El Nino 2026 Impact on Indian Economy: इस बार मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों को अब तक बारिश का इंतजार है। लेकिन प्रशांत महासागर में बनी एल नीनो जैसी प्राकृतिक और वायुमंडलीय घटना ने मानसून की रफ्तार धीमी कर दी है। ऐसे में वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ गई है। कृषि और अर्थव्यस्था को लेकर विशेषज्ञ परेशान हैं और हर स्तर पर इस संभावित संकट से उबरने के उपाय ढूंढने में लगे हैं।

El Nino 2026 Impact on Indian Economy: इन दिनों दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक सिर्फ एक ही शब्द पर नजर बनाए हुए हैं और वह है एल नीनो (El Nino) और पूरी आशंका जताई जा रही है कि वर्ष 2026 में एल नीनो का असर बढ़ सकता है। और यदि ऐसा होता है तो इसका भारतीय मानसून, खेती, जल संकट और महंगाई पर इसका अच्छा खासा असर पड़ने वाला है। प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में विकसित हो रही एल नीनो (El Nino) की परिस्थितियों ने मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ाई हुई है।
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य संस्थान (UNU INWEH) के निदेशक प्रोफेसर कावेह मदानी ने हाल ही में चेतावनी भी दी है कि वर्तमान समय में एल नीनो से होने वाली चरम मौसमीय घटनाएं केवल मौसम तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे पहले से मौजूद जल संकट, खाद्य असुरक्षा के साथ ही आर्थिक कमजोरियों को कई गुना बढ़ा देती हैं। पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट
एल नीनो (El Nino 2026 Impact) एक प्राकृतिक महासागरीय वायुमंडलीय घटना है। इस घटना में मध्य एवं पूर्वी प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से कहीं ज्यादा गर्म हो जाता है। इसका असर वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ता है।
मौसम वैज्ञानिक शैलेंद्र नायक बताते हैं कि भारत समेत दक्षिण एशिया में एल नीनो (El Nino 2026 connection weak monsoon) का सीधा संबंध कमजोर मानसून, वर्षा की कमी और सूखे जैसे संकटों से देखा गया है। हालांकि हर एल नीनो समान प्रभाव नहीं देता, लेकिन इसका जोखिम जरूर बना रहता है। हां लेकिन इसके असर से मौसमी घटनाएं चरम पर पहुंच जाती हैं। 2015-16 का शक्तिशाली एल नीनो विश्व के सबसे गर्म वर्षों में शामिल रहा था। उस दौरान दुनिया भर में करोड़ों लोग सूखे, बाढ़, खाद्य संकट और स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हुए थे। कहीं सूखा, कहीं कम समय में ज्यादा बारिश, बाढ़ के हालात बनते हैं। गर्मी है तो वो भी चरम पर होगी और सर्दी होगी तो वो भी बहुत ज्यादा।
मई से ही अल नीनो (El Nino 2026 Started in May 2026) की शुरुआत हो चुकी है। पूर्वानुमान से डराने वाले अलनीनो के अक्टूबर में 65 फीसदी तक आशंका दिखाई दे रही है। माना जा रहा है कि यह इतिहास के सबसे मजबूत अलनीनो में से एक बन सकता है। यही कारण है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक इसे गोडजिला या सुपर अलनीनो कह रहे हैं।
दरअसल ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण आज दुनियाभर के देश तापमान में दृद्धि से जूझ रहे हैं। जलवायु में आए बदलावों के कारण दुनिया के ज्यादातर हिस्से लगातार गर्म हो रहे हैं। बढ़ता तापमान बड़ा कारण है कि यदि एल नीनो (El Nino 2026 Effects) का प्रभाव बढ़ता है, तो उसके असर बेहद गंभीर रूप में नजर आ सकते हैं।
भारत की बड़ी आबादी करीब 45-50 फीसदी और कृषि आज भी मानसून (El Nino 2026 effect on Monsoon) पर निर्भर करती है। यदि बारिश सामान्य से कम हुई या फिर समय पर नहीं हुई, तो इसका सीधा असर किसानों और आम लोगों पर नजर आएगा।
कमजोर मानसून के कारण धान, सोयाबीन, मक्का और दालों जैसी खरीफ की फसलें प्रभावित होंगी। किसानों की लागत बढ़ेगी। उत्पादन घटने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
मौसम वैज्ञानिक शैलेंद्र नायक कहते हैं कि यदि बारिश कम होती है तो किसानों की भू जल पर निर्भरता बढ़ेगी। देश भर में पहले से ही भूजल संकट की स्थिति है। इसके असर से जल स्रोतों या जलाशयों पर दबाव बढ़ेगा। जिसका असर बांधों पर नजर आएगा। बिजली संकट उत्पन्न होगा। पेयजल संकट की स्थिति बनेगी। खाद्य श्रृंखला गड़बड़ाएगी। महंगाई का खतरा भी कम नहीं होगा।
प्रोफेसर मदानी ने एल नीनो (El Nino 2026 effects in India) के असर के कारण होने वाले जिस "वॉटर बैंकक्रप्सी" अर्थात "जल दिवालियापन" की बात कही है, वह भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। इसका अर्थ है कि हम भूजल का दोहन उसकी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से कहीं ज्यादा तेज गति से कर रहे हैं।
कई राज्यों में किसान वर्षा की अनिश्चितता के कारण लगातार ट्यूबवेल और बोरवेल पर निर्भर होते जा रहे हैं। इसका सीधा अर्थ ये है कि बारिश कम हुई तो भूजल पर निर्भरता और बढ़ जाएगी। इससे जितना पानी जमीन से निकाला जा रहा है, उतना जमीन के अंदर वापसी कर भरपाई हो ही नहीं पाएगी। ऐसा होने पर बोरवेल और ट्यूबवेल के ज्यादा इस्तेमाल से भू जल स्तर पहले ही नीचे जा चुका है, यह और नीचे जा सकता है। ऐसे में यदि एक दो साल भी बारिश कमजोर रही तो ऐसे इलाकों में जल संकट और ज्यादा गहरा जाएगा।
फैक्ट''अच्छा मानसून अर्थव्यवस्था को गति देता है। जबकि मानसून कमजोर रहे तो खेती से लेकर बाजार तक मांग को घटा देता है। इसके असर से GDP ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। अच्छी बारिश यानी-ज्यादा उत्पादन और ज्यादा कमाई- ज्यादा मांग और ज्यादा खरीदारी। इसके विपरीत कमजोर मानसून यानी GDP डाउन।''-आनंद हरसाना, कृषि वैज्ञानिकएवं अर्थशास्त्री
कृषि वैज्ञानिक आनंद हरसाना कहते हैं कि खरीफ की सभी फसलों पर सबसे ज्यादा असर दिखेगा। मौसम में ज्यादा नमी और उमस के कारण इंसेक्ट्स या अन्य डिजीज भी हो सकती हैं। मानसून के पैटर्न पर भी डिपेंड करता है कि एल नीनो (El Nino 2026) का असर कैसा हो सकता है। वे कहते हैं कि 'आज भी हमारे देश की 45 फीसदी से ज्यादा लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं और कृषि पूरी तरह मानसून पर। यदि एल नीनो का असर दिखा तो भारतीय अर्थव्यवस्था से सीधा जुड़ा है। यदि अच्छी बारिश हुई, तो फसल अच्छी होगी, किसानों के पास अच्छा पैसा आएगा। मार्केट में अच्छी डिमांड रहेगी तो किसान अपने प्रोडक्ट करेंगे। दूसरी कंपनियों से भी वो प्रोडक्ट खरीदेंगे। तो इस तरह अर्थव्यवस्था पर तो सीधा असर दिखता है।'
प्रदेश के मालवा रीजन के किसान जो सोयाबीन की फसल लगाते हैं। तो जब तक 100 मिमी बारिश न हो तब तक वो फसल न लगाएं। इतनी बारिश हो तभी बोवनी करें। इस बार सोयाबीन की ऐसी वैरायटी का चुनाव करें स्मॉल ड्यूरेशन के साथ ही दो तीन वैरायटी की फसल लगाएं। एक फसल न लगाकर अन्य फसलें भी लगाएं। ऐसी वैरायटी लगाएं जो गर्मी को सह सकें। खेत की जुताई या तैयारी करें तो ब्रॉडवेज फरों का इस्तेमाल करें। इसमें नमी कंजर्व रहती है, तो अल नीनो का प्रभाव या गर्मी का असर ज्यादा नहीं होगा।
सरकार अपने स्तर पर हर प्रयास कर रही है। कृषि वैज्ञानिक सीधे किसानों के टच में हैं। सरकार की ओर से मीडिया बाइट भी दी जा रही हैं कि कैसे तैयारी रखें। कृषि मंत्री भी सभी अधिकारियों को दिशा निर्देश दे चुके हैं।
भारतीय अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत में मानसून एक मौसमीय घटना भर नहीं है। बल्कि यह ग्रामीण आय, उपभोक्ता खर्च, महंगाई और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका असर खेतों से लेकर बाजार और आम आदमी की जेब पर सीधा नजर आ सकता है। कमजोर मानसून यानी महंगाई चरम पर।
इसके जवाब में मौसम वैज्ञानिक शैलेंद्र नायक कहते हैं कि नहीं। अभी ऐसा कहना बड़ी जल्दबाजी होगा। अभी एल नीनो (El Nino 2026 Preparation) केवल एक संकेत है। मानसून कई दूसरे कारकों से भी प्रभावित होता है। लेकिन वे इतना जरूर कहते हैं कि इसके लिए सरकारों, किसानों और आम लोगों को अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
इस बात पर कृषि, मौसम और जल वैज्ञानिकों का कहना है कि राहत कार्यों का इंतजार करने से ज्यादा बेहतर होगा पहले से ही तैयारी करना। इसके तहत-
कुल मिलाकर कहना होगा कि El Nino 2026 केवल मौसम का विषय नहीं रह गया। इसका सीधा कनेक्शन खेती, पानी, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से भी है। लेकिन ये समय घबराने का नहीं, बल्कि सतर्क रहकर तैयारी करने का है। यदि समय रहते जल संरक्षण और वैज्ञानिक कृषि उपाय अपनाते हुए उन्हें फॉलो किया जाए, तो संभावित चुनौतियों का प्रभाव काफी हद तक कम नजर आएगा। इसलिए पानी बचानेस खेती की बेहतर तैयारी करने पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।