाज बुलंद कर रही है।
हाल ही में रायगढ़ के लैलूंगा स्थित एकलव्य आदर्श विद्यालय में खराब भोजन परोसे जाने और उसमें कीड़े व कांच के टुकड़े मिलने पर बच्चों ने प्रदर्शन किया। महासमुंद जिले के जमहरी में शिक्षक नहीं मिलने पर विद्यार्थियों ने स्वयं स्कूल में ताला लगा दिया। बालोद के लिमोरा समेत कई ग्रामीण विद्यालय में शिक्षक नियुक्ति की मांग को लेकर स्कूलों में तालेबंदी की। धमतरी के भाठागांव शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल में वर्षों से भौतिकी, हिंदी और भूगोल के शिक्षक नहीं होने पर प्रदर्शन किया गया। कोंडागांव जिले के पीएमश्री स्कूल डीपोपारा-जामपदर में पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई एक ही शिक्षक के भरोसे चलने पर स्कूल में ताला लगाकर रिक्त पद भरने और प्रधान पाठिका को हटाने की मांग की गई। कांकेर के कोयलीबेड़ा भी इसी तरह का प्रर्दशन हो चुका है। इन मामलों ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी स्कूलों की बुनियादी समस्याएं अब केवल प्रशासनिक फाइलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बच्चों और उनके परिवारों के धैर्य की सीमा भी टूटने लगी है।
केस 1: महासमुंद के शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय जम्हारी में दो स्थायी शिक्षकों के स्थानांतरण से भारी कमी हो गई है। 150 विद्यार्थियों की जिम्मेदारी केवल तीन शिक्षकों पर है, जिससे गणित, अर्थशास्त्र और विज्ञान की कक्षाएं प्रभावित हुई हैं। विद्यार्थियों ने प्रशासन की अस्थायी व्यवस्थाओं को खारिज कर स्थायी विषय शिक्षकों की मांग की है। बोर्ड परीक्षा को लेकर चिंतित होकर उन्होंने स्कूल में तालाबंदी कर प्रदर्शन किया।
केस 2: भाटापारा के धुर्राबांधा पूर्व माध्यमिक शाला के छात्रों ने खराब सड़क और जर्जर स्कूल भवन के खिलाफ सड़क पर प्रदर्शन किया। स्कूल भवन की खराब हालत के कारण कक्षा 6वीं से 8वीं तक की पढ़ाई दो पालियों में करानी पड़ रही है। शिकायतों के बावजूद भवन की मरम्मत या नए निर्माण पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। छात्रों ने हाथों में तख्तियां लेकर “खस्ताहाल सड़क बनानी पड़ेगी” और “स्कूल भवन का जीर्णोद्धार करना होगा” जैसे नारे लगाए।
केस 3: गोबरा नवापारा के पीएम श्री शासकीय हरिहर आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय की छात्राओं ने प्राचार्य फाकरा खानम दानी के खिलाफ गंभीर आरोपों पर धरना दिया। आरोप हैं कि प्राचार्य छात्राओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित करती हैं, चरित्र पर अनुचित टिप्पणियां करती हैं, और शिकायत करने पर परीक्षा में फेल करने या निलंबित करने की धमकी देती हैं। इसके अलावा, नियमित फीस से अतिरिक्त 500 रुपये बिना रसीद के वसूलने, परिसर में मटन बनाने और चपरासी से बर्तन धुलवाने जैसे आरोप हैं। इन कारणों से छात्राओं ने गेट पर प्रदर्शन किया।
अप्रैल 2026 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 5,000 से अधिक सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय नहीं होने पर कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने इसे छात्राओं के साथ 'उत्पीड़न' की स्थिति बताते हुए कहा था कि यह स्कूल छोड़ने की बड़ी वजह बन रही है।
प्राथमिक स्तर पर छात्राओं का सकल नामांकन अनुपात
2014-15 : 106.61 प्रतिशत
2024-25 : 89.9प्रतिशत
रायपुर के पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय मनोविज्ञान अध्ययनशाला में कार्यरत प्रो. रोली तिवारी ने बताया कि स्कूलों में जेन अल्फा (स्कूली बच्चों) द्वारा बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर बढ़ते विरोध को केवल अनुशासनहीनता या धैर्य की कमी मानना उचित नहीं है। यह उनकी अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता, डिजिटल परिवेश और मनोवैज्ञानिक विकास से जुड़ा स्वाभाविक बदलाव है।
जेन अल्फा ऐसी पीढ़ी है, जो बचपन से ही मानवाधिकार, बाल अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे विषयों से परिचित रही है। इसलिए जब उनकी मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तो वे इसे केवल असुविधा नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के हनन के रूप में देखते हैं।
इंटरनेट और एल्गोरिद्म आधारित दुनिया ने बच्चों को तत्काल परिणाम पाने की आदत डाल दी है। इससे धैर्य अपेक्षाकृत कम हुआ है और अपेक्षाएं पूरी न होने पर गुस्सा तथा विरोध की प्रवृत्ति बढ़ी है। वहीं, सोशल लर्निंग थ्योरी के अनुसार बच्चे देखकर सीखते हैं। सोशल मीडिया पर आंदोलन, हैशटैग अभियान और विरोध के तरीके उन्हें प्रभावी लगते हैं, जिनका साथियों का भी प्रभाव पड़ता है।
न्यूरोसाइंस के अनुसार इस आयु में मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पूरी तरह विकसित नहीं होता। मस्तिष्क का यही हिस्सा दूरगामी परिणामों पर विचार करने और भावनाओं को नियंत्रित करने का काम करता है। इसलिए बच्चे कई बार आवेग में ऐसे कदम उठा लेते हैं, जिनके परिणामों का उन्हें पूरा आकलन नहीं होता। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के लिए सुरक्षित और संवादपूर्ण माहौल बनाएं, उनकी बात ध्यान से सुनें और तर्कपूर्ण संवाद की आदत विकसित करें। वहीं, स्कूलों में समूह चर्चा, काउंसलिंग, मेंटरशिप और फीडबैक बॉक्स जैसी व्यवस्थाएं बच्चों को सकारात्मक और रचनात्मक तरीके से अपनी बात रखने का अवसर दे सकती हैं।