
Chhattisgarh Education: अगर पहली कक्षा के बच्चे को वही बात उसकी अपनी भाषा में समझाई जाए, जो वह घर में रोज सुनता और बोलता है, तो वह न सिर्फ जल्दी सीखता है, बल्कि पढ़ाई में उसकी रुचि और आत्मविश्वास भी बढ़ता है। छत्तीसगढ़ में सरकारी स्कूलों में लागू किया गया। मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा (Mother Tongue Based Multilingual Education - MTB-MLE) मॉडल इसी सोच पर आधारित है और अब इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। समग्र शिक्षा, एससीईआरटी और लैंग्वेज एंड लर्निंग फाउंडेशन द्वारा किए गए संयुक्त सर्वेक्षण में सामने आया कि प्रदेश के 75 प्रतिशत बच्चों की सीखने की सबसे बड़ी बाधा शिक्षक या किताबें नहीं, बल्कि भाषा का अंतर था।
बच्चे घर में जिस भाषा या बोली में बात करते हैं, स्कूल पहुंचते ही उन्हें सीधे हिंदी में पढ़ाया जाता था। ऐसे में वे विषय समझने से पहले भाषा समझने में ही उलझ जाते थे। परिणामस्वरूप पढ़ाई में रुचि कम होती गई, आत्मविश्वास घटा और सीखने की गति भी प्रभावित हुई। यही वजह है कि राज्य सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा मॉडल को अपनाया, जो अब विशेष रूप से बस्तर और आदिवासी अंचलों में शिक्षा की तस्वीर बदलता नजर आ रहा है।
छत्तीसगढ़ भाषाई विविधता वाला राज्य है। सरकारी सर्वेक्षण में प्रदेश के 29,755 प्राथमिक विद्यालयों के पहली कक्षा के 4.12 लाख से अधिक विद्यार्थियों का अध्ययन किया गया। इसमें 23 स्थानीय भाषाओं और बोलियों की पहचान हुई। सर्वे के अनुसार सबसे अधिक बच्चे छत्तीसगढ़ी (65.83%) बोलते हैं। इसके बाद सरगुजिया (9.38%), हिंदी (5.65%), हल्बी (4.19%) और सादरी (3.97%) प्रमुख भाषाएं हैं।
सीमावर्ती क्षेत्रों में ओड़िया, बंगाली, तेलुगु और मराठी बोलने वाले बच्चे भी पढ़ाई कर रहे हैं। यानी एक ही पाठ्यपुस्तक और एक ही भाषा से पूरे प्रदेश के बच्चों को पढ़ाना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण था। यही कारण था कि बड़ी संख्या में बच्चे शुरुआती कक्षाओं में सीखने में पिछड़ रहे थे।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती वर्षों में बच्चा अपनी मातृभाषा में सबसे बेहतर तरीके से सोचता और सीखता है। लेकिन जब उसे ऐसी भाषा में पढ़ाया जाता है, जिसे वह ठीक से नहीं समझता, तो उसका पूरा ध्यान विषय से हटकर भाषा समझने में लग जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा घर में हल्बी या गोंडी बोलता है और स्कूल में पहली बार हिंदी सुनता है, तो उसे गणित, पर्यावरण या भाषा का पाठ समझने से पहले हिंदी के शब्दों का अर्थ समझना पड़ता है। इससे सीखने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत छत्तीसगढ़ ने बस्तर संभाग में मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षा को बड़े स्तर पर लागू किया है। वर्तमान में 6,937 प्राथमिक विद्यालयों के 2.60 लाख से अधिक छात्र इस मॉडल के तहत पढ़ाई कर रहे हैं। इन्हें पढ़ाने के लिए 7,650 शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। पहली और दूसरी कक्षा के लिए डोरली, हल्बी, भतरी, धुर्वी, माड़िया, छत्तीसगढ़ी और गोंडी के तीन स्वरूपों सहित 9 स्थानीय बोलियों में द्विभाषी पुस्तकें तैयार की गई हैं।
इन पुस्तकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक पृष्ठ पर हिंदी में पाठ दिया गया है, जबकि सामने वाले पृष्ठ पर वही सामग्री स्थानीय भाषा में देवनागरी लिपि में लिखी गई है। इससे दो बड़े फायदे हुए, बच्चे पहले अपनी मातृभाषा में विषय समझते हैं और फिर धीरे-धीरे हिंदी सीखते हैं। स्थानीय शिक्षक भी आसानी से दोनों भाषाओं के माध्यम से पढ़ा पाते हैं। यह मॉडल बच्चों के लिए भाषा परिवर्तन को सहज बना रहा है।
शिक्षकों के अनुसार पहले जो बच्चे हिंदी न समझ पाने के कारण कक्षा में चुप रहते थे, वे अब सवाल पूछ रहे हैं, उत्तर दे रहे हैं और समूह गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं। पहली पीढ़ी के स्कूल जाने वाले कई बच्चों के लिए अब विद्यालय डर या संकोच की जगह नहीं, बल्कि सीखने और अपनी बात कहने का मंच बन गया है। शिक्षकों का कहना है कि मातृभाषा में पढ़ाई शुरू होने के बाद बच्चों की नियमित उपस्थिति, कक्षा में भागीदारी और सीखने की गति में स्पष्ट सुधार देखा गया है।
प्रारंभिक सफलता के बाद राज्य सरकार इस मॉडल का दायरा बढ़ाने की तैयारी में है। अब इसे केवल पहली और दूसरी कक्षा तक सीमित न रखकर तीसरी से पांचवीं कक्षा तक लागू करने की योजना बनाई जा रही है। वर्तमान में प्राथमिक पाठ्यक्रम का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा हल्बी और गोंडी में उपलब्ध कराया जा चुका है, जिससे केवल बस्तर संभाग के 1.29 लाख से अधिक विद्यार्थियों को सीधा लाभ मिल रहा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) में भी शुरुआती कक्षाओं में मातृभाषा या स्थानीय भाषा में शिक्षा देने पर विशेष जोर दिया गया है। नीति का मानना है कि बच्चे अपनी भाषा में बेहतर सोचते, समझते और सीखते हैं। इससे उनकी रचनात्मकता, तार्किक क्षमता और सीखने की गति बेहतर होती है। छत्तीसगढ़ इस दिशा में देश के उन राज्यों में शामिल हो गया है, जिसने इस नीति को व्यवहार में उतारते हुए स्थानीय भाषाओं को शिक्षा से जोड़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल की सफलता के लिए स्थानीय भाषाओं में और अधिक गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री तैयार करनी होगी। साथ ही शिक्षकों को लगातार प्रशिक्षण देना, नई बोलियों को शामिल करना और डिजिटल शिक्षण सामग्री विकसित करना भी आवश्यक होगा। यदि यह मॉडल इसी तरह सफल रहा, तो यह केवल बस्तर ही नहीं बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और देश के अन्य आदिवासी एवं बहुभाषी क्षेत्रों के लिए भी एक प्रभावी शिक्षा मॉडल बन सकता है।