
How Trees Make Rain: अमेजन के जंगलों से प्रेरित भारत के जंगलों, मानसून और भविष्य की कहानी सुनाती 'बारिश का कारखाना' सीरीज बताएगी कि जंगल कितने जरूरी हैं, क्योंकि ज्यादातर रिपोर्ट्स और लोग भी इन्हें सिर्फ ऑक्सीजन का स्रोत ही मानते हैं, लेकिन ये बारिश बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं और बारिश की उड़ती नदियां भी बनाते हैं। जंगल सिर्फ प्रकृति की धरोहर नहीं हैं, बल्कि भारत की जल, खाद्य और जलवायु सुरक्षा की भी नींव हैं। आज इस सीरीज की शुरुआत में मैं आपको बताना चाहूंगी कि बचपन में स्कूल के दौरान मुझे एक कविता ने बहुत प्रभावित किया था।
'जहां पेड़ हैं, शीतलता है
शीतलता से मेघ बरसते
सूखी धरती हरियाती है
ताल-तलैया सारे भरते
धरती के उपहार पेड़ हैं
खुशहाली के द्वार पेड़ हैं'
कल्पना कीजिए… किसी घने जंगल में हजारों साल पुराना एक पेड़ खड़ा है। उसे देखकर आप यही सोचेंगे कि पेड़ खड़ा है। क्योंकि पहली नजर में वह सिर्फ एक खड़ा हुआ पेड़ ही दिखाई देता है। लेकिन उसी समय उसकी लाखों पत्तियां हवा में लगातार नमी छोड़ रही होती हैं। यही नमी सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर बादलों का हिस्सा बन सकती हैं और बारिश में योगदान दे सकती हैं। पेड़ सिर्फ जमीन पर खड़े नहीं रहते, वे जीते हैं और खामोशी से अपना काम करते रहते हैं।
आज मुझे इस कविता के रचनाकार का नाम तो याद नहीं लेकिन लेकिन इन पंक्तियों के भाव आज पहले से ज्यादा सच लग रहे हैं। कहना होगा कि सच यही है कि पेड़ प्रकृति के लिए अहम हैं, तो हमारे लिए भी जिंदगी हैं। लेकिन अमेजन के वर्षावन जंगलों से आने वाली खबरें और जानकारियां चौंकाने वाली हैं। 21वीं सदी के दौर में अमेजन के जंगल हर साल हजारों वर्ग किलोमीटर तक खामोशी से खत्म हो रहे हैं। करोड़ों टन कार्बन को सोखने वाले ये वन अकेले ब्राजील की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा धरोहर हैं। लेकिन ये जंगल आज आर्थिक हितों और संगठित अपराध के दबाव में हैं और लगातार कम होते जा रहे हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं भारत के जंगलों की कहानी भी अमेजन के जंगलों से कम नहीं है। हाल यहां भी वही है। जंगलों की बदहाली, उनके प्रति लापरवाही और स्वार्थ के लिए उनकी अवैध कटाई पर बहस होती रहती हैं, लेकिन इस बारे में हम अगले भागों में बात करेंगे। जबकि सीरीज के पहले भाग में हम जानेंगे कि प्रकृति के उपहार पेड़ों और बारिश का पूरा विज्ञान…

पर्यावरणविद् और वैज्ञानिक डॉ. सुभाष सी. पांडेय बताते हैं कि 'जंगल सिर्फ बारिश का इंतजार नहीं करते, बल्कि उसे बनाने में भी मदद करते हैं। पेड़ों की पत्तियों से हर दिन बड़ी मात्रा में जलवाष्प वातावरण में जाती है। यही नमी बादलों का हिस्सा बनती है और हवा के साथ दूर-दराज तक पहुंचती है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक ईवेपोट्रांसपीरीशन (Evapotranspiration) कहते हैं, जबकि जंगलों से निकलकर वातावरण में बहने वाली विशाल नमी की धाराओं को 'फ्लाइंग रिवर्स' (Flying Rivers) कहा जाता है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के मुताबिक अमेजन की Flying Rivers- How forests Affect Water Awailability Downwind and not just downstream लेख के मुताबिक, 'फ्लाइंग रिवर' कोई पानी की दिखाई देने वाली नदी नहीं है। यह वातावरण में बहने वाली जलवाष्प की विशाल धारा है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण अमेजन वर्षावन है। लेख बताता है कि अमेजन के जंगल प्रतिदिन लगभग 20 अरब टन जलवाष्प वातावरण में छोड़ते हैं। यह नमी हवाओं के साथ दक्षिण अमेरिका के बड़े हिस्से तक पहुंचती है और वहां होने वाली वर्षा में महत्वपूर्ण योगदान देती है। जंगल केवल कार्बन ही नहीं रोकते, वे पानी का भी पुनर्चक्रण करते हैं।
-अगर आपका सवाल भी यही है कि क्या भारत के जंगल भी उड़ती नदियां या Flying Rivers बनाते हैं? तो इसका जवाब है हां। IIT Bombay DSpace के अध्ययन Moisture From the Western ghats Forests to Water Deficit East Coast of India(Geographical Research Letters 2018) में इससे जुड़े कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं।
1- इस शोध में पता चलता है कि पश्चिमी घाट के जंगलों में भी Evapotranspirition होता है। तमिलनाडु के कई हिस्सों में दक्षिण पश्चिम मानसून की 25-40 फीसदी बारिश पेड़ों द्वारा बनाई जाने वाली Flying Rivers यानी Evapotranspirition के माध्यम से ही हो जाती है।
2- कमजोर मानसून की स्थिति में हो या सूखे की स्थिति के दौरान भी पेड़ों का यह योगदान 50 फीसदी तक पहुंच सकता है।
3- वहीं शोधकर्ता चेतावनी भी देते हैं कि पश्चिमी घाट में वनों की कटाई से केवल जैव विविधता नहीं बल्कि प्रायद्वीपीय भारत का जल चक्र भी प्रभावित होगा। यानी जंगल वर्षा चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (IISC) बेंगलुरु के वैज्ञानिकों के 'Vegetation-Monsoon Rainfall 2023' अध्ययन में पाया गया कि भारत में वनस्पति का स्वरूप और घनत्व मानसूनी वर्षा को प्रभावित करता है। अध्ययन के मुताबिक वनस्पति केवल हरियाली नहीं बढ़ाती, बल्कि वाष्पीकरण, ऊर्जा संतुलन और वायुमंडलीय नमी के माध्यम से वर्षा प्रणाली को भी प्रभावित करती है। यानी यह शोध भी वनस्पति और मानसून के बीच सीधा-सीधा संबंध बताता है। ये शोध संकेत देता है कि जिस क्षेत्र में जितने स्वस्थ और घने जंगल होंगे वे उतनी ही ज्यादा नमी वातावरण में छोड़ सकते हैं और वर्षा की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
पेड़ बारिश का कारखाना हैं और यह कारखाना कैसे चलता है, इसे चार चरणों में आसानी से समझा जा सकता है
-1- पेड़ जड़ों से पानी खींचते हैं।
-2- पत्तियां उस पानी का बड़ा हिस्सा जलवाष्प के रूप में हवा में छोड़ती हैं। इस प्रक्रिया को Transpiration कहा जाता है।
-3- मिट्टी और पौधों से होने वाले कुल वाष्पीकरण से वातावरण में नमी बढ़ती है। इस प्रक्रिया को Evapotranspiration कहते हैं।
-4- यही नमी बादलों के बनने और वर्षा की प्रक्रिया को मजबूत करती है।
भारत में अमेजन जैसी 'फ्लाइंग रिवर' प्रणाली पर शोध अभी सीमित स्तर पर ही किए गए हैं, लेकिन भारतीय वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि वनों से होने वाला Evapotranspiration भारतीय मानसून और स्थानीय वर्षा को प्रभावित करता है। इंटर गवर्नमेंट पैनल ऑफ क्लाइमेट चेंज (IPCC) की रिपोर्ट बताती है कि भूमि उपयोग और वन आवरण में बदलाव से मध्य और पूर्वी भारत में ग्रीष्मकालीन मानसून कमजोर पड़ सकता है, क्योंकि जंगल कम होने पर स्थानीय Evapotranspiration भी घटता है। जंगलों का नुकसान होना केवल जैव विविधता का नुकसान होना भर नहीं है, बल्कि यह नुकसान वर्षा चक्र को भी प्रभावित कर सकता है।
भारत की बात करें तो वैज्ञानिक तीन बड़े प्राकृतिक क्षेत्रों को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं-
-1- पश्चिमी घाट
-2- पूर्वोत्तर भारत के वर्षावन
-3- मध्य भारत का वन क्षेत्र
ये तीनों महत्वपूर्ण क्षेत्र वातावरण में नमी बनाए रखने, स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने और वर्षा चक्र को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वैज्ञानिक चेतावनी भी देते हैं कि बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से वातावरण में नमी का पुनर्चक्रण घट सकता है। कुछ क्षेत्रों में वर्षा के पैटर्न बदल सकते हैं। सूखा और अत्यधिक वर्षा जैसी चरम घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है। इसका केवल मौसम या प्रकृति पर ही नहीं, बल्कि कृषि और जल संसाधनों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
कहना होगा कि बड़े पैमाने पर वनों का किसी भी तरह नुकसान होता है, तो पश्चिमी घाट, मध्यभारत और पूर्वोत्तर में वर्षा तंत्र कमजोर हो सकता है। ये न्यूज आर्टिकल पढ़कर समझ आ सकता है कि कम होते जंगलों के दायरों ने वैज्ञानिकों की चिंता यूं ही नहीं बढ़ाई है।
अब आगे क्या?
बारिश का कारखाना सीरीज के अगले भाग में हम पढ़ेंगे 'क्या भारत का मानसून जंगलों पर निर्भर है?' हम देखेंगे कि पश्चिमी घाट, मध्य भारत और पूर्वोत्तर के जंगल भारतीय मानसून से कैसे जुड़े हैं और अगर ये 'बारिश के कारखाने' कमजोर पड़े तो खेती, नदियों और शहरों के जल की व्यवस्था पर इनका क्या असर पड़ सकता है।