Karpoor Chandra Kulish birth Centenary: राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की जन्मशती वर्ष पर मोहन वीणा के आवष्किारक और ग्रैमी अवॉर्ड विजेता विश्व मोहन भट्ट उन्हें याद कर रहे हैं।
Karpoor Chandra kulish birth centenary: राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी से कौन नहीं जुड़ा है? पत्रिका के माध्यम से उनसे सभी जुड़े हुए हैं। राजस्थान पत्रिका हमारे घर में शुरू से आता है। पहले कुलिशजी, फिर गुलाब जी और अब उनके पुत्र यानी तीन पीढ़ियों से पत्रिका और कुलिश जी से हमारा संबंध रहा है। उनसे हमारा जुड़ाव तब और गहरा हो गया जब उनके मन में एक अद्भुत रचना करने की इच्छा जागृत हुई। संस्कृत के कवि जयदेव की गीत गोविन्दम को संगीतबद्ध करके उसकी रिकॉर्डिंग की जाए। उनका यह भी विचार था कि उसपर बाद में वीडियो भी बनाया जाए।
कुलिशजी ने मुझे बुलाकर गीत गोविन्दम क्या है, उसके बारे में विस्तार से समझाया। गीत गोविन्दम के पदों के अर्थ भी समझाए। वह एक-एक पदों को बड़ी ही दिलचस्पी के साथ खूबसूरत अंदाज में उसका पाठ करते और फिर उसका अर्थ समझाते जाते थे। वह कहते कि इस रचना की आत्मा को समझिए, उसके भावों को पकड़िए। गीत गोविन्दम की संगीत रचना में आलोक भट्ट की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही। हमने बहुत मेहनत के साथ पुरानी तकनीक के जरिए एक-एक पद रिकॉर्ड किए। हम एक स्टूडियो में जाकर इसकी रिकॉर्डिंग किया करते थे।
मैंने एक बार बातों ही बातों में उनसे कहा कि खुद का स्टूडियो हो तो मजा आ जाता। मेरा यह आइडिया उन्हें भा गया। उन्होंने कुंडा में साउंड रिकॉर्डिंग का स्टूडियो बनवाया। हमलोगों को गीत गोविंदम की रिकॉर्डिंग करने में करीब-करीब सालभर लग गए। इस दौरान कुलिशजी और मैं हर रोज जरूर मिलते थे। रोज पूछते थे कि आज कौन सा पद ले रहे हैं? कृष्ण का पद ले रहे हैं या राधा का? वह काम को लेकर बहुत समर्पित रहते। वह जो काम ठानते, उसमें पूरी तरह रम जाते। रिकॉर्डिंग पूरी होने के बाद उन्होंने मुंबई से एक कोरियोग्राफर को बुलाया, उन्होंने इसमें कोरियोग्राफी की। इसके बाद इसे दूरदर्शन को सौंपा गया। इसका प्रसारण दूरदर्शन के राष्ट्रीय और राजस्थान चैनल पर हुआ।
12वीं सदी के कवि जयदेव रचित गीत गोविंदम में श्री राधा-कृष्ण के प्रेम, वियोग और मिलन को चित्रित करने वाली 24 अष्टपदियां हैं। पूरे की रिकॉर्डिंग हुई थी। इस काम के दौरान मैं कुलिशजी के विराट व्यक्तित्व से परिचित होता चला गया। उन्हें संस्कृत भाषा, संस्कृत की रचनाओं का पूरा ज्ञान था। भारतीय दर्शन के बारे में उनकी समझ बहुत गहरी थी।
कुलिशजी से जुड़ा एक वाकया मेरे साथ और जुड़ा हुआ था। मुझे 1994 में संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान मिला- ग्रैमी अवॉर्ड। कुलिश जी मुझे सम्मान मिलने से बहुत खुश हुए। उस समय प्रदेश (राजस्थान) के मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत साहब थे। कुलिश जी के भैरों सिंह शेखावत से बहुत अच्छे संबंध थे। उन्होंने शेखावतजी से कहा कि विश्व मोहन भट्ट जी संगीत के क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा अवॉर्ड लेकर आए हैं। आप उनका राजकीय सम्मान कीजिए।
भैरों सिंह जी को कुलिशजी का आइडिया पसंद आया। उन्होंने मेरा जयपुर के बिड़ला ऑडिटोरियम में राजकीय सम्मान करवाया। भैरों सिंह जी ने मुझसे कहा कि ग्रैमी अवॉर्ड की ट्रॉपी तो बहुत बढ़िया मिली है, लेकिन हम आपको इससे तीन गुणा बड़ी ट्रॉपी भेंट करेंगे। मोहन वीणा की प्रतिकृति पीतल की बनवाकर उसपर गोल्डन पॉलिश करवाकर भेंट की। शायद उस समय 35 हजार रुपये में ट्रॉफी बनी थी। पूरा ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। एक लाख रुपये की राशि भी दी। मुझे अपने प्रदेश में राजकीय सम्मान मिला, इसमें कुलिश जी की बहुत बड़ी भूमिका रही। राजकीय सम्मान कार्यक्रम के दौरान कुलिश जी ने भैरों सिंह शेखावत जी से पहले बहुत ही शानदार भाषण दिया था। उन्होंने भाषण के दौरान मेरी बहुत सराहना की।
कुलिशजी के व्यक्तित्व का खास पहलू यह था कि वह जिनसे जुड़ते, उनका खास मौकों पर ख्याल जरूर करते। गीत गोविंदम की रचना पूरी करने के बाद हमदोनों के मिलने का सिलसिला कम होता गया, लेकिन उन्होंने उसके बाद भी जब भी कोई कार्यक्रम किया, उसका न्योता मुझे जरूर भिजवाते। पत्रिका या व्यक्तिगत किसी बड़े फंक्शन या किसी त्योहार पर मुझे संदेशा जरूर भिजवाते। उन्होंने मुझे ताउम्र भरपूर इज्जत बख्शी। वह बहुत आनंदित रहते। उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान बनी रहती। वह पत्रिका जैसे बड़े अखबार की जिम्मेदारी संभालते हुए भी कभी तनाव में दिखाई देते। यह उनके विराट व्यक्तित्व की बहुत बड़ी बात है। वह बेहद उर्जावान व्यक्ति थे।
मैंने जेम सिनेमा के पास छोटे से दफ्तर से पत्रिका के संपादन का सफर देखा। कुलिश जी ने सिर्फ 30 वर्ष की उम्र में बगैर पूंजी के अपने दम पर पत्रिका शुरू किया और उसे अपने जीवनकाल में बहुत बड़ा बना दिया। यह उनकी जीवटता और समर्पण का नतीजा है। वह काम को लेकर बहुत सख्त थे। उनके सामने कोई कोताही नहीं बरत सकता था, लेकिन वह उतने ही नरमदिल भी इंसान थे। वह अपने साथ काम करने वालों से उनके बच्चों के बारे में जानकारी लेते थे। उन्हें कुछ-कुछ गिफ्ट भी देते रहते थे। मेरे दोनों बच्चों सलिल और सौरभ दोनों को भी उन्होंने भरपूर आर्शीवाद दिया और कहा कि अपनी परंपरा को आगे बढ़ाओ।