Kerman village guava decline: छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले का करमन गांव कभी अमरूद की पैदावार और गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन बदलती परिस्थितियों और सरकारी उपेक्षा के कारण अब यह विरासत मिटने की कगार पर है।
CG News: छत्तीसगढ़ के कई जिलों में अमरूद की खेती को लेकर किसानों में चिंता बढ़ रही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कई गांवों में इसका अस्तित्व खतरे में है। जी हां, छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में, नवागढ़ विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत, हाफ नदी के किनारे बसा एक छोटा-सा गांव है करमन। यह गांव कभी अमरूद की खेती के लिए इतना मशहूर था कि बाजार में "करमन की बिही" सुनते ही लोग उसे हाथों-हाथ खरीद लेते थे। लेकिन आज यह विरासत धीरे-धीरे मिटती जा रही है।
जहां कभी लगभग 100 एकड़ में हरे-भरे अमरूद के बगीचे लहराते थे, वहां अब मुश्किल से गिनती के पेड़ बचे हैं। यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि एक पारंपरिक फसल, किसानों की मेहनत और बदलती परिस्थितियों की है।
करमन गांव की अमरूद खासतौर पर "बिही" या "बीही" किस्म की थी, जिसे वीएनआर बीही (VNR Bihi) जैसी लोकप्रिय किस्मों से जोड़ा जाता है। यह अमरूद सामान्य किस्मों से काफी बड़ा होता था। एक फल का वजन 300 से 400 ग्राम तक, कभी-कभी इससे भी ज्यादा। इसका स्वाद मीठा, रसदार और सुगंधित होता था, जिसकी वजह से यह न सिर्फ स्थानीय बाजारों में, बल्कि दूर-दूर के शहरों तक मशहूर था।
लोग इसे "करमन की बिही" कहकर पुकारते थे और इसकी मांग हमेशा बनी रहती थी। किसान बताते हैं कि पहले हर परिवार के पास अपना अमरूद का बगीचा था। सुबह होते ही हाफ नदी की कल-कल ध्वनि, कोयल की कूक और तोतों की चहचहाहट से गांव जागता था। बगीचों में अमरूद के पेड़ फलों से लदे रहते थे। फसल अच्छी होने पर किसान अच्छी कमाई करते थे और परिवार की जरूरतें आसानी से पूरी हो जाती थीं।
आज स्थिति पूरी तरह बदल गई है। गांव में अमरूद की खेती अब सिर्फ 10 एकड़ के आसपास सिमट गई है। कई किसान, जैसे गजराज, दिलीप, राजेश, शिवकुमार, धनसाय, मोहित और खेलन, जो कभी अमरूद बेचकर घर चलाते थे, आज खुद बाजार से अमरूद खरीदने को मजबूर हैं।
नई पीढ़ी का मोहभंग: युवा पीढ़ी अमरूद की खेती से दूर हो गई है। इसमें मेहनत ज्यादा लगती है और फल आने में समय भी लगता है, जबकि धान या अन्य फसलों से जल्दी नकद कमाई हो जाती है।
धान की खेती का लालच:धान की खेती में साल में दो फसलें ली जा सकती हैं, जिससे निश्चित और त्वरित आय मिलती है। इसलिए किसान अमरूद के बगीचों को उजाड़कर उन जमीनों पर अरहर, गेहूं, चना जैसी फसलें बोने लगे हैं।
जल संकट और संसाधनों की कमी: सिंचाई की समस्या, पानी की कमी, खाद-खुराक का अभाव और बगीचे में रहने की कठिनाइयां किसानों को परेशान करती हैं। अमरूद के पेड़ों को नियमित देखभाल चाहिए, लेकिन ये सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।
सरकारी प्रोत्साहन और बीमा का अभाव: किसानों को कोई विशेष सब्सिडी, फसल बीमा या प्रोत्साहन नहीं मिला। अगर समय रहते पानी, खाद, तकनीकी सहायता और बाजार की गारंटी मिलती, तो शायद स्थिति अलग होती।
बाजार में कमी: नवागढ़ बाजार के अनुभवी व्यापारी छन्नू सोनी, जो पिछले 60 साल से बाजार देख रहे हैं, बताते हैं कि पहले करमन से ही पूरे इलाके में अमरूद की सप्लाई होती थी। लेकिन इस साल बाजार में "करमन की बिही" लगभग नदारद है। आसपास के गांवों में भी बगीचे उजड़ गए हैं। अब सिर्फ गमलों में प्रतीकात्मक खेती बची है, जो बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं दे सकती।
गांव में अब भी कुछ बगीचे बचे हैं, जहां पेड़ फलों से लदे दिखते हैं। युवा किसान महेंद्र भार्गव जैसे कुछ लोग अमरूद के साथ टमाटर, करेला, धनिया और सेमी की मिश्रित खेती कर रहे हैं। वे कोशिश कर रहे हैं कि पुरानी विरासत को बचाया जाए। गांव में आम के पेड़ भी काफी हैं, लेकिन किसान अब उनकी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे।
उद्यानिकी विभाग के उप संचालक हितेंद्र मेश्रा ने स्वीकार किया कि राज्य में ऐसी कोई विशेष योजना नहीं है जो सीधे अमरूद उत्पादकों को सहयोग दे सके। यह मामला नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन से जुड़ा है, लेकिन विभाग को करमन गांव की इस ऐतिहासिक खासियत की पूरी जानकारी भी नहीं थी। उन्होंने फील्ड स्टाफ भेजकर स्थिति जानने की बात कही है।
करमन का अमरूद सिर्फ एक फसल नहीं था। यह गांव की पहचान, किसानों की कमाई का स्रोत और प्रकृति की देन था। लेकिन बदलती जरूरतों, आर्थिक दबावों और सरकारी उपेक्षा ने इसे खतरे में डाल दिया है। अगर समय रहते कदम उठाए जाएं-जैसे बेहतर सिंचाई, सब्सिडी वाले पौधे, फसल बीमा, बाजार लिंकेज और युवाओं को प्रोत्साहन तो शायद करमन के बगीचे फिर से लहलहा उठें।नहीं तो एक दिन "करमन की बिही" सिर्फ यादों में रह जाएगी। एक ऐसी याद जो मीठी तो होगी, लेकिन दुखद भी। यह कहानी हमें सिखाती है कि पारंपरिक फसलों को बचाना कितना जरूरी है, वरना हम अपनी जड़ों से ही दूर होते जाएंगे।