
Missing Child India : राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट बता रही है कि वर्ष 2024 में भारत में 98,375 बच्चे लापता हुए। इस आंकड़े का प्रतिदिन का औसत 269 बच्चों के बराबर है, जो बच्चे लापता हुए उनमें 22,768 लड़के, 75,603 लड़कियां और 4 ट्रांसजेंडर थे। इससे एक साल पहले यानी वर्ष 2023 में लापता बच्चों की संख्या 91,296 थी, जो 2024 में 98,375 हो गई। यानी गुमशुदा बच्चों की संख्या में एक साल में ही 7.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई।
इन लापता बच्चों के अलावा 48,800 बच्चे पिछले वर्षों में गायब हुए ऐसे बच्चे हैं जिनका अब तक पता नहीं चल पाया। वर्ष 2024 व अन्य वर्षों के बच्चों के बैकलॉग के आंकड़े को मिला दें तो लापता बच्चों की कुल संख्या 1,47,175 हो गई है। लापता बच्चों की सबसे अधिक संख्या पश्चिम बंगाल में 22,742 है। इसके बाद मध्य प्रदेश में 19,131 और ओडिशा में 13,495 गुमशुदा बच्चों के मामले दर्ज किए गए हैं।
वर्ष 2024 में, पश्चिम बंगाल में लापता बच्चों के 15,849 मामले दर्ज किए गए, जबकि मध्य प्रदेश में 14,296 और तमिलनाडु में 8,032 मामले दर्ज किए गए। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लापता बच्चों के कुल 10,843 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से आधे से अधिक 5,491 मामले 2024 के हैं।
बच्चों के बारे में कहा जाता है कि वे भगवान के रूप होते हैं। एक तरह से जमीन पर चलते-फिरते सितारे। लेकिन ये ही भगवान का रूप जब हैवानों के हाथ लग जाते हैं तो ऐसा लगता है कि मानों वे लोगों के लिए कमाई का सामान हो। हमारे देश में बड़ी संख्या में बच्चे घर से इसीलिए भाग जाते हैं क्योंकि उन्हें घर में लाड़-दुलार नहीं मिलता। इसलिए भी भाग जाते हैं क्योंकि माता-पिता की तरफ से उपेक्षा मिलती है। और इसलिए भी भाग जाते हैं क्योंकि पढ़ाई-लिखाई में उनका मन नहीं लगता। बड़ी संख्या में बच्चे बहकाए भी जाते हैं और चुराए भी जाते हैं। घर से खुद भागने वाले बच्चे अलग हैं और भगाए जाने वाले बच्चे भी अलग हैं। इनमें लिंगभेद कतई नहीं है लेकिन बड़ी संख्या में घर से भागने वाले बच्चों में बालिकाओं की संख्या ज्यादा रहती है। लापता चाहे कोई कैसे भी हों पर पुलिस के रिकॉर्ड में ये सब गुमशुदा की श्रेणी में ही रहते हैं।
एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में हर साल एक लाख से ज्यादा बच्चे लापता होते हैं। इनमें से करीब एक तिहाई का तो पता ही नहीं चलता कि वे कहां है? जिंदा हैं भी या नहीं। वे खुशकिस्मत होते हैं जो या तो घर से भागने के बाद खुद ही लौट आते हैं या फिर पुलिस उन्हें कहीं न कहीं से बरामद कर लेती है। लेकिन बच्चे चाहे चुराए गए हों या फिर भगाए गए हों और या फिर खुद ही घर से भागे हों। इनके बारे में आंकड़े पूरी तरह दुरुस्त हों ऐसा नहीं है। बड़ी संख्या में लापता बच्चों की तो पुलिस यह कहकर रिपोर्ट दर्ज नहीं करती कि कहीं आस-पास गया होगा/होगी या आ जाएगा। तलाश कर लो। तलाशी के दौरान ऐसे भी अवसर आते हैं जब माता-पिता को बच्चा नही उसकी लाश ही मिलती है।
दरअसल हमारे समाज की व्यवस्था ही ऐसी होती जा रही है जिसमें बच्चे घुटन महसूस करने लगते हैं। कहीं पढ़ाई-लिखाई से विमुखता तो कहीं घर-परिवार में कलह भी बच्चों को घर छोड़ने जैसा कदम उठाने को मजबूर कर देती है। जब पुलिस बच्चे के गुमशुदा होने की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं करती तो माता-पिता उन्हें ढूंढ़ते-ढूंढते थक कर बैठ जाते हैं।
दो माह पहले ही सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि 47 हजार बच्चे अब भी लापता हैं। यानी उनका कोई सुराग नहीं लगा है। घर से लापता होने के बाद फिर से नहीं लौटने वाले बच्चों का आंकड़ा साल-दर-साल बढ़ता ही जा रहा है। बच्चों के गायब होने की वजहें भी अलग-अलग रहती हैं। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर जयपुर, भोपाल, रायपुर और अहमदाबाद से लेकर कश्मीर तक सब जगह एक ही कहानी है। कहीं-कहीं तो लापता बच्चों के अभिभावकोंं के पास फिरौती के लिए फोन आ जाता है। पुलिस हरकत में भी आती है। लेकिन न फिरौती मांगने वाले का पता लगता और न ही बच्चे का। पुलिस की तरफ से सिर्फ यही दिलासा मिलती है कि लौट आएगा तब बता देंगे।
बच्चे सिर्फ भागते ही हों ऐसा नहीं है। उन्हें कई बार मानव तस्कर गिरोह चुराकर या अगवा कर ले आते हैं। बच्चों से भीख मंगवाने का अपराध पुराना है। देश में करोड़ों वे बच्चे जो चौराहों और गली-मोहल्लों में फटेहाल अवस्था में नजर आते हैं वे या तो अपने लिए भीख मांगते हैं या फिर दूसरों के लिए। क्रूरता की पराकाष्ठा यह कि कई बार तो बच्चों के हाथ-पैर तोड़ उन्हें असहाय अवस्था में कर दिया जाता है ताकि उनकी लाचारी पर तरस खाकर लोग भीख दे सकें। कुछ बच्चे जिनका घर-परिवार छूट जाता है, वे जीवनयापन की मजबूरी में खुद ही भीख मांगना शुरू कर देते हैं।
कानून चाहे कितने ही सख्त हो गए हों पर आज भी हमारे देश में बच्चे पटाखे बनाने व चूड़ियां बनाने के साथ-साथ ईंट-भट्टों पर मजदूरी कराने के काम पर रखे जाते हैं। चाय की थड़ियों व ढाबों पर तो इनकी पहचान छोटू के रूप में बन जाती है। इनमें ज्यादातर वे ही हैं जो घर से लापता बताए जाते हैं।
बड़े-बड़े अपराधी खुद को कानून की पकड़ से दूर करने के लिए बच्चों का अपराध में इस्तेमाल करते हैं। चोरी व जेबकटी ही नहीं कई बार तो हत्या व बलात्कार जैसे अपराध में बच्चों को शामिल कर लिया जाता है। चोरी से लेकर हत्या तक के अपराध में धकेल गए बच्चों की संख्या एक करोड़ के पार है जो किसी न किसी रूप में संगठित गिरोह के हत्थे चढ़ गए थे।
घर से बाहर निकले बच्चे यौन शोषण का शिकार आसानी से हो जाते हैं। दस से पन्द्रह साल तक की बच्चियां कई बार देह व्यापार में धकेल दी जाती है। शादी से लेकर वैश्यावृत्ति तक में खरीदी गई या बेची गई उन लड़कियों का इस्तेमाल होता है, जो कभी न कभी घर से भाग गई थीं, बहला-फुसलाकर लाई गई थी या फिर प्रेम प्रसंग को लेकर घर वालों ने त्याग दिया था। चाइल्ड पोर्नोग्राफी के बढ़ते मामलों में भी ऐसे गुमशुदा बच्चे ही होते हैंं।
लापता होने वाले बच्चों के मामले में सख्ती दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को साफ निर्देश दिए हैं कि बच्चे की गुमशुदगी की सूचना मिलते ही तुरंत एफआइआर दर्ज की जानी चाहिए। लेकिन आज भी पुलिस एफआइआर दर्ज करने में कोताही बरतती है। जब तक एफआइआर दर्ज कर पुलिस अपनी कार्रवाई शुरू करे गुमशुदा बालिका हुई तो उसके साथ दुराचार होने के खतरे बढ़ जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी बच्चों के लापता होने के मामले में चिंता जताते हुए कहा था कि लापता बच्चे अक्सर संगठित अंतरराज्यीय मानव तस्करी गिरोहों का शिकार बन जाते हैं।
सर्वोच्च अदालत ने केन्द्रीय गृह मंत्रालय को ये भी निर्देश दिए थे कि देश के सभी पुलिस थानों को जोड़ने वाला एक एकीकृत नेटवर्क बनाया जाए, जिसमें लापता बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों के लिए एक विशेष पोर्टल भी शामिल हो, ताकि ऐसे मामलों में समन्वय और कार्रवाई तेज की जा सके। यह सब होना भी दूर की कौड़ी बनी हुई है।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि जब भी कोई बच्चा लापता होता है तो अधिकारियों को शुरू से ही अपहरण या अगवा किए जाने की आशंका मानकर आगे बढ़ना चाहिए। जाहिर है कि ऐसे मामलों में अपहरण से संबंधित धाराएं दर्ज होने लगेंगी तो जांच में गंभीरता सुनिश्चित होगी पुलिस को यह भी लगता है कि यह मानव ट्रैफिकिंग या बच्चों के संगठित अपराध में शामिल होने का संकेत कहीं से मिलता है तो जांच एजेंसियों को केस एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को सौंपने का इंतजार नहीं करना चाहिए।
पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में नोबेल पुरस्कार विजेता और बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी ने पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में कहा था- 'इसके लिए भारत को बालमित्र देश बनना होगा। डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत जैसी योजनाएं बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी बच्चे का शोषण व उत्पीड़न न हो। उन्हें आजादी, शिक्षा व पोषण मिले।'
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी बच्चे के गुम होने के शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि समय रहते सूचना देकर कार्रवाई की जाए तो बच्चे को सुरक्षित खोजे जाने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि सरकारें और सामाजिक संगठन बच्चों की तलाश के लिए तेज और प्रभावी तंत्र विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
गुमशुदा बच्चों को खोजने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा कई पहलें की जा रही हैं। भारत सरकार ने ‘ट्रैक चाइल्ड पोर्टल’ और ‘खोया-पाया पोर्टल’ जैसी ऑनलाइन सुविधाएं शुरू की हैं, जिनके माध्यम से गुमशुदा बच्चों की जानकारी साझा की जा सकती है। इसके अलावा बच्चों की सहायता के लिए 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन भी संचालित की जा रही है। सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक का उपयोग भी बच्चों की पहचान और तलाश में तेजी लाने के लिए किया जा रहा है।