Patrika Special News

Kulishji birth centanary: जुनून, संकल्प और साहस की प्रतिमूर्ति

Karpoor Chandra Kulish birth Centenary: राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की जन्मशती वर्ष पर वरिष्ठ पत्रकार और लेखक ओम थानवी उन्हें याद कर रहे हैं।

12 min read
Mar 16, 2026
राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जन्मशती मनाई जा रही है।

Kulishji birth centanary: मैंने कुलिशजी को पत्रकारिता में हमेशा गुरु माना। गुरु किसे कहते हैं? जिनसे हम सीखते हैं। जो सिखाते हैं, उन्हें हम शिक्षक कहते हैं। मैंने कुलिशजी से सीखा और सीखता रहा। तब भी जब मैं पत्रिका से जनसत्ता में जा चुका था। कुलिशजी के निधन पर मैंने जनसत्ता में लेख लिखा - “एक गुरु का जाना”।

जब मुड़कर देखता हूँ तो पाता हूं कि कितनी मुश्किलों से उन्होंने पत्रिका शुरू की। प्रतिष्ठान तो बाद में बना। इसकी कहानी कभी-कभी वे बताते थे। मेरे पत्रिका से जुड़ने से बहुत पहले की दास्तान है। शायद घी वालों के रास्ते से उस संघर्ष की शुरुआत हुई। इसके बाद उनके साथ एक सेठ जुड़े। उनसे विवाद हो गया। ऐसा कि दो-दो राजस्थान पत्रिका छपने लगी। मामला न्यायालय पहुंचा और टाइटल कुलिशजी को ही मिला, जिसके वे हकदार थे।

… बाद में संस्करणों की कतार खड़ी होती चली गई

बाक़ी इतिहास है, जैसा कि अंग्रेज़ी में कहते हैं। अखबार बड़ा होता चला गया। हमारे दौर में पत्रिका के नाम के साथ रोज़ मुद्रित प्रतियों की संख्या भी छपती थी, जिसे ऑडिट ब्यूरो प्रमाणित करता था। आगे उनके दोनों पुत्र भी आ जुड़े, जो तब भिलाई और बेंगलुरु में रोज़गार में थे। इसके बाद कई संस्करण शुरू होते चले गए। उदयपुर संस्करण गुलाबजी ने खड़ा किया। उनके छोटे भाई मिलापजी जोधपुर गए। बाद में तो संस्करणों की कतार खड़ी हो गई।

कुलिशजी पहले कवि भी थे

लेकिन यह एक दिन की कहानी नहीं है। इस यात्रा में कुलिशजी के व्यक्तित्व और उनके संघर्ष को देखा जाना चाहिए। और उन मूल्यों को, जिनमें उनकी आस्था रही। संघर्ष तो सभी को करना पड़ता है। कुलिशजी में खबर और भाषा, इन दोनों चीजों के तेवर बारीकी से गुँथे हुए थे। कम लोगों को पता होगा कि वे पहले कवि थे। तार सप्तक की तर्ज पर राजस्थान के सात कवियों का संकलन ‘सप्तकिरण’ छपा था। नंद चतुर्वेदी, कमलाकर आदि के साथ कुलिशजी की कविताएं भी उसमें थीं।

कुलिशजी की कविता पाठ पर बखेड़ा खड़ा हो गया था

कुलिश (प्रहार करने वाली गदा) उनका कविनाम ही था। नाम के अनुरूप जुझारू तेवर उनमें तब से ज़ाहिर थे। आकाशवाणी जयपुर में उनकी एक कविता के पाठ पर बखेड़ा खड़ा हो गया था। तब प्रसारण ‘लाइव’ हुआ करते थे। कुछ वर्ष बाद कविता तो उनसे छूट गई, मगर वे तेवर उनकी पत्रकारिता में आ गए। उनमें संघर्ष का जो जज्बा था, उसके अनेक प्रसंग उनके आत्मकथात्मक संवाद “धाराप्रवाह” और विजय भंडारी (कुलिशजी के बाद पत्रिका के प्रधान संपादक) की किताब “कुलिशजी” में मिलते हैं।

पत्रिका राजस्थान का पहला विशुद्ध पेशेवराना अखबार

राजस्थान पत्रिका की साख इसलिए बनी क्योंकि वह संघर्ष की बुनियाद पर खड़ा हुआ। पत्रिका से पहले प्रजासेवक, लोकवाणी आदि अखबार निकले, जिनके पीछे राजनेता खड़े होते थे। पत्रिका विशुद्ध पेशेवराना अखबार के तौर पर शुरू हुआ। राष्ट्रदूत भी कुछ हद तक पेशेवराना अखबार था, कुलिशजी और श्रीगोपाल पुरोहित जैसे पत्रकार राष्ट्रदूत से ही निकले। लेकिन पत्रिका कहीं ज्यादा पेशेवर साबित हुआ।

कुलिशजी की 'घुमक्कड़राम की डायरी' से राष्ट्रदूत को हुई दिक्कत

कुलिशजी ने मुझे खुद एक किस्सा सुनाया था कि ख्रुश्चेव और बुल्गानिन जब जयपुर आए, सरकारी खर्च पर शहर में रंग-रोगन हुआ। वे राष्ट्रदूत 'घुमक्कड़राम की डायरी' स्तम्भ लिखा करते थे। उन्होंने डायरी में वह प्रसंग भी लिखा। राष्ट्रदूत के संचालकों को उससे दिक्कत हुई। मालिकों के कहने पर अखबार के संपादक बगल की सीट पर आकर बैठने लगे। यह अनुभव बयान करते हुए वे कहा करते थे कि जो लिखना है, आप सदा लिख सकते हैं; लिखते कोई आपका हाथ नहीं पकड़ता। साहस पत्रकार को जुटाना पड़ता है।

राष्ट्रदूत से दो बार त्यागपत्र देना, कुलिशजी के साहस का प्रमाण

साहस का ही प्रमाण था कि राष्ट्रदूत से उन्होंने दो बार त्यागपत्र दिया। पहली बार मना लिए गए। दूसरी बार त्यागपत्र वापस नहीं लिया। तीन महीने का वेतन राष्ट्रदूत में बाकी था। पाँच सौ रुपए का कर्ज जुटाकर राजस्थान पत्रिका शुरू कर दिया। जोधपुर के पत्रकार हरमल सिंह जी को साथ लिया। वे बाद में फिल्मों की पटकथा और संवाद के काम में मुंबई चले गए और उम्र के अंतिम पड़ाव में फिर पत्रिका से आ जुड़े। हरमल सिंह जी साथ विजय भंडारी जी भी आरम्भ के सहयोगी पत्रकार थे, जो कुलिशजी के बाद हमेशा पत्रिका के प्रधान संपादक हुए।

राजस्थान पत्रिका कई पड़ावों से गुजरा। पैसा बार-बार उधार नहीं मिल सकता था। उसके उपाय सोचे। सुनते हैं एक बार ट्रस्ट बनाया। एक बार सहकारी समिति बनाई। इन सब रास्तों से गुजरते हुए अखबार खड़ा हुआ। संस्थापक का जुनून, संकल्प और साहस ऐसे तत्त्व रहे जिन्होंने एक पेशेवर अख़बार की बुनियाद मजबूत की।

कुलिशजी भाषा को लेकर बहुत सजग रहते थे

एक और महत्त्वपूर्ण बात। कुलिशजी भाषा को लेकर बहुत सजग रहते थे। कवि होने के बावजूद अख़बार में बहुत परिष्कृत हिंदी के पक्ष में वे कभी नहीं रहे। उनका साफ कहना था कि हमें पंडितों की नहीं, बोलचाल की हिंदी लिखनी चाहिए क्योंकि अख़बार पान वाला भी पढ़ता है। आज जो हिंदी और उर्दू की बहस खड़ी हो गई, वे इसमें पड़ना ही नहीं चाहते थे। हिंदी खुद फारसी का शब्द है। हिंदी ने कितने ही अरबी, फारसी, तुर्की, पश्तो के शब्द हिंदी में ले लिए और हमारी रोजमर्रा की भाषा में रच-बस गए। उन्हें हिंदी के शब्द ही मानना चाहिए, पराए शब्द नहीं।

कुलिशजी चाहते थे कि अखबार में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग न हो

यह पत्रिका की भाषा-नीति रही जो आगे भी कायम रही। कुलिशजी यह भी कहा करते थे कि हवा के साथ ना बहें। आजकल तो अख़बारों में अंग्रेजी के शब्दों का फिजूल प्रयोग धड़ल्ले से होने लगा है। कुलिश जी चाहते थे कि अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग यथासंभव न हो और जहां जरूरी हो तो वहां उस शब्द का हिंदी का पर्याय साथ में दिया जाए। यहाँ तक कि संक्षिप्ताक्षरों के पूर्ण रूप भी जब-तब कोष्ठक में लिखने का सुझाव देते थे।

अखबार की भाषा समृद्ध हो इसलिए विद्वानों को पत्रिका से जोड़ा

भाषा के प्रति कुलिश जी की सजगता का एक और उदाहरण देना उचित होगा। इस प्रयोजन से उन्होंने दो जानकारों को अखबार से जोड़ा। एक चंद्रगुप्त वार्ष्णेय थे, जो शास्त्रीय विद्वान थे। वे पत्रिका में कुछ न कुछ सिलसिलेवार लिखते थे। भाषा को लेकर भी उनका परामर्श बराबर मिलता रहता था। दूसरे भगवान सहाय त्रिवेदी थे, जिनका हाल में निधन हो गया। वे 'विकास' नामक पत्रिका के संपादक थे। सेवनिवृत्ति के बाद उनको अखबार से जोड़ लिया गया।

पत्रिका की भाषा-नीति तैयार की, वर्तनी के कायदे बनाए गए

केसरगढ़ के सबसे बड़े कमरे में पुस्तकालय और संदर्भ-कक्ष स्थापित हुआ। त्रिवेदीजी पुस्तकालय में बैठते थे और रोज अखबार में भाषा त्रुटियां रेखांकित करते थे। उन्होंने ही पत्रिका की भाषा-नीति तैयार की; वर्तनी के कायदे बनाए। जैसे यह कि पत्रिका में "द्वारा" शब्द न लिखकर "की ओर से" लिखा जाएगा। हालाँकि कुछ सुझाव मुझे शुष्क लगते थे और मैं उन पर बहस करता था।

प्रभाष जोशी जी ने पत्रिका की भाषा-नीति की मंगवाई थी प्रति

जब प्रभाष जोशी जी ने जनसत्ता शुरू किया तब पत्रिका की उस भाषा-नीति की प्रति मंगवाई थी कुछ कायदों का जनसत्ता में प्रयोग हुआ। त्रिवेदीजी की तरह कुलिश जी ने मनोहर प्रभाकर को भी पत्रिका से जोड़ा था, जिनका हिंदी और अंग्रेजी दोनों पर अधिकार था। नए पत्रकारों को प्रशिक्षण देने के लिए दिनेश खरे जी को भी लाए, जो राष्ट्रदूत में उनके संपादक थे। इस तरह नए लोगों के साथ उन्होंने अनुभवी लोगों को भी पत्रिका से जोड़ा। यह सम्यक दृष्टि कम संपादकों में मिलेगी।

मैं पत्रिका से कुछ इस तरह जुड़ा

मैं भी पत्रिका से ऐसे ही जुड़ा। मैंने पत्रकारिता 1977 में स्वछंद पत्रकार के रूप में शुरू की थी। अध्ययन के साथ रंगमंच की गतिविधियों से जुड़ा था और पत्रिका-रविवारी में "रंग-बहुरंग" नाम से एक पाक्षिक स्तम्भ लिखता था। कोलकाता (तब कलकत्ता) से साप्ताहिक रविवार शुरू हुआ तो उसमें लिखने लगा। 1979 में जैसलमेर सरहद पर सऊदी के शहजादे के शिकार प्रकरण की खबर साप्ताहिक रविवार के लिए लिख रहा था, उसे कुलिशजी ने पत्रिका में प्रकाशित किया और अखबार से जुड़ने का प्रस्ताव भी दे डाला।

रियो द जनीरो (ब्राजील) में कुलिशजी के साथ ओम थानवी 

कुलिशजी ने मुझे पेशेवर प​त्रकार बना दिया

मैंने अगले साल पत्रिका में काम शुरू कर दिया। कुछ ही महीनों में मैं पत्रिका के टैब्लॉयड इतवारी पत्रिका का संपादन प्रभारी हो गया। तब मैं 23 वर्ष का था। कॉमर्स की उच्चशिक्षा प्राप्त करते हुए कभी सोचा नहीं था कि पेशेवर पत्रकार बनूँगा। कुलिशजी ने बना दिया। आज सोचता हूँ कि 23 वर्ष के अनुभवविहीन युवक को समूचे साप्ताहिक का जिम्मा सौंप देना मामूली जोखिम नहीं थी, जो उन्होंने ली।

कुलिशजी ने मुझ अनुभवविहीन युवक को इतवारी पत्रिका का जिम्मा दे दिया

मगर कुलिशजी ऐसे ही थे। इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे साफ कहा कि अपने जैसे युवाओं को अखबार से जोड़िए। मैंने युवा पत्रकार जोड़े। जो वेतन मैंने तय किया, वह उन्हें मिला। युवा लोगों की एक श्रेष्ठ टीम बनी। कुछ युवा पत्रकार कुलिशजी ने इतवारी में भेजे — "तुम्हारे साथ अच्छे चलेंगे"। अच्छे स्वतंत्र पत्रकार (जैसे मिलापचंद डांडिया, राजेंद्र बोड़ा आदि) और लेखक-स्तंभकार (अज्ञेय, प्रयाग शुक्ल, नंदकिशोर आचार्य, कृष्ण कुमार आदि) भी हमें मिले। वेदप्रताप वैदिक, दीनानाथ मिश्र, राजकिशोर, बनवारी जैसे वरिष्ठ पत्रकार दूसरे प्रकाशनों में काम करते हुए भी हमारे लिए लिखते थे।

उसी दौर में अशोक शास्त्री, भुवनेश जैन (अब पत्रिका ग्रुप के डिप्टी एडिटर), आनंद जोशी, संजीव मिश्र, संजय मांधना, गोपाल शर्मा (अब विधायक) आदि इतवारी पत्रिका से जुड़े। इतवारी पत्रिका के बाद कुलिशजी ने मुझे पत्रिका के बीकानेर संस्करण प्रभारी संपादक बनाया। वहाँ से - 1989 में - मैं जनसत्ता (चंडीगढ़, फिर दिल्ली) में चला गया और छब्बीस वर्ष वहाँ रहकर दिल्ली में सलाहकार संपादक के नाते फिर पत्रिका से आ जुड़ा।

कुलिशजी ही थे, जिन्होंने राजस्थान के 50 हजार गाँवों की कहानी लिखवाई

कुलिशजी ने पत्रकारिता में कई नवाचार किए। उन्होंने एक महत्त्वाकांक्षी योजना हाथ में ली - 'आओ गांव चलें'। राजस्थान के पचास हजार गाँवों की कहानी पत्रिका लिखेगा। गाँव की ओर कोई ध्यान नहीं देता। निरंतर संघर्षरत रहे हैं। हर संस्करण में रोज एक गाँव पर आलेख होगा। अतीत से वर्तमान तक का संक्षिप्त सफर। 'आओ गांव चलें' स्तंभ की जगह संपादकीय पृष्ठ के सामने वाले पृष्ठ पर नियत कर दी गई थी। जयपुर क्षेत्र के अनेकानेक गाँवों पर बिशनसिंह शेखावत ने लिखा। वे बड़े शिक्षक नेता ही नहीं, बड़े पत्रकार भी थे। ठेठ जमीन से जुड़े हुए। बीकानेर के कुछ गाँवों पर मैंने भी लिखा।

ऐसा पत्रकारिता के इतिहास में अन्यत्र कहीं हुआ हो, मुझे खयाल नहीं पड़ता। राजस्थान में रियासतों के चापलूसी भरे इतिहास बहुत लिखे गए, लेकिन गाँवों का इतिहास तो पत्रिका ने ही लिखा। गाँव में पाँव रखने पर पता चलता है कि वाचिक परंपरा कितनी समृद्ध है, नागरिक जबान पर इतिहास रखते हैं। आसानी से पता चल जाता था कि वहाँ क्या व्यवसाय पनपा, क्या तकलीफें रहीं, क्या साहित्य रचा गया, किसने नाम कमाया, कौन सैनिक शहीद हुआ आदि।

कुलिशजी सामंतवाद के विरोधी थे

इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि कुलिशजी सामंतवाद के विरोधी थे। राजस्थान तो सामंतशाही से ही निकलकर आया। सामंती सोच जगह-जगह जड़ें जमाए हुए था। उदाहरण के लिए अतीत के रजवाड़े वर्तमान की राजनीति में पाँव जमाने के ख्वाहिशमंद थे। कुलिशजी इसमें कोई बुराई नहीं देखते थे। लेकिन वे कहते थे कि जनता को अपना मत अपने विवेक से देने दें। एक बार चुनाव की घड़ी में एक पूर्व राजा ने कहा कि जनता मुझे जनादेश दे और जिताए। कुलिशजी ने लिखा कि आप यह बोझ जनता पर मत डालिए, वह आपके राज से निकल आई है। आप राजनीति में आएं, इसका स्वागत है। जनता जिसे चाहेगी, लोकतंत्र में अब खुद चुन लेगी।

कुलिशजी ने जब उपराष्ट्रपति को बोलने के लिए किया विवश

कुलिश जी अपनी बात कहने में मुखर थे। उनके साहस के कुछ और उदाहरण बताता हूं। उनकी दोहों की किताब 'सात सैंकड़ा' का लोकार्पण तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत ने किया था। राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति किताब का लोकार्पण करते हैं, तो पता नहीं क्यों उसे लोकार्पण कहने की बजाय कहा जाता है कि किताब उन्हें भेंट की गई। मैं उस कार्यक्रम में मौजूद था। कुलिश जी ने अपनी बात कही। मगर उपराष्ट्रपति महोदय ने कुछ भी नहीं कहा। कुलिश जी ने उनसे कहा कि महोदय मैं जयपुर से आया हूँ, कुछ लिखा है, उस पर आप भी कुछ कहिए। संक्षेप में सही, उन्होंने उपराष्ट्रपति को बोलने के लिए विवश किया।

कुलिशजी ने तत्कालीन पीएम अटलजी से कह दी ये बात

इसी तरह कुलिशजी ने एक बार प्रधानमंत्री (तत्कालीन) अटलबिहारी वाजपेयी से पंचवटी (आवास) में मिलकर वेदों पर अपनी कृतियों का सेट भेंट किया। भंडारीजी उस संक्षिप्त आयोजन में थे। वे बताते थे कि प्रधानमंत्री ने राजस्थान पत्रिका की तारीफ की और कुलिश जी की भी तारीफ की। शायद अपने स्वभाव के चलते चुटकी लेते हुए उन्होंने यह भी कहा कि पत्रिका वाले बीच-बीच में हमारी आलोचना भी कर डालते हैं। कुलिशजी फौरन खड़े हो गए और बोले - आप हमारे इस अधिकार की चुनौती नहीं दे सकते। यह हमारा हक है कि हम जब चाहें और जो हमें उचित न लगे उसकी आलोचना करें। इमरजेंसी तो लगी नहीं है। लोकतंत्र में आप किसी से बोलने का अधिकार नहीं छीन सकते। अपनी कुर्सी से उठकर ऐसी यह बात प्रधानमंत्री के सामने दो टूक कहना अपने आपमें बड़ी बात थी। आज तो प्रधानमंत्री के सामने अप्रिय बात सोच पाना भी मुश्किल जान पड़ता है।

कुलिशजी ने मतदाताओं से सार्वजनिक रूप से मांगी थी माफी

कुलिशजी एक खास बात यह भी थी कि वे नियमित रूप से समाज, राजनीति या किसी मौजूं विषय पर संपादकीय लिखते रहते थे। पहले पन्ने हर रोज पर उनकी टिप्पणी प्रकाशित होती। बहुत मारक टिप्पणी लिखते थे। इसलिए उनका लिखा संपादकीय भी बहुत चाव से पढ़ा जाता। 'क. च. कुलिश' नाम से लिखते थे। उनके कई संपादकीय मुझे स्मरण हैं। लेकिन मैं उनकी सबसे महत्वपूर्ण संपादकीय उस टिप्पणी को मानता हूं जिसमें उन्होंने मतदाताओं से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।

कुलिशजी पाठकों का भरोसा किसी कीमत पर तोड़ना नहीं चाहते थे

कुलिशजी में खबर और भाषा, इन दोनों चीजों के तेवर बारीकी से गुंथे हुए थे। कुलिशजी खबर को सूंघ ही नहीं लेते थे, उसकी महत्ता को भांपते हुए खबर में से खबर निकाल कर उसे मुद्दे को तार्किक परिणति की ओर ले जाने का कौशल भी जानते थे। इस सबके पीछे उनकी नजर में सिर्फ पाठक रहता था। पाठकों का भरोसा वे किसी कीमत पर तोड़ना नहीं चाहते थे। लेकिन उस बार तमाम, सजगता के बावजूद, ऐसा हो गया।

यह 1984 की बात है। मेरे देख वह 'पत्रिका' का स्वर्णिम युग था। जनमानस में पैठ और सत्ता के गलियारों में ऐसा दबदबा कम पत्रों को हासिल होता है। लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए कमर कस ली गई थी। कमान खुद कुलिशजी संभाले हुए थे। कुछ रिपोर्टरों का मानना था कि कांग्रेस का एक बार पूरे राज्य से सफाया हो सकता है। इसकी जानकारी मोतीचंद कोचर कुलिशजी को देने लगे। कोचर स्वयं पहले पीटीआइ के रिपोर्टर थे और अब पत्रिका में कुलिशजी के करीबी थे। मोतीचंदजी के नियमित “फीड” से कुलिशजो को भी विश्वास हो चला। कांग्रेस को कोई सीट कहां से मिलेगी, ऐसे सवाल का माहौल केसरगढ़ में बन गया।

इस सवाल का जवाब एक सीट की खबर से मैं लाया। मैंने दौसा चुनाव का दौरा किया था, जहाँ राजेश पायलट नाथूसिंह पर भारी पड़ रहे थे। मैं तब पत्रकारिता में अपेक्षया नया था और एक सीट की खबर से मोतीचंदजी को अपनी अवधारणा पर पुनर्विचार के लिए नहीं उकसा सकता था।

सबने कुलिशजी को पहली बार इस तरह आहत देखा

अफ़सोस की बात यह रही कि जब नतीजे सरासर उलटे निकले तो सारा दोष कुलिशजी पर उंड़ेल दिया गया। नतीजों की उस घड़ी में सबने कुलिशजी को पहली बार इस तरह आहत और देखा।

दौसा से जयपुर लौटकर सुबह जब मैं कुलिशजी के कमरे में दाखिल हुआ था तो बेचैन था। माहौल का मुझे पता था। मैंने बैठते ही, थोड़े नरम स्वर में कहा, दौसा में मुझे कांग्रेस जीतती लगती है।

'पायलट जीतता है तो पायलट का लिखो'

कुलिशजी को मानो भरोसा नहीं हुआ। वे ऊपर की ओर देखने लगे। मगर घड़ी भर बाद बोले, पायलट जीतता है तो पायलट का लिखो। मेरी जान में जान आई। रिपोर्ट को पहले पेज पर बॉटम बनाया जाना था। बुजुर्ग शिफ्ट प्रभारी ने मेरी रिपोर्ट पढ़कर कहा, शीर्षक भी तुम्हीं लगा दो, एक रिपोर्ट तो अब तक कांग्रेस के हक में गई नहीं है। मैंने, थोड़ा-सा कौशल बरतते हुए शीर्षक दिया था — 'दौसा में पायलट से लोहा लेना पड़ रहा है नाथूसिंह को'। चुनाव के नतीजे आए तो 25 में से एक भी सीट भाजपा को नहीं मिली।

कुलिशजी चुनाव नतीजों पर कुछ नहीं बोले

उस शाम वरिष्ठ संपादक कैलाश मिश्र के साथ मैं चाय के लिए केसरगढ़ से बाहर आया। हम बाहर एक छोटी-सी दुकान के सामने बैठकर चाय पीते, गपशप करते थे। अचानक हमने पीछे से कुलिशजी की भारी आवाज सुनी - रुको, मैं भी चल रहा हूं। भारी कदमों से कुलिशजी हमारे साथ बाहर आए। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। हम हैरान थे। हमने संकोच के साथ अध-मूढ़ों पर बैठ चाय पी। चाय वाला - जो हरदम कंधा उचकाता रहता था - यों देख रहा था मानो भरोसा न हो कि कुलिशजी सामने चाय के लिए बैठे हैं। कुलिशजी लगभग चुप और जाहिरा तौर पर उद्विग्न थे। नतीजों पर कुलिशजी कुछ नहीं बोले। न हमारी हिम्मत हुई। अकल्पनीय परिस्थिति सामने थी। कुलिशजी कुछ सोचते रहे और कैलाश मिश्र जैसे नजरों से जमीन में कुछ तलाशते थे। मोतीचंद कोचर घर जा चुके थे।

अगली सुबह सबसे ऊपर चौंकाने वाला संपादकीय देखा- ''क्षमा''

अगली सुबह हमने - अन्य पाठकों की तरह - पत्रिका में सबसे ऊपर चौंकाने वाला संपादकीय कुलिशजी के नाम से देखा -''क्षमा''। उन्होंने लिखा था, "मुझे अतीव खेद है कि मैं मतदाता के मानस को भांपने में पूरी तरह विफल हुआ। मेरे पास कोई सफाई नहीं है और संपूर्ण विनम्रता के साथ मैं पाठकों से क्षमा चाहता हूं।”

पत्रकारिता के इतिहास में पेशेवर निर्णय की भूल का ऐसा स्वीकार शायद न मिले। यह ज़िम्मेदार पत्रकारिता के प्रति कुलिशजी के सरोकार का इजहार ही नहीं था, आने वाली पत्रकारिता के लिए भी सीख-भरा अहम संदेश था।

कुलिशजी लिखने के साथ बोलते भी बहुत सहज थे

लिखने के साथ कुलिशजी बोलते भी बहुत सहज थे। वेद-विज्ञान पर उनके व्याख्यान विद्वत्ता के साथ सहज संप्रेषण के लिए भी स्मरण किए जा सकते हैं। मैं उन थोड़े लोगों में हूँगा जिन्हें उन्हें कुलिशजी को हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी सुनने का अवसर मिला।

कुलिशजी उसी होटल में रूके, जहां मैं रूका हुआ था

हुआ यों कि 1992 में लैटिन अमेरिका के तटीय शहर रियो द जनीरो (ब्राजील) में संयुक्त राष्ट्रसंघ का जो पहला पर्यावरण सम्मेलन - "पृथ्वी सम्मेलन" - हुआ, उसमें हम दोनों ने साथ में शिरकत की थी। मैं तब जनसत्ता के चंडीगढ़ संस्करण का संपादक था; कुलिशजी जयपुर से आए। मैं पहले पहुँच चुका था। कुलिशजी का बड़प्पन कि उसी होटल में रुकना चाहा, जिसमें मैं ठहरा हुआ था। हम लोगों ने रियो की जो सैर की, उसका खर्च भी उन्होंने उठाया। पर्यटकों के रूप में साथ में जो फोटो खिंचवाया, वह चीनीमिट्टी की तश्तरी में दोनों को मिला। मेरे लिए वह अब अमूल्य स्मृतिचिह्न है।

रियो में संयुक्त राष्ट्रसंघ के पृथ्वी सम्मेलन को संबोधित करते हुए कुलिशजी। फोटो: ओम थानवी

मैंने कुलिशजी को अंग्रेजी में भी बोलते हुए सुना

वहाँ रियो के अंतरराष्ट्रीय मंच पर कुलिशजी ने अपना उद्बोधन दिया। मैंने अंग्रेजी में बोलते हुए उन्हें पहली बार वहीं सुना। लहजे के निजी पुट के साथ वे धाराप्रवाह बोलते चले गए। दिया गया समय निकल गया, पर बात पूरी करने में समय लगा। उन्होंने भारत की बौद्धिक चेतना में पर्यावरण के प्रति बरती गई सजगता का जिक्र जीवन-शैली के उदाहरणों के साथ किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण हमारे यहाँ नारा नहीं है, हम उसे जीते हैं। बाद में भंडारीजी ने फोन कर मुझसे कुलिशजी के वक्तव्य का ब्योरा लिया और पत्रिका के पाठकों को उस अहम शिरकत की खबर दी।

Also Read
View All

अगली खबर