Iran Israel War: ईरान ने कतर के रास लफान तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) हब पर पहले 2 मार्च को हमला किया और उसके बाद 18-19 मार्च को कई हमले किए। इसके बाद से कतर ने गैस उत्पादन पर अस्थाई तौर पर रोक लगा दी है। आइए समझते हैं कि रास लफान में गैस उत्पादन को लेकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश पर क्या असर पड़ने वाला है?
Iran Israel War 2026 : ईरान ने कतर के रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी में एलएनजी हब (Ras Laffan gas facility Attacked) पर 2 मार्च को मिसाइल और ड्रोन से हमला कर दिया। कतर ने एलएनजी के उत्पादन पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी थी। यह दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी निर्यात केंद्र है और यहां उत्पादन पर रोक लगते ही, जाहिर है कि वैश्विक स्तर पर इसका असर दिखने लगा और एलएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी होने लगी।
ईरान ने कतर के रास लफान और अन्य ऊर्जा ठिकानों पर 18-19 मार्च को पहले के मुकाबले ज्यादा बड़ा हमला किया। यह बताया जा रहा है कि हमला इतनी ताकत के साथ किया गया कि एलएनजी उत्पादन केंद्रों की मरम्मत में कई महीने लग जाएं। वहीं ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड (South Pars gasfield attacked by Israel) पर इजराइल ने 18 मार्च को हमला कर दिया। इस हमले के चलते ईरान की 10-12 फीसदी गैस उत्पादन क्षमता में कमी आई है। साउथ पार्स दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस क्षेत्र का हिस्सा है, जो लगभग 9,700 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह ईरान तथा कतर के बीच बंटा हुआ है। कतर में इसे नॉर्थ फील्ड कहा जाता है। यह ईरान के तटीय शहर असालूयेह के पास स्थित है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को उठाना पड़ सकता है।
ईरान द्वारा खाड़ी क्षेत्र के पड़ोसी देशों पर किए गए हमलों के कारण कतर की तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) निर्यात क्षमता का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ है। कतर एनर्जी के सीईओ और ऊर्जा मामलों के राज्य मंत्री साद अल-काबी ने रॉयटर्स से बताया कि ईरान के इस हमले से सालाना करीब 20 अरब डॉलर के राजस्व का नुकसान होने का अनुमान है।
अल-काबी के अनुसार, मरम्मत कार्य के चलते प्रति वर्ष 12.8 मिलियन टन एलएनजी उत्पादन तीन से पांच साल तक प्रभावित रहेगा, जिसके चलते यूरोप और एशिया के देशों को आपूर्ति पर खतरा मंडरा है। इन देशों में चीन और भारत भी शामिल हैं। पिछले कुछ दिनों में हुए अभूतपूर्व ईरानी हमलों में कतर के 14 एलएनजी ट्रेनों में से कम से कम दो और दो गैस-टू-लिक्विड (GTL) संयंत्रों में से एक को नुकसान पहुंचा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया की लगभग 20% ऊर्जा की सप्लाई होती है। युद्ध शुरू होने के बाद से इस रास्ते से सप्लाई लगभग बाधित है। इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस के मुताबिक, कतर और संयुक्त अरब अमीरात मिलकर क्रमश: पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत 99%, 72% और 53% एलएनजी आपूर्ति करते हैं। इन देशों में एलएनजी का उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन और औद्योगिक क्षेत्रों में होता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, कतर और यूएई से लगभग 90% एलएनजी निर्यात एशिया को होता है। रास लफान की अहमियत इस जोखिम को और बढ़ाती है।
कतर के रास लफान से सप्लाई बंद होने का सबसे ज्यादा नुकसान बांग्लादेश को होने वाला है क्योंकि उसकी लगभग आधी बिजली गैस आधारित संयंत्रों से आती है। इस वजह से उसकी निर्भरता बांग्लादेश पर सर्वाधिक रही है। बांग्लादेश के घरेलू गैस भंडार अब स्थिर हो चुके हैं। वर्ष 2018 में LNG आयात शुरू होने के बाद यह उसकी जरूरत बन गया है। एलएनजी की आपूर्ति में कमी के कारण बिजली उत्पादन में गिरावट और व्यापक ब्लैकआउट की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
बांग्लादेश ने पहले ही महंगे दामों पर आपातकालीन LNG खरीदना शुरू कर दिया है, लेकिन बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच इसकी उपलब्धता और कीमत दोनों चुनौती बनती जा रही हैं। महंगे दामों पर गैस खरीदना बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डालेगा, जिससे औद्योगिक उत्पादन और निर्यात, विशेषकर गारमेंट सेक्टर, प्रभावित होगा। एशिया और यूरोप में गैस की कीमतें 60–70% तक बढ़ चुकी हैं। अब आपूर्ति में इस नए झटके से अस्थिरता और बढ़ने की संभावना है। मौजूदा LNG सुविधाएं पहले से ही अपनी क्षमता के करीब चल रही हैं। अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से नई आपूर्ति आने की उम्मीद है, लेकिन वह तुरंत कमी पूरी नहीं कर पाएगी। युद्ध के खींचते जाने से गैस संकट का तत्काल कोई समाधान निकलता दिख भी नहीं रहा है।
पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुकाबले भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है, क्योंकि हम सबसे कम एलएनजी आयात करते हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे पास ऊर्जा के विविध स्रोत- कोयला, नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू उत्पादन उपलब्ध हैं। हालांकि, इसके बावजूद देश में एलएनजी संकट का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
भारत में गैस की राशनिंग शुरू हो चुकी है। इसके चलते पहले के मुकाबले उर्वरक संयंत्रों को कम गैस मिल रही है। गैस की कमी के कारण उर्वरक उद्योग प्रभावित हो रहा है। कई उर्वरक संयंत्रों में क्षमता का सिर्फ 60 फीसदी ही उत्पादन लिया जा रहा है। इसका आगे कृषि क्षेत्र पर दबाव पड़ने लगा है। उत्पादन लागत में ऊर्जा की हिस्सेदारी 70% तक हो सकती है। उवर्रक के उत्पादन में लगने वाले कच्चा माल अमोनिया और सल्फर की कीमतों में इजाफा हुआ है।
भारत अपने यूरिया और फॉस्फेटिक उर्वरकों का 40% से अधिक हिस्सा मध्य पूर्व से खरीदता है और हाल ही में 1.3 मिलियन टन यूरिया खरीदने पर सहमति बनी है, संभव है कि इन हालातों पर समय पर माल हम तक नहीं पहुंच पाए। इन सबके चलते मध्य पूर्व में यूरिया की कीमतों में 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके साथ ही औद्योगिक गैस की लागत बढ़ने से महंगाई पर असर पड़ने की आशंका है। इन सबके चलते आगामी खरीफ सीजन की फसलों की पैदावर पर पड़ सकता है। जाहिर इसका असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।
कतर से एलएनजी की आपूर्ति बाधित होने से पाकिस्तान पर बहुत ज्यादा असर पड़ रहा है। पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा है। ऐसे में ऊर्जा संकट के उत्पन्न होने से वह बहुत अधिक दबाव में आ गया है। पाकिस्तान ने मौजूदा संकट से लड़ने के लिए ऊर्जा बचत के उपाय लागू कर दिए है। मिसाल के तौर पर पाकिस्तान में बिजली की कटौती की जा रही है। सरकारी स्तर पर भी औद्योगिक उत्पादन केंद्रों में कर्मचारियों के काम के दिनों में कटौती करना आदि जैसे उपाय लागू किए जा रहे हैं।