Euthanasia: सुप्रीम कोर्ट ने 12 मार्च 2026 को हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी। वह 13 साल से कोमा में थे। देश में पिछले 15 वर्षों में इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने क्या फैसले दिए हैं? दुनिया में इस किस देश में और कब कानूनी मान्यता मिली, आइए जानते हैं
Euthanasia Harish Rana: भारत में हरीश राणा की मामले में 12 मार्च 2026 को आए फैसले के बाद एक बार फिर से इच्छामृत्यु (Euthanasia) को लेकर बहस शुरू हो गई है। आइए भारत और दुनिया के दूसरे मुल्कों में इच्छामृत्यु को लेकर किस देश में कब कानून बनाए गए जानते हैं। इस रिपोर्ट में देश के न्यायालयों ने कब क्या फैसला सुनाया, जानते हैं। साथ ही यह भी जानते हैं कि इच्छामृत्यु क्या है।
What is Active Euthanasia vs Passive Euthanasia: आइए सबसे पहले इच्छामृत्यु क्या है, इसे समझने की कोशिश करते हैं। इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी असाध्य बीमारी या असहनीय पीड़ा से जूझ रहे व्यक्ति की मृत्यु को चिकित्सकीय सहायता से संभव बनाना। इस तरह के लोगों को जो इच्छामृत्यु की चाह रहते हैं, को दो भागों में बांटा जा सकता है- सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)और निष्क्रीय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)।
सक्रिय इच्छामृत्यु किसी दवा या इंजेक्शन के माध्यम से जानबूझकर मृत्यु देना। लेकिन निष्क्रिय इच्छामृत्यु जीवनरक्षक उपचार या मशीनों को हटाकर व्यक्ति को प्राकृतिक मृत्यु की ओर जाने देना। भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी अवैध है, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ स्वीकार किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 13 वर्षों से कोमा में पड़े हुए युवक हरीश राणा को कृत्रिम जीवनरक्षक प्रणाली से हटाने की अनुमति दे दी। हरीश राणा मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले हैं और वह पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक के छात्र थे और फुटबॉल खेलने के शौकीन थे। वर्ष 2013 में वह मकान की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट लगी। इस दुर्घटना के बाद वे गहरे कोमा में चले गए और तब से वे स्थायी वेजिटेटिव अवस्था (Permanent Vegetative State) में थे।
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को पहली बार 2011 में अरुणा शानबाग बनाम भारत सरकार (Aruna Shanbaug v. Union of India) मामले में कानूनी मान्यता मिली थी। अरुणा शानबाग एक नर्स थीं, जो एक यौन हमले के बाद गंभीर मस्तिष्क क्षति और लकवे की शिकार हो गई थीं। इस घटना के बाद अरुणा चार दशकों से अधिक समय तक वेजिटेटिव अवस्था (अचेत अवस्था) में रहीं। हालांकि अरुणा शानबाग का मामला ही देश में पहली बार दया-मृत्यु (Mercy Killing) के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लेकर आया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी। अदालत ने कहा कि उनके लिए दायर याचिका किसी करीबी रिश्तेदार या मित्र ने नहीं बल्कि एक पत्रकार ने दायर की थी, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। हालांकि इस फैसले में अदालत ने नियमों को कुछ हद तक आसान बनाते हुए असाधारण परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी।
अरुणा शानबाग मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल (King Edward Memorial Hospital) में नर्स थीं। 1973 में अस्पताल के ही एक कर्मचारी ने उन पर हमला किया, जिसके कारण उनके मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंची थी। पत्रकार पिंकी विरानी (Pinki Virani) ने उनके लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगते हुए अदालत में याचिका दायर की।
2011 में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सक्रिय इच्छामृत्यु को अस्वीकार कर दिया, लेकिन पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ परिस्थितियों में अनुमति दे दी। अदालत ने कहा कि यदि मरीज की स्थिति बिल्कुल निराशाजनक हो और परिवार या अस्पताल चाहे, तो उच्च न्यायालय की अनुमति से जीवनरक्षक उपचार हटाया जा सकता है। हालांकि अदालत ने अरुणा शानबाग के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी, क्योंकि अस्पताल के स्टाफ ने उनका इलाज जारी रखने की इच्छा जताई थी।
पी. रथिनम (P. Rathinam) बनाम भारत संघ का मामला 1994 में सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था। हालांकि यह मामला सीधे इच्छामृत्यु से नहीं, बल्कि आत्महत्या के प्रयास को अपराध बनाने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 309 से जुड़ा था। 26 अप्रैल 1994 को न्यायमूर्ति बी.एल. हंसारिया और न्यायमूर्ति आर.एम. सहाय की पीठ ने यह फैसला सुनाया था कि धारा 309 अमानवीय है। उन्होंने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए “जीवन के अधिकार” में “मरने का अधिकार” भी शामिल हो सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि गंभीर मानसिक संकट से गुजर रहे व्यक्ति को दंडित करने के बजाय, उसे उपचार और परामर्श की आवश्यकता है। इस फैसले ने यह बहस छेड़ दी कि यदि व्यक्ति को जीवन का अधिकार है तो उसे मृत्यु चुनने का अधिकार भी होना चाहिए। हालांकि 1996 में 'ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य' (Gian Kaur v. State of Punjab, 1996) मामले में सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने पी. रथिनम के फैसले को पलट दिया और धारा 309 को फिर से संवैधानिक घोषित कर दिया। फैसले में तर्क देते हुए पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि जीवन के अधिकार का मतलब मरने का अधिकार नहीं है। इसें साथ अदालत ने यह भी कहा कि “सम्मानजनक मृत्यु” की अवधारणा पूरी तरह अस्वीकार्य नहीं है। इस टिप्पणी ने भविष्य में इच्छामृत्यु से जुड़ी बहस का रास्ता खोला।
Common Cause v. Union of India (2018) : यह भारत में इच्छामृत्यु से जुड़ी बहस में सबसे महत्वपूर्ण फैसला माना जाता है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है। अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराते हुए 'लिविंग विल' की अवधारणा को मान्यता दी।
लिविंग विल का अर्थ है कि कोई व्यक्ति पहले से लिखित घोषणा कर सकता है कि यदि वह भविष्य में असाध्य बीमारी या कोमा की स्थिति में पहुंच जाए, तो उसे कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरणों के सहारे जीवित न रखा जाए।
मरुति श्रीपती दुबल (MARUTI SHRIPATI DUBAL) बॉम्बे नगर पुलिस बल में पुलिस कांस्टेबल थे और घटना की तारीख तक वे कांस्टेबल के रूप में 19 वर्ष सेवा कर चुके थे। 1981 में वह एक दुघर्टना के शिकार हो गए और उनके सिर में भयानक चोट लगी। हालांकि वह चोट से उबर तो गए, लेकिन मानसिक रूप से बीमार हो गए और एक दिन उन्होंने आत्महत्या का प्रयास किया। इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि आत्महत्या का प्रयास करने वाले व्यक्ति को अपराधी नहीं बल्कि मानसिक पीड़ा से जूझ रहे व्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने इस दृष्टिकोण को सीमित कर दिया, लेकिन इस मामले ने इच्छामृत्यु और आत्महत्या के अधिकार पर बहस को गति दी।
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2018 के फैसले के बाद यह अनुभव किया कि लिविंग विल लागू करने की प्रक्रिया बहुत जटिल है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में नए दिशा-निर्देश जारी किए और प्रक्रिया को सरल बनाया। अब लिविंग विल को लागू करने के लिए अस्पताल में मेडिकल बोर्ड बनाया जाता है जो मरीज की स्थिति का आकलन करता है। यदि बोर्ड को यह लगता है कि मरीज को कृत्रिम रूप से जीवित रखना उचित नहीं है, तब जीवनरक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दी जा सकती है।
कई देशों में असाध्य बीमारी और असहनीय पीड़ा से जूझ रहे मरीजों को सम्मानजनक इच्छामृत्यु देने की अनुमति दी गई है, जबकि कई देशों में इसे अभी भी अवैध माना जाता है। पिछले तीन दशकों में इस विषय पर वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव हुए हैं।
नीदरलैंड, बेल्जियम, कनाडा और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों ने इच्छामृत्यु या चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु को वैध कर दिया है, जबकि भारत, ब्रिटेन और अधिकांश एशियाई देशों में इसे सीमित या अवैध माना जाता है।