Great Nicobar Projects News: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने भारत सरकार के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की आलोचना की है। उन्होंने इस प्रोजेक्ट के बारे में कहा कि यह देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ सबसे बड़े घोटालों और गंभीर अपराधों में से एक है। आइए जानते हैं कि यह प्रोजेक्ट क्या है और क्यों हो रही इसकी आलोचना?
Great Nicobar Project Row : ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट मोदी सरकार की एक महत्वाकांक्षी मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर योजना है। इसका उद्देश्य ग्रेट निकोबार द्वीप (Great Nicobar Island) को एक वैश्विक आर्थिक, रणनीतिक और लॉजिस्टिक हब के रूप में विकसित करना है।
केंद्र सरकार का कहना है कि 81,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना में ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, पावर प्लांट और टाउनशिप शामिल हैं, जो समुद्री व्यापार, कनेक्टिविटी और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करेगी। इसके साथ ही भारत के भू-रणनीतिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाएगी। हालांकि, इस प्रोजेक्ट को लेकर विपक्षी राजनीतिक दल और पर्यावरण के जानकार के कुछ जरूरी सवाल उठा रहे हैं। आइए, इस प्रोजेक्ट के बारे में सबकुछ जानते हैं और यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि इसको लेकर क्यों सवाल उठाए जा रहे हैं।
ग्रेट निकोबार द्वीप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी हिस्सा है, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के अत्यंत निकट स्थित है। यह जलडमरूमध्य विश्व के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है। यहां से वैश्विक व्यापार बड़े पैमाने पर होता है। इस भौगोलिक स्थिति के कारण यह द्वीप भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।
भारत इस इलाके में विशेषकर चीन के बढ़ते प्रभाव को ध्यान में रखते हुए लंबे समय से अपनी दखल को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। इस संदर्भ में ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट न केवल आर्थिक विकास बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, पावर प्लांट और टाउनशिप डेवलप करने की योजना है। यह सारा विकास कैंपबेल बे के आसपास ही होगा।
इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत एक अत्याधुनिक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट का निर्माण किया जाना है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रैफिक को आकर्षित करना और भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार नेटवर्क में प्रमुख स्थान दिलाना है। वर्तमान में, भारत का अधिकांश ट्रांसशिपमेंट कार्गो कोलंबो, पोर्ट क्लांग, सिंगापुर और दुबई जैसे विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से संचालित होता है। प्रस्तावित पोर्ट इस निर्भरता को कम करेगा और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्गों के निकट होने के कारण बड़े कंटेनर जहाजों को सीधे भारत में लाने में मदद करेगा। यह पोर्ट ग्रेट निकोबार द्वीप के दक्षिणी भाग, कैंपबेल बे के पास विकसित किया जाएगा। इसका उद्देश्य भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार में एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
यह पोर्ट अत्याधुनिक तकनीक से लैस होगा, जिसमें गहरे पानी का टर्मिनल, कंटेनर हैंडलिंग सुविधाएं और लॉजिस्टिक सपोर्ट सिस्टम शामिल होंगे। इस पोर्ट की क्षमता लाखों कंटेनर संभालने की होगी। इससे व्यापार लागत कम होगी और निर्यात-आयात तेज़ होगा।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के अंतर्गत प्रस्तावित यह एयरपोर्ट नागरिक और रक्षा दोनों उद्देश्यों के लिए उपयोगी साबित होगा। इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि सैन्य दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण सुविधा प्रदान करेगा। यह व्यापार और आपदा प्रबंधन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यह एयरपोर्ट ग्रेट निकोबार द्वीप के दक्षिणी हिस्से, विशेष रूप से कैंपबेल बे क्षेत्र के पास विकसित किया जाना है। 'ग्रीनफील्ड' से यह आशय है कि यहां नया एयरपोर्ट बनाया जाएगा।
एयरपोर्ट का रनवे बड़े अंतरराष्ट्रीय विमानों बोइंग और एयरबस की लैंडिंग के अनुकूल होगी। इसका मतलब यह है कि एयरपोर्ट में रनवे बहुत लंबा बनाया जाएगा ताकि एयरबस और बोइंग को लैंड कराया जा सके। इस एयरपोर्ट के जरिए देश के प्रमुख शहरों और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच सीधी कनेक्टिविटी प्रदान कर सकेगा। एयरपोर्ट के जरिए दूरस्थ द्वीप क्षेत्र को देश और दुनिया से जोड़ने में मदद मिलेगी, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है। हालांकि, इस एयरपोर्ट को लेकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी सामने आ रही हैं। यह बताया जा रहा है कि इन प्रोजेक्ट्स के निर्माण के लिए 8-9 लाख पेड़ काटे जाएंगे, जिसके चलते पारिस्थिकीय तंत्र संतुलन बिगड़ सकता है।
जाहिर है कि इस द्वीप पर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, विशाल एयरपोर्ट और टाउनशिप बनेगा तो उसके लिए ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक समर्पित पावर प्लांट की स्थापना की जाएगी।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के तहत प्रस्तावित पावर प्लांट इस पूरी योजना को ऊर्जा उपलब्ध कराने वाला प्रमुख आधारभूत घटक है। यह संयंत्र ग्रेट निकोबार द्वीप पर विकसित किए जाने वाले ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और प्रस्तावित टाउनशिप की बिजली आवश्यकताओं को पूरा करेगा। यह योजना बनाई गई है कि इसमें पारंपरिक और नवीकरणीय ऊर्जा का मिश्रित उपयोग किया जा सकता है। यानी इस पावर प्लांट को गैस, डीजल और सौर ऊर्जा से चलाया जाएगा। हालांकि, इस पावर प्लांट को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं भी सामने आई हैं। जीवाश्म ईंधन आधारित उत्पादन से कार्बन उत्सर्जन बढ़ सकता है और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ स्वच्छ ऊर्जा के अधिक उपयोग और टिकाऊ विकास मॉडल अपनाने पर जोर दे रहे हैं।
यहां अलग-अलग और बड़े-बड़े प्रोजेक्ट के साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़ेंगे तो उनके निवास के लिए यहां एक आधुनिक शहर बसाने की योजना भी बनाई गई है। इसके तहत इस टाउनशिप में लाखों लोगों के रहने की व्यवस्था होगी। इससे क्षेत्र में शहरीकरण और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। इस टाउनशिप में आवासीय क्षेत्र के अलावे स्कूल, अस्पताल, बाजार, सड़कें और अन्य बुनियादी सेवाएं भी विकसित की जाएंगी। इसे एक 'स्मार्ट सिटी' की तर्ज पर बनाए जाने की योजना है। इसमें जल प्रबंधन, कचरा प्रबंधन और ऊर्जा दक्षता जैसी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
यह टाउनशिप स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकती है और रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकती है। हालांकि, इसके बारे में पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि इससे प्राकृतिक वन क्षेत्र और आदिवासी समुदायों के पारंपरिक जीवन पर प्रभाव पड़ सकता है।
पर्यावरण के जानकार सोपान जोशी ने पत्रिका से बातचीत में कहा, "सत्ता के नशे में डूबा हमारा शासक वर्ग लालच और सामाजिक आत्मघात के प्रति समर्पित है। सत्ता का नशा ऐसा ही होता है। आज के बाजारू फायदे के लिए वह अपने देश का कुल भविष्य बेचने को लालायित है। इसी को विकास बता के बेचा जा रहा है। हमारे समय में विकास का अंधविश्वास इतना व्यापक और गहरा हो चुका है, कि इस पागल दौड़ के अलावा हमारे शासक वर्ग को कुछ दिखता ही नहीं है। आने वाली पीढियां इसे दोशद्रोह बताएंगी।"
ग्रेट निकोबार द्वीप पर शोम्पेन (Shompen) और निकोबारी (Nicobarese) जनजातियां निवास करती हैं। शोम्पेन भारत के ग्रेट निकोबार द्वीप के घने वर्षावनों में रहने वाली एक अत्यंत रहस्यमयी और कमजोर जनजातीय समूह है। 2011 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 229 थी। ये लोग मुख्यत: शिकारी होते हैं। इनकी अपनी दुनिया है। इस जनजाति के लोगों ने अपना पहला वोट हाल ही में डाला। वहीं, भारत के अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में रहने वाली एक प्रमुख मंगोलवंशीय जनजाति निकोबारी है। यह मुख्य रूप से निकोबार द्वीप समूह के 19 द्वीपों में निवास करती है। इनकी आबादी लगभग 27,000 से अधिक है। इन जानजातियों पर विस्थापन का खतरा उत्पन्न हो सकता है। उनकी परंपरा और संस्कृति खत्म हो सकती है।
इस प्रस्तावित विकास परियोजना के पैमाने की आलोचना करते हुए राहुल गांधी ने कहा, “सरकार जो कर रही है, उसे ‘प्रोजेक्ट’ कहती है। लेकिन मैंने जो देखा, वह कोई प्रोजेक्ट नहीं है। वह लाखों पेड़ों को काटने की तैयारी है। वह 160 वर्ग किलोमीटर वर्षावन को खत्म करने का फैसला है। यह उन समुदायों की अनदेखी है जिनके घर उनसे छीन लिए गए हैं। यह विकास नहीं है, बल्कि विकास की भाषा में लिपटी हुई तबाही है।”
यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय (Seismic zone) है, जिससे प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है। ऐसे में इन प्रोजेक्ट्स सस्टेनेबिलिटी (स्थिरता) को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं।