Jawaharlal Nehru: भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 27 मई 2026 को 62वीं पुण्यतिथि मनाई जाएगी। आखिर उनकी शख्सियत में ऐसी क्या बात थी, जिसके बूते उनकी मृत्यु के 62 वर्ष बीत जाने के बावजूद उनकी स्मृति पर धूल पड़ने की बजाय वे ज्यादा चमकने लगे। उन्होंने क्या लिख डाला कि उनकी किताबों का जादू आज भी सिर चढ़कर बोल रहा है। क्यों पूरी दुनिया में उनके व्यक्तित्व का बोलबाला था? उनके बारे में राजनेता से लेकर दार्शनिक क्या राय रखते थे? यहां पढ़िए उनकी जादू भरी शख्सियत के बारे में कुछ बातें।
Jawaharlal Nehru Death Anniversary: नेहरू जो अपने आलोचकों को भी बना लेते थे दीवाना, एक दूरदर्शी नेता, शानदार लेखक और कुशल प्रशासकभारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की शख्सियत ऐसी थी कि उनकी आलोचना करने वाला उनके निकट आकर उनका दीवाना हो जाता था। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल शुरू में उनके बहुत बड़े आलोचक रहे लेकिन उनके साथ कुछ मुलाकातों के बाद चर्चिल ने उनकी वाकपटुता से प्रभावित होकर कहा कि नेहरू निर्भीक और प्रभावशाली वक्ता हैं। नेहरू के निधन के छह दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी वह अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। आइए उनकी 62वीं पुण्यतिथि पर उनके व्यक्तित्व के बारे में जानते हैं।
भारत के निर्माण और भारत के विकास की जब भी चर्चा चलती है तब उनके प्रशंसक उनका नाम अत्यंत सम्मान के साथ लेते हैं। उनके योगदान के बगैर आज भारत एक लोकतांत्रिक राज्य बन पाता, इसकी कल्पना करना भी बेमानी होगी। नेहरू का परिचय सिर्फ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में ही नहीं है, बल्कि उनकी छवि भारतीय लोक में एक दूरदर्शी नेता, शानदार लेखक, कुशल प्रशासक और लोकतांत्रिक मूल्यों के मजबूत समर्थक के रूप में भी स्थापित हो चुकी है। उन्होंने देश का निर्माण एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और सामाजिक समानता के मूल्यों के आधार पर किया। उनकी शानदार शख्सियत में एक तरफ आधुनिकता और वैज्ञानिकता का पुट था तो दूसरी ओर संस्कृति का अद्भुत मेल भी दिखाई देता था। यही वजह है कि महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) उनकी मानवतावादी दृष्टिकोण के प्रशंसक थे। वे यह मानते थे कि नेहरू उन नेताओं में से हैं जो विज्ञान और मानवता को साथ लेकर चलना चाहते हैं।
जवाहर लाल नेहरू की शख्सियत की विशेष बात यह है कि एक बेहद समृद्ध परिवार में पैदा होने के बावजूद वे ताउम्र बेहद लोकतांत्रिक और विनम्र व्यक्तित्व के मालिक बने रहे। उनका जन्म 14 नवम्बर 1889 को तत्कालीन इलाहाबाद अब प्रयागराज प्रसिद्ध वकील और स्वतंत्रता सेनानी मोती लाल नेहरू के घर हुआ। नेहरू जी का बचपन अत्यंत सुख-सुविधाओं में बीता। हालांकि उनमें पढ़ने के प्रति, चीजों को जानने-समझने के प्रति बचपन से ही तीव्र इच्छा जग गई थी। उनके पिता ने बालक नेहरू को स्कूल भेजने की बजाए घर पर ही अंग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत और विज्ञान की शिक्षा दिलाई। हालांकि वह उच्च शिक्षा के लिए 1905 में इंग्लैंड गए। वहां हैरो स्कूल (Harrow School) में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (Cambridge University) के ट्रिनिटी कॉलेज (Trinity College) से प्राकृतिक विज्ञान में पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने लंदन के इनर टैंपल (Inner Temple) से लॉ की पढ़ाई की और बैरिस्टर बने।
इंग्लैंड से देश लौटने के बाद जवाहर लाल नेहरू ने वकालत की प्रैक्टिस शुरू की, लेकिन कुछ ही समय में वे देश की राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ गए। महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के विचारों से प्रभावित हो गए। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में जमकर भाग लेना शुरू किया। गांधी जी ने नेहरू की मेधा और देशभक्ति की भावना को पहचाना। उन्होंने नेहरू की नेतृत्व क्षमता को समृद्ध करने में हरसंभव सहयोग दिया।
जवाहर लाल नेहरू ने गांधी जी के साथ मिलकर असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे देश को मुक्त कराने के लिए कई बार जेल गए। उन्होंने अलग-अलग समय जेल में रहते हुए नौ साल बिताए। राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने वाले नेताओं में से ज्यादातर की खास बात यह होती कि वे राजनीति के साथ-साथ लेखन में भी अपना समय बिताते। गांधी जी की तरह नेहरू जी की भी दिलचस्पी खूब पढ़ने और लिखने में थी। उन्होंने जेल में रहते हुए कई पुस्तकें लिखीं। उनकी लिखी किताबों से उनके गहन अध्ययन, ऐतिहासिक दृष्टि और व्यापक चिंतन का परिचय मिलता है।
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और जवाहर लाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। नेहरू ने 1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री पद को सुशोभित किया। भारत जब आजाद हुआ तो देश के सामने कई चुनौतियां आ खड़ी हुईं। धर्म के आधार पर भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना। विभाजन के चलते बहुत दंगे, फसाद हुए। देश कई रियासतों में बंटा हुआ था। उन्हें एकत्रित करके राष्ट्र का निर्माण करना भी एक बड़ी चुनौती थी। देश के सामने गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी की समस्या मुंह बाए खड़ी थी। नेहरू जी ने योग्य और समर्पित लोगों की टीम बनाई और देश के सामने खड़ी इन सभी समस्याओं से पार लगाने की पूरी कोशिश की। आजादी के बाद हमारे करोड़ों लोगों के सामने पेट भरने की चुनौती थी। अंग्रेजों की गुलामी, लूट और शोषण ने देश को खोखला कर दिया था। अकाल और भुखमरी से लाखों मौतें होती थीं। यही वजह है कि उन्होंने 15 अगस्त 1959 को जनता से अपील करते हुए कहा था, "हमें अपने पैरों पर खड़ा होना है, जीतोड़ मेहनत करनी है, विकसित मुल्कों का मुकाबला करना है।"
उन्होंने यह भी कहा था, "जब तक हिंदुस्तान के लाखों गांव नहीं जागते, आगे नहीं बढ़ते तो सिर्फ बड़े शहर हिंदुस्तान को नहीं आगे ले जाएंगे। वे बढ़ेंगे अपनी कोशिश से, अपनी हिम्मत से, अपने ऊपर भरोसा करके। हमारे लोग अपने ऊपर भरोसा करना भूलकर समझते हैं कि और लोग मदद करें। मैं चाहता हूं कि लोग बागडोर अपने हाथों में लें।… तरक्की नापने का एक ही गज है कि कैसे हिंदुस्तान के 40 करोड़ आगे बढ़ते हैं… कौम अपनी मेहनत से बढ़ती है। जो मुल्क खुशहाल हैं वे अपनी मेहनत और अक्ल से आगे बढ़े हैं।… हमारे हिंदुस्तान में काफी मेहनत करने की आदत आमतौर से नहीं हुई है… हम भी मेहनत और अक्ल से बढ़ सकते हैं।… इंसान की मेहनत से सारी दुनिया की दौलत पैदा होती है। जमीन पर किसान काम करता है, या कारखाने में कारीगर, उनसे काम चलता है। कुछ बड़े अफसर दफ्तर में बैठकर दौलत पैदा नहीं करते। दौलत मेहनतकश लोगों की मेहनत से पैदा होती है। तो हमें अपनी मेहनत को बढ़ाना है।"
नेहरू जी खुद लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए संसदीय प्रणाली की व्यवस्था कायम की। उन्होंने संविधान के मूल आदर्शों लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समानता को व्यवहार में लागू करने का प्रयास किया। वे मानते थे कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में धर्मनिरपेक्षता ही राष्ट्रीय एकता का आधार बन सकती है। उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण के लिए विज्ञान का रास्ता चुना। उन्होंने देश में बड़े-बड़े कल, कारखाने, बांध, अस्पताल, वैज्ञानिक प्रयोगों को बढ़ावा देने वाले संस्थान खड़े किए। उनके प्रयासों से आईआईटी (IIT), एम्स (AIIMS) जैसे विश्वस्तरीय संस्थान तैयार किए गए। उन्होंने भाखड़ा नांगल जैसे विशाल बांधों को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा। नेहरू जी पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से आर्थिक विकास कार्यक्रमों को बढ़ाया।
अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने नेहरू को विश्व शांति का समर्थक बताया। उन्होंने कहा था- 'नेहरू केवल भारत के नेता नहीं, बल्कि विश्व राजनीति में नैतिक शक्ति के प्रतीक हैं।'
'नेहरू ने नए स्वतंत्र हुए देशों को दिया आत्मविश्वास'
नस्लवाद के खिलाफ संघर्ष करने वाले दक्षिण अफ्रीकी महान नेता नेल्सन मंडेला ने नेहरू को उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष का प्रेरणास्रोत माना। मंडेला का मानना था कि नेहरू ने एशिया और अफ्रीका के नए स्वतंत्र हुए देशों को आत्मविश्वास दिया। उन्होंने कहा कि नेहरू का लोकतांत्रिक आदर्श विकासशील देशों के लिए मार्गदर्शक बना।
'परमाणु युद्ध के खतरे के समय नेहरू की नीति प्रशंसनीय'
दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell) ने नेहरू को 'शांति और विवेक का नेता' कहा। रसेल ने परमाणु युद्ध के खतरे के समय नेहरू की शांति नीति और कूटनीतिक संतुलन की प्रशंसा की थी।
'आधुनिकता के साथ भारतीयता से जुड़े रहे नेहरू'
प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबी (Arnold Toynbee) ने नेहरू के बारे में कहा था कि वे ऐसे नेता थे जिन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति और आधुनिक पश्चिमी विचारों के बीच संतुलन स्थापित किया। टॉयनबी के अनुसार, नेहरू की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे आधुनिकता को अपनाते हुए भी भारतीयता से जुड़े रहे।