Lala Lajpat Rai: लाला लाजपत राय ने 16 वर्ष की उम्र से ही स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना शुरू कर दिया। आजादी हासिल करने की लड़ाई में भाग लेने के लिए वह कई बार जेल गए और अपनी जान तक कुर्बान कर दी। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन को मजबूती देने के लिए पहला भारतीय बैंक की स्थापना की। आज वह देश के अग्रणी बैंकों में से एक है। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Lala Lajpat Rai Jayanti : आज भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय की 161वीं जयंती (28 जनवरी 1965) है। वह एक प्रखर भारतीय राष्ट्रवादी नेता थे और जिन्हें प्यार से 'पंजाब केसरी' कहा जाता था। उन्हें स्वदेशी आंदोलन में उनकी भूमिका और देश के लोगों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्हें याद किया जाता है। साइमन आयोग के विरोध में एक रैली के दौरान पुलिस ने उनपर बर्बरता से लाठियां बरसाईं और उनकी 17 सितंबर 1928 को लाहौर में निधन हो गया था।
उनका जन्म 1865 में मुंशी राधा कृष्ण और गुलाब देवी के घर पंजाब के मोंगा जिले के ढुडीके गांव में हुआ। लाला लाजपत राय ने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से कानून की पढ़ाई की और वहीं वकालत की। कम उम्र में ही वे आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती के अनुयायी बन गए और आगे चलकर समाज के प्रमुख नेताओं में से एक बने। 1881 में 16 वर्ष की आयु में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। लाला लाजपत राय ने 1885 में लाहौर में दयानंद एंग्लो-वैदिक स्कूल की स्थापना की और जीवन भर एक समर्पित शिक्षाविद बने रहे।
1893 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के दौरान लाला लाजपत राय की मुलाकात एक अन्य राष्ट्रवादी बाल गंगाधर तिलक से हुई और दोनों आजीवन सहयोगी बन गए। लॉर्ड कर्जन द्वारा 1905 में किए गए विवादास्पद बंगाल विभाजन के बाद, राय, तिलक और बिपिन चंद्र पाल (जिन्हें लाल-बाल-पाल कहा जाता था) ने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और जन आंदोलन का पुरजोर समर्थन किया।
वर्ष 1907 पंजाब में ब्रिटिश विरोधी गतिविधियां और जनआंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए मंडाले (तत्कालीन बर्मा) जेल में निर्वासन की सजा छह महीने के लिए भुगतनी पड़ी थी। अंग्रेजी सरकार ने बगैर मुकदमा चलाए ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। हालांकि सबूतों के अभाव के चलते उन्हें 6 महीने बाद ही रिहा करके भारत वापस भेजना पड़ा। यह उनकी सबसे चर्चित और सबसे कठोर सजा मानी जाती है। लाला लाजपत राय को कई बार नजरबंद भी किया गया।
लाला लाजपत राय 1913 में जापान, इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका के व्याख्यान दौरे पर निकले, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने के बाद उन्हें विदेश में ही रूकना पड़ा और वे 1920 तक विदेश में ही रहे। अपनी यात्राओं के दौरान वे कई प्रवासी समुदायों से मिले और 1917 में न्यूयॉर्क शहर में इंडियन होम रूल लीग ऑफ अमेरिका की स्थापना की।
वतन वापसी के बाद लाला लाजपत राय को 1920 में कोलकाता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन के दौरान अध्यक्ष चुना गया। इसी अधिवेशन में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई थी। इसके बाद लाला लाजपत को 1921 से 1923 तक कारावास की सजा सुनाई गई।
वर्ष 1928 में ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त सांसदों का एक समूह साइमन कमीशन, भारत में भारत सरकार अधिनियम, 1919 (मोंटेगु-चेम्सफोर्ड सुधार) के कार्यान्वयन का अध्ययन करने के लिए आया। इस 7 सदस्यीय समूह में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। इस बात को लेकर कांग्रेस पार्टी बेहद नाराज थी। कांग्रेस ने साइमन कमीशन का विरोध करने का फैसला लिया। कमीशन के विरोध की जिम्मेदारी लाजपत राय आयोग ने अपने कंधों पर ली। उन्होंने साइमन गो बैक के नारे लगवाए।
30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान उन पर अंग्रेजी सरकार ने बर्बरतापूर्ण तरीके से लाठीचार्ज करवाया। पुलिस की पिटाई से टूटने की बजाय लाला लाजपत राय ने आत्मविश्वास से भरकर कहा, "आज मुझ पर हुए ये प्रहार भारत में ब्रिटिश शासन के ताबूत में आखिरी कील साबित होंगे।" पुलिस ने उन्हें इस कदर पीटा कि उनकी मौत कुछ ही दिनों बाद 17 नवंबर 1928 को हो गई।
पीएनबी भारतीयों के स्वामित्व और प्रबंधन वाला पहला बैंक था। इसकी स्थापना में लाला लाजपत राय की प्रमुख भूमिका थी। इसके मैंनेजमेंट में शुरूआती दौर में लाला लाजपत राय, दयाल सिंह मजीठिया, लाला हरकिशन लाल, लाला लालचंद, काली प्रोसन्ना, प्रभु दयाल और लाला ढोलना दास रहे। बैंक पीएनबी की स्थापना 19 मई 1894 को हुई, लेकिन कामकाज लगभग एक साल बाद 12 अप्रैल 1895 को शुरू किया गया। यह भारत का पहला पूर्णतः स्वदेशी बैंक था। लालाजी शुरुआती वर्षों में बैंक के प्रबंधन से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। पीएनबी ने आधिकारिक तौर पर 1895 में लाहौर में परिचालन शुरू किया। इस बैंक में सबसे पहला खाता लाला लाजपत राय ने ही खुलवाया था।
लालाजी इस बात से बेहद चिंतित थे कि भारतीय पूंजी का इस्तेमाल अंग्रेजी बैंकों और कंपनियों को चलाने में तो हो रहा था, लेकिन सारा मुनाफा अंग्रेजों के पास जा रहा था, जबकि भारतीयों को अपनी पूंजी पर मामूली ब्याज से ही संतोष करना पड़ रहा था। उन्होंने अपने एक लेख में इसी भावना को व्यक्त किया और आर्य समाज के राय मूल राज से सहमति जताई, जो लंबे समय से यह मानते थे कि भारतीयों का अपना एक राष्ट्रीय बैंक होना चाहिए। राय मूल राज के कहने पर लाला लाजपत राय ने अपने कुछ चुनिंदा मित्रों को एक प्रपोजल भेजा। जिसमें भारत का अपना एक स्वदेशी बैंक की स्थापना पर जोर दिया गया था। भारत और पाकिस्तान के विभाजन के दौरान बैंक का मुख्यालय लाहौर से दिल्ली स्थानांतरित किया गया।
राजनीति में सक्रिय भागीदारी के अलावा लाला लाजपत राय ने अंग्रेजी और उर्दू में भी व्यापक रूप से लेखन किया। उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में 'आर्य समाज', 'यंग इंडिया', 'इंग्लैंड्स डेट टू इंडिया', 'इवोल्यूशन ऑफ जापान', 'इंडियाज विल टू फ्रीडम', 'मैसेज ऑफ द भगवद् गीता', 'पॉलिटिकल फ्यूचर ऑफ इंडिया', 'प्रॉब्लम ऑफ नेशनल एजुकेशन इन इंडिया', 'द डिप्रेस्ड ग्लासेस' और यात्रा वृत्तांत 'यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका' शामिल हैं।