Water Scarcity India: पूरे देश में एक ओर बांधों के जलस्तर में कमी आ रही है। दूसरी तरफ मौसम विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार इस साल 6 फीसदी मानसून में कमी आ सकती है। अगर जून और जुलाई में मानसून कमजोर रह गया तो इसका खरीफ फसलों की बुवाई पर काफी असर पड़ेगा। फसलों का उत्पादन कम हो जाएगा और जिसका असर खाद्य पदार्थों की महंगाई पर पड़ेगा। देश की जल संकट की गंभीर तस्वीर के बारे में पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Water Scarcity India: देश इस समय लू (Heatwave in India) की चपेट में है। बढ़ती गर्मी के साथ पानी की मांग भी बढ़ती चली जाती है। मांग की पूर्ति के चक्कर में जल स्रोत सूखते चले रहे हैं। केंद्रीय जल आयोग (CWC) की ताजा रिपोर्ट ने जल संकट की चिंता को और बढ़ाने का काम किया है। देश के प्रमुख जलाशयों में अब कुल क्षमता का सिर्फ 34.45 प्रतिशत पानी ही शेष बचा है। मतलब देश के जलाशय करीब 65 प्रतिशत खाली हो चुके हैं।
पिछले महीने मौसम विभाग के एक अनुमान के अनुसार इस साल मानसून 6 फीसदी कमजोर रह सकता है। अगर यह सच साबित हुआ तो हालात गंभीर हो सकते हैं। पेयजल और बिजली उत्पादन पर व्यापक प्रभाव तो पड़ेगा ही लेकिन कृषि क्षेत्र में ज्यादा दिक्कत आ सकती है। देश में यूरिया की कमी के साथ पानी की भी कमी होगी तो फसल की पैदावर कम रह सकती है। आइए यह जानते हैं कि देश के अलग-अलग राज्यों में जल भंडारण की क्या स्थिति है।
देश में गर्मी का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। कई राज्यों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। वहीं कुछ इलाकों में तापमान 47 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। जाहिर सी बात है कि तेज गर्मी के चलते पानी की खपत अचानक बढ़ गई है। शहरों में पेयजल की समस्या गहराने के चलते प्राइवेट और निगम के टैंकर पानी लिए यहां से वहां भागते हुए दिखाई दे जाते हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों में पेयजल के साथ खेतों की सिंचाई के लिए अधिक पानी की आवश्यकता पड़ रही है। ऐसे समय में जलाशयों का तेजी से खाली होना भविष्य के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है।
देश में केंद्रीय जल आयोग की निगरानी वाले 166 महत्वपूर्ण जलाशयों की कुल लाइव स्टोरेज क्षमता 183.565 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है। इस वर्ष मई मध्य तक इन जलाशयों में सिर्फ 63 बीसीएम पानी ही बचा। पिछले वर्ष यानी 2025 के मई मध्य तक 56.002 बीसीएम पानी बचा था। वहीं अगर पिछले 10 वर्षों का औसत 51.052 बीसीएम औसत जल जलाशयों में बचा था। यह स्थिति सामान्य वर्षों की तुलना में काफी चिंताजनक मानी जा रही है, क्योंकि साल दर साल जलाशयों की संख्या में भी इजाफा दर्ज किया जा रहा है। वर्ष 2025 में केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में जलाशयों की संख्या 161 थी। वर्ष 2024 में 150 जलाशय थे। ऐसे में यदि जून और जुलाई में मानसून कमजोर रहा, तो देश के अनेक हिस्सों में जल संकट और अधिक गहराएगा।
जल विशेषज्ञ डॉ. सुनील चतुर्वेदी का कहना है, 'हमारी दर्जनों की संख्या में नदियां सूख गईं या उनमें पानी की मात्रा कम होती चली गई। हमें पानी को किफायत तरीके से खर्च करना नहीं सीखना होगा। यह बताया जा रहा है कि वर्ष 2030 तक देश के 21 बड़े महानगरों में जीरो डे की नौबत आने वाली है। हमारा जो अभी हाल हो चुका कि हम अपनी तबाही को चीखें मार-मारकर न्योता देने में जुट गए हैं।'
देश के अलग-अलग राज्यों के हालात पर नजर डालें तो कई बड़े राज्यों में जलाशयों का बुरा हाल हो चुका है। उनमें जल का स्तर खतरनाक सीमा तक गिर चुका है। महाराष्ट्र में सिर्फ 29.84 प्रतिशत ही पानी बचा है। राज्य के 35 प्रमुख बांधों में कुल 19.90 बीसीएम क्षमता के मुकाबले मात्र 5.94 बीसीएम पानी शेष है। कर्नाटक की स्थिति और भी गंभीर हो चुकी है। कर्नाटक में 24.97 बीसीएम क्षमता वाले 18 बांधों में केवल 4.79 बीसीएम यानी 19.08 प्रतिशत पानी बचा है। उत्तर प्रदेश में 34.35 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में 34.67 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 41.10 प्रतिशत जल भंडारण रह गया है।
राजस्थान जैसे गर्म और शुष्क राज्य में भी जलाशयों की हालात काफी चिंता पैदा करने वाली है। यहां सात प्रमुख बांधों में कुल 5.01 बीसीएम क्षमता के मुकाबले 2.31 बीसीएम पानी ही बचा है। यहां अगर प्रतिशत के लिहाज से देखें तो दूसरे राज्यों की तुलना में हालत बेहतर है। यहां 46.10 प्रतिशत पानी बचा है। राजस्थान के राणा प्रताप सागर बांध में 48 प्रतिशत पानी रह गया है। हालांकि लगातार बढ़ती गर्मी और सिंचाई की मांग के चलते यहां पानी का संकट बढ़ सकता है। वहीं पड़ोसी राज्य गुजरात में भी सरदार सरोवर और उकाई जैसे बड़े बांधों का भी जलस्तर कम हो रहा है। गुजरात का सरदार सरोवर 47 प्रतिशत तथा उकाई डैम 42 प्रतिशत पर पहुंच चुका है।
हिमाचल प्रदेश और पंजाब का महत्वपूर्ण बांध गोविंद सागर बांध में भी सिर्फ 45 फीसदी पानी भरा हुआ है। पोंग डैम का जलस्तर भी घटकर 45 प्रतिशत रह गया है। मध्य प्रदेश का इंदिरा सागर बांध 43 प्रतिशत, उत्तराखंड का टिहरी डैम 45 प्रतिशत और ओडिशा का हीराकुंड डैम मात्र 35 प्रतिशत तक रह गया है।
उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत की हालत और अधिक चिंताजनक है। नागार्जुन सागर डैम में सिर्फ 25 प्रतिशत और मेट्टूर बांध में 27 प्रतिशत जल रह गया है।
देश की आबादी ज्यादा होने के साथ यहां पानी की बर्बादी बहुत ज्यादा है। यहां साल के 8 से 10 महीने मौसम अपेक्षाकृत गर्म रहता है। भारत के बड़े शहरों में सप्लाई होने वाले पानी का लगभग 30–40 प्रतिशत हिस्सा पाइपलाइन से लीकेज, पानी की चोरी और खराब प्रबंधन के कारण बर्बाद हो जाता है। पानी की बर्बादी कृषि क्षेत्र में भी बहुत ज्यादा है। भारत में कुल उपयोग होने वाले पानी का लगभग 80–85 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में सिंचाई में खप जाता है। नहरों से रिसाव, खेतों में अत्यधिक पानी छोड़ना और बाढ़ सिंचाई जैसी तकनीकों से बड़ी मात्रा में 40-50 फीसदी पानी व्यर्थ चला जाता है।
भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान बहुत ज्यादा है। देश की लगभग 60% आबादी खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। ऐसे में जलाशयों में पानी का कम होना खेती को प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करेगा। खरीफ फसलों यानी धान, मक्का, सोयाबीन, दाल और कपास की बुवाई मानसून पर निर्भर रहती है। अगर जून और जुलाई में मानसून कमजोर रहा तो इसका असर खाद्य सुरक्षा और महंगाई दोनों पर ही पड़ेगा।