
Travel To Office : इंटरनेट, तकनीक व साधन- संसाधनों के आधुनिक युग में शहर व गांवों का अंतर काफी कम हो गया है। दोनों जगहों के भेष, भाषा, भूषा और भोजन सहित जीवन शैली में समानता बढ़ गई है। पर अब भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें दोनों में अंतर बरकरार है।
ऐसा ही एक क्षेत्र दोनों जगहों के नौकरीपेशा लोगों के कार्य क्षेत्र और वहां पहुंचने के समय व साधन से जुड़ा है, जिसे लेकर राष्ट्रीय घरेलू यात्रा सर्वेक्षण (एनएचटीएस) की 2025-26 की हाल में जारी रिपोर्ट में रोचक खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक देश के ग्रामीण इलाकों में अब भी हर तीसरा कामगार पैदल कार्यस्थल पहुंच रहा है, जबकि शहरों में हर दूसरा व्यक्ति दोपहिया वाहन से काम पर आवाजाही कर रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में अब भी 36.6 फीसदी नौकरीपेशा लोग पैदल काम पर जा रहे हैं, जबकि 13.4 प्रतिशत लोग साइकिल का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं, शहर में कार्यस्थल पर पहुंचने में सबसे ज्यादा उपयोग दोपहिया वाहनों का हो रहा है। यहां 52.3 फीसदी लोग मोटरसाइकिल, स्कूटर, स्कूटी या अन्य दोपहिया वाहनों से कार्यस्थल की यात्रा कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार कार्यस्थल पर पहुंचने में सबसे ज्यादा समय पश्चिम बंगाल में लग रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 13.5 प्रतिशत लोग साइकिल से भी यात्रा करते हैं, जबकि शहरों में ये आंकड़ा 5.8 प्रतिशत है। रिपोर्ट के अनुसार गांवों में भी हालांकि सबसे ज्यादा 37.1 प्रतिशत लोग कार्यस्थल पर दो पहिया वाहनों से ही जाते हैं, लेकिन 36.6 फीसदी की दर से लगभग इतने ही लोग कार्यस्थल पर पैदल ही आवाजाही करते हैं। जबकि शहरी क्षेत्रों में पैदल चलने वालों का प्रतिशत 13.5 प्रतिशत ही है। इसी तरह बस, ऑटो-रिक्शा व कार का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में ही अधिक हो रहा है। मसलन, गांवों में 5.3 के मुकाबले शहरों में 9.2 प्रतिशत लोग कार्यस्थल पर बस से यात्रा कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार कार्यस्थल पर पहुंचने में शहरी क्षेत्र में सबसे ज्यादा समय पश्चिमी बंगाल और ग्रामीण क्षेत्र में गोवा में लग रहा है। पश्चिमी बंगाल में शहरवासियों को 36 और गोवा के ग्रामीणों को औसतन 37 मिनट का सफर कार्यस्थल के लिए तय करना पड़ रहा है। इस मामले में सबसे कम 11 मिनट का समय लक्षद्वीप और औसतन 19 मिनट सिक्किम में लग रहे हैं।
राजस्थान में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में कार्य स्थल तक पहुंचने का समय समान दर्ज हुआ है। यहां रोजगार स्थल पहुंचने में दोनों क्षेत्रों में लोगों को औसतन 23 मिनट का समय लग रहा है।
रिपोर्ट में अर्ली मॉर्निंग शिफ्ट यानी सुबह 6 से 8 बजे तक की शिफ्ट को लेकर भी दिलचस्प आंकड़ा सामने आया है। इसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह 6 से 8 बजे के बीच करीब 40 फीसदी कामगार काम पर निकल जाते हैं। वहीं, शहरी इलाकों में इस दौरान लगभग 25 प्रतिशत कामगार ही घर से निकलते हैं।
हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी मुख्य वजह गांवों में रोजगार का मुख्य कारण कृषि कार्य, दैनिक मजदूरी या दूर-दराज के कस्बों या शहरों में काम के लिए जल्दी घर से बाहर निकलना हो सकता है। रिपोर्ट में ग्रामीण व शहरी दोनों क्षेत्रों में सुबह कार्यस्थल जाने का पीक समय सुबह आठ से दस बजे तक बताया गया है।
शहरी क्षेत्रों में करीब 65 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 50 से 52 प्रतिशत नौकरीपेशा लोग इसी समय कार्यस्थल जा रहे हैं। वहीं, काम से वापस लौटने का पीक समय दोनों ही इलाकों में शाम चार से छह बजे तक का है। ग्रामीण क्षेत्रों में 48 से 50 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र के करीब 43 प्रतिशत कामगार इसी समय वापस घर लौट रहे हैं। शाम 6 से 8 बजे के बीच घर लौटने वाले लोगों का प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के 18 प्रतिशत के मुकाबले शहरों में लगभग दोगुना यानी करीब 35 प्रतिशत सामने आया है।
रिपोर्ट के अनुसार कार्यस्थल पर जाने में भी गांव के मुकाबले शहरवासियों का यात्रा खर्च ज्यादा हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में एक नौकरीपेशा व्यक्ति का कार्य स्थल पहुंचने में औसतन 612 रुपए मासिक खर्च हो रहा है, जबकि शहरी क्षेत्रों में काम पर आने व जाने में हर व्यक्ति का औसतन 1 हजार 44 रुपए हर महीना खर्च हो रहा है। इस तरह ग्रामीण क्षेत्र के मुकाबले में शहरी व्यक्ति हर महीने करीब 432 रुपए ज्यादा यात्रा खर्च कर रहा है।
केंद्र सरकार के सर्वेक्षण में में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का कार्य स्थल पर यात्रा खर्च आधे से भी कम होना सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार देश में कार्य स्थल पर पहुंचने में पुरुषों का औसत खर्च 674 रुपए दर्ज हुआ है। इसके मुकाबले महिलाओं का रोजगार स्थल पर जाने का मासिक औसत खर्च 307 रुपए होना सामने आया है। रिपोर्ट में शहरी पुरुषों का औसत खर्च 1 हजार 76 और शहरी महिलाओं का औसत खर्च 884 रुपए मासिक होना सामने आया है।