
Indian Citizenship Proof: आप कहां के रहने वाले हैं, क्या आप भारत के ही नागरिक हैं? हां हां.. हमारे पूर्वज यहीं रहते थे। आपके पास क्या सबूत है आप भारत के ही नागरिक हैं? हमारे पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, हमारा निवास प्रमाण पत्र है। और ये देखिए हमारा पासपोर्ट…यहां हमारे परिवार को यहां रहते हुए 50 साल से भी ज्यादा का समय हो गया है।
अगर आप भी यही सोचते हैं कि आप ये दस्तावेज दिखाकर भारतीय नागरिकता साबित कर देंगे... क्या अब तक पासपोर्ट को ही आप अपना नागरिकता प्रमाण पत्र मान रहे हैं...? तो आप गलत सोच रहे हैं। दरअसल पिछले कुछ वर्षों में गृहमंत्रालय, वित्त मंत्रालय, चुनाव आयोग समेत कई राज्यों में आधार कार्ड, पैन कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, जन्म प्रमाण पत्र, वोटर आईडी और हाल ही में विदेश मंत्रालय ने पासपोर्ट को भी भारतीय नागरिकता का प्रमाण मानने से इनकार कर दिया है। ऐसे में अब भारत में रहने वाले, जन्म लेने वाले लोगों के पास क्या ऐसा कोई दस्तावेज है, जिससे वे हर हाल और हर परिस्थिति में अपनी नागरिकता साबित कर सकें? यही वो सवाल है जहां भारत की व्यवस्था कई बड़े देशों से अलग नजर आती है।
भारतीय नागरिकता सिटीजनशिप एक्ट 1955 (Citizenship Act 1955) से तय होती है। इसका आधार होते हैं नागरिकता, जन्म, पंजीकरण, प्राकृतिकरण या फिर किसी क्षेत्र के भारत में विलय होने जैसे घटक। लेकिन एक जरूरी और अहम फर्क यही है कि जन्म से नागरिक बने अधिकांश भारतीयों को अलग से किसी भी तरह का सिटीजनशिप सर्टिफिकेट जारी नहीं किया जाता। यदि कभी नागरिकता पर विवाद हो भी तो, परिस्थितियों के मुताबिक जन्म का रिकॉर्ड, माता-पिता के दस्तावेज, सरकारी रिकॉर्ड और कई दूसरे अहम सबूतों को ध्यान में रखना जाता है। दूसरी पंजीकरण या प्राकृतिककरण से नागरिक बने लोगों को औपचारिक नागरिकता प्रमाणपत्र दिया जाता है।
आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं- गृहमंत्रालय/कानून: आधार अधिनियम की धारा 9 के मुताबिक आधार संख्या अपने आप में नागरिकता या स्थायी निवास का प्रमाण नहीं माना जाता।
PAN कार्ड नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं: PAN आयकर संबंधी उद्देश्यों के लिए जारी किया जाता है और इसे भारतीय नागरिकता का निर्णायक प्रमाण पत्र नहीं माना जाता।
जन्म प्रमाण पत्र नागरिकता का प्रमाण नहीं: हालांकि इसमें आधी ही बात सच है कि जन्म प्रमाण पत्र नागरिकता का प्रमाण नहीं है, क्योंकि भारतीय व्यवस्था के मुताबिक अकेला जन्म प्रमाण पत्र हर स्थिति में नागरिकता को सिद्ध नहीं करता। नागरिकता के निर्धारण में नागरिकता अधिनियम, 1955 के मुताबिक जन्म की तारीख, माता-पिता की नागरिकता और अन्य कानूनी शर्तों के आधार पर किया जाता है।
वोटर आईडी से नागरिकता साबित नहीं होती: दरअसल वोटर आईडी मुख्य रूप से पहचान और मतदान के लिए जारी किया जाता है। अदालतों ने कहा है कि केवल वोटर आईडी के आधार पर नागरिकता साबित नहीं की जा सकती। लेकिन यह भारतीय नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
निवास प्रमाण पत्र नागरिकता का प्रमाण नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक मामले में निवास प्रमाण पत्र को नागरिकता का प्रमाण मानने से इनकार कर दिया। दरअसल यह कानूनी सिद्धांत है। निवास और नागरिकता अलग-अलग अवधारणाएं हैं। इसलिए केवल निवास प्रमाणपत्र से नागरिकता स्वत: सिद्ध नहीं होती।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि अदालतों ने विभिन्न मामलों में स्पष्ट किया है आधार, पैन, वोटर आईडी और पासपोर्ट जैसे दस्तावेज अपने आप में भारतीय नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण नहीं हैं।
संविधान का भाग II, अनुच्छेद 5-11, भारत की नागरिकता से संबंधित है। हालांकि यह स्थायी या कोई विस्तृत प्रावधान नहीं है। यह केवल उन लोगों के लिए है, जो 26 जनवरी 1950 को भारत के नागरिक बन गए थे। जबकि इसके तहत भारतीय नागरिकता को पाने या समाप्त करने की समस्या को लेकर यह कोई बात नहीं करता। यह संसद को ऐसे मामलों और नागरिकता से संबंधित किसी भी अन्य मामले के लिए कानून बनाने का अधिकार जरूर देता है। उसके मुताबिक संसद ने नागरिकता अधिनियम 1955 अधिनियमित किया। इसमें भी समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे हैं।
किसी भी देश के नागरिक होने को परिभाषित करना हो तो हम कह सकते हैं कि नागरिकता वह है जो व्यक्ति और राज्य के बीच संबंध दर्शाती है। दूसरे कई विकसित और आधुनिक देशों की तरह भारत में भी दो तरह के नागरिक हैं, पहला नागरिक और दूसरा विदेशी। नागरिक जिस तरह भारतीय राज्य के पूर्ण सदस्य हैं और इसके प्रति निष्ठावान हैं, तो उन्हें देश के नागरिक के रूप में सभी अधिकार प्राप्त हैं। कहना होगा कि नागरिकता असल में गैर नागरिकों के बहिष्कार का एक विचार है।
पहला jus soli यानी जन्म के आधार पर मिली नागरिकता। नागरिकता अधिनियम, 1955 लागू होने के बाद प्रारंभिक व्यवस्था में 1955 भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति को व्यापक रूप से Jus soli ks सिद्धांत के तहत नागरिकता मिलती थी। हालांकि 1986 और 2003 के संशोधनों के बाद जन्म के आधार पर नागरिकता के नियम ज्यादा सख्त कर दिए गए।
दूसरा है jus sanguinis यानी रक्त से जुड़े संबंधों को भी यह नागरिक होने की मान्यता देता है। मोती लाल नेहरू समिति के समय 1928 से ही भारतीय नेतृत्व jus soli की प्रबुद्ध अवधारणा के पक्ष में था। जबकि संविधान सभा ने jus sangunis के नस्लीय विचार बताते हुए इसे खारिज कर दिया था। क्योंकि इसे भारतीय लोकाचार के खिलाफ माना गया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक इंटर्व्यू के दौरान भारत में सिटीजनशिप की व्यवस्था के बारे में बताया था। उनके मुताबिक पहले नियम था कि 1950 के बाद और 1 जुलाई 1987 तक जो हिंदुस्तान में पैदा हुआ है, तो वह हिंदुस्तान का नागरिक है। लेकिन लाखों लोग ऐसे हैं, जिनके पास बर्थ सर्टिफिकेट नहीं है। ऐसे में यह कैसे तय किया जा सकता है कि वे भारत के नागरिक हैं। भारतीय नागरिकता के प्रावधानों के तहत एक यह प्रावधान भी है कि 2 जुलाई 1987 से लेकर 3 दिसंबर 2004 तक आपके माता-पिता में से कोई एक भी भारत का नागरिक था, तो आप भारत के नागरिक हैं। इसके अलावा 2004 दिसंबर के बाद आप अगर भारत में जन्मे हैं, तो आपके माता-पिता में से किसी एक का भारतीय नागरिक होना जरूरी है। वहीं दूसरा अवैध प्रवासी नहीं होना चाहिए। हमारे यहां नागरिकता कानून की यही व्यवस्था है।
जापान- जापान की Koseki प्रणाली को दुनिया की सबसे व्यवस्थित पारिवारिक रजिस्ट्रियों में मानी जाती है। यहां हर जापानी परिवार का एक सरकारी रजिस्टर होता है। जन्म, विवाह, तलाक और मृत्यु सभी इसी रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं। बच्चे के जन्म के बाद उसका नाम परिवार के कोसेकि (Koseki) में जोड़ दिया जाता है। जब भी नागरिकता या पारिवारिक संबंध साबित करने में यही सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक माना जाता है।
चीन चीन में Hukou नामक एक घरेलू पंजीयन व्यवस्था लागू है। बच्चे के जन्म लेते ही उसका पंजीकरण परिवार के Hukou प्रणाली में कर दिया जाता है। यह एक सरकारी रिकॉर्ड और नागरिक सेवाओं का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है। इसी से उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक योजनाओं और सरकारी सुविधाओं का अधिकार मिलता है। जन्म प्रमाण पत्र पर सरकारी पंजीकरण और आधिकारिक मुहरें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अमेरिका में पासपोर्ट को व्यवहार में नागरिकता का मजबूत प्रमाण माना जाता है। हालांकि जन्म प्रमाण पत्र, प्राकृतिककरण से नागरिक बनने वालों के लिए सर्टिफिकेट नेचुरलाइजेशन तथा अन्य मामलों में सिटीजनशिप सर्टिफिकेट को ही कानूनी मान्यता प्राप्त है। ये सभी दस्तावेज यहां की नागरिकता साबित करने महत्वपूर्ण दस्तावेज माने गए हैं।
कनाडा में सरकार कनेडियन सिटिजनशिप सर्टिफिकेट जारी करती है। इसके अलावा कनाडाई पासपोर्ट भी नागरिकता का मजबूत और व्यापक रूप से महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।
ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया में बी सरकार ऑस्ट्रेलियन सिटिजनशिप सर्टिफिकेट जारी करती है। इसके साथ ही यहां भी पासपोर्ट महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिससे ऑस्ट्रेलिया के लोग अपनी नागरिकता साबित कर सकते हैं।
जर्मनी: जर्मनी में भी जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीयता का प्रमाम पत्र जारी किया जात है। जबकि जर्मन पासपोर्ट भी नागरिकता का मजबूत सबूत माना जाता है।
दरअसल भारत में नागरिकता का निर्धारण नागरिकता कानून और साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाता है। ज्यादातर नागरिकों के पास जन्मजात भारतीयों के पास ऐसा कोई सार्वभौमिक दस्तावेज नहीं होता, जिसे हर परिस्थिति में अंतिम नागरिकता प्रमाण पत्र माना जा सके। यही कारण है कि देशभर में समय-समय पर बहस उठती है कि क्या देश में नागरिकता प्रमाणन की व्यवस्था और ज्यादा बेहतर होनी चाहिए। संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि एक सार्वभौमिक नागरिकता प्रमाणपत्र जैसी व्यवस्था नागरिकों और सरकारी एजेंसियों दोनों के लिए ही कई व्यावहारिक समस्याओं को कम कर सकती है। जबकि विशेषज्ञों का एक तबका यह भी मानता है कि अब यदि नई व्यवस्था की जाती है, तो प्रशासनिक रूप से यह बेहद जटिल साबित हो सकती है।