Millet Queen Bharti: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के छोटे से गांव बोड़ेगांव की रहने वाली भारती टंडन आज महिला आत्मनिर्भरता और संघर्ष की एक प्रेरक मिसाल बन चुकी हैं। महज 250 रुपए की छोटी सी शुरुआत से शुरू हुआ उनका सफर आज मिलेट्स (मोटे अनाज) के जरिए दिल्ली और हरियाणा तक अपनी पहचान बना चुका है।
Millet Queen Bharti: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के एक छोटे से गांव बोड़ेगांव की भारती टंडन आज महिला सशक्तीकरण का चेहरा बन चुकी हैं। मिलेट्स की महारानी के नाम से विख्यात भारती की कहानी केवल एक व्यापारिक सफलता नहीं, बल्कि शून्य से शिखर तक पहुंचने के अटूट संकल्प और संघर्ष की गाथा है। महज 250 रुपए की मामूली पूंजी से अपना सफर शुरू करने वाली भारती आज न केवल स्वयं आत्मनिर्भर हैं, बल्कि 15 अन्य महिलाओं को रोजगार देकर उनके घरों में समृद्धि का जरिया भी बनी हैं।
अपनी कड़ी मेहनत और सरकारी योजनाओं (बिहान योजना व बैंक ऋण) के समन्वय से भारती ने करीब 5.5 लाख रुपए का निवेश कर एक वैन खरीदी। आज वह इसी वैन के माध्यम से जनपद पंचायत दुर्ग के सामने अपनी चलती-फिरती दुकान संचालित करती हैं।
बता दें कि उनकी सफलता का दायरा अब छत्तीसगढ़ की सीमाओं को पार कर चुका है। दिल्ली और हरियाणा के गुरुग्राम में आयोजित राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में उनके मिलेट्स व्यंजनों ने अपनी विशेष छाप छोड़ी। दिल्ली के 12 दिन और हरियाणा के 17 दिन के स्टॉल ने छत्तीसगढ़ी स्वाद की खुशबू उत्तर भारत के बाजारों तक पहुंचा दी है।
12वीं तक शिक्षित भारती ने वर्ष 2018 में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से एक समूह का गठन किया था, किंतु कोरोना महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन ने उनकी योजनाओं को प्रभावित कर दिया। आर्थिक तंगी के उस चुनौतीपूर्ण दौर में भारती ने हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना।
उन्होंने अपनी जमापूंजी यानी गुल्लक में जमा मात्र 250 रुपये निकाले और मास्क बनाने का कार्य शुरू किया। उन्होंने करीब 1500 मास्क बनाकर बेचे, जिससे उन्हें 500 रुपए का मुनाफा हुआ। यह छोटी सी सफलता उनके बड़े सपनों की बुनियाद बनी। इसके बाद उन्होंने पापड़, मुरकू और मसालों के व्यापार में कदम रखा, जहां से प्राप्त आत्मविश्वास उन्हें गौठान और फिर 'सी-मार्ट' तक ले गया।
भारती के जीवन में असली बदलाव साल 2023 में आया, जब सरकारी स्तर पर मिलेट्स (मोटे अनाज) को बढ़ावा देने के प्रयास तेज हुए। बचपन से ही कोदो, कुटकी और रागी जैसे पारंपरिक अनाजों से परिचित भारती ने जनपद पंचायत दुर्ग के माध्यम से अंजोरा में आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया। उनके साथ गांव की 50 अन्य महिलाएं भी इस मुहिम से जुड़ीं। प्रशिक्षण के उपरांत भारती ने मिलेट्स के व्यंजन बनाना शुरू किया। जब उनके बनाए व्यंजनों की सराहना परिवार और पड़ोस में होने लगी, तो उन्होंने व्यावसायिक स्तर पर स्टॉल लगाना शुरू कर दिया।
वर्तमान में भारती 'सत्यम महिला स्वसहायता समूह' के माध्यम से 15 महिलाओं को नियमित रोजगार प्रदान कर रही हैं। उनका भविष्य का सपना एक स्थायी आउटलेट स्थापित करना है, जहां वे छत्तीसगढ़ी व्यंजनों को आधुनिक पैकेजिंग के साथ वैश्विक बाजार में उतार सकें। भारती टंडन की यह यात्रा प्रमाणित करती है कि यदि इच्छाशक्ति दृढ़ हो, तो गुल्लक के चंद सिक्के भी करोड़ों के सपनों को हकीकत में बदल सकते हैं।