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Muscle Building के लिए जंग: कम वसा वाला Protein या हाई फैट प्रोटीन में कौन सा है आपके लिए सही?

Muscle Building Protein: क्या आपको मसल बिल्डिंग के लिए सही प्रोटीन चुनने में दिक्कत हो रही है? डॉ. मिहिर थानवी और जिम ट्रेनर मनीष चौहान से जानें लीन और हाई फैट प्रोटीन का वैज्ञानिक अंतर। चाहे लक्ष्य वजन घटाना हो या टेस्टोस्टेरोन लेवल बढ़ाना, जानें अपनी बॉडी टाइप के अनुसार बेस्ट डाइट प्लान और सप्लीमेंट का सही इस्तेमाल।

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May 08, 2026

Muscle Building Protein : जब बात मांसपेशियों के निर्माण (Muscle Building ) की आती है, तो जिम की मेहनत सिर्फ 30% काम करती है, बाकी का 70% खेल आपकीकिचन यानी आपकी डाइट का होता है। प्रोटीन इस खेल का "किंग" है, लेकिन फिटनेस की दुनिया में एक पुरानी बहस हमेशा बनी रहती है क्या हमें कम फैट वाला(Lean Protein) लेना चाहिए या अधिक फैट वाला(High Fat Protein )?

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प्रोटीन और मसल बिल्डिंग का Connection

इससे पहले कि हम फैट पर चर्चा करें, यह समझना जरूरी है कि प्रोटीन काम कैसे करता है। जब आप वेट लिफ्टिंग करते हैं, तो आपकी मांसपेशियों के टिश्यू में सूक्ष्म दरारें (Micro-tears) आती हैं। प्रोटीन में मौजूद अमिनो एसिड (Amino Acids) इन दरारों को भरते हैं, जिससे मांसपेशियां पहले से बड़ी और मजबूत बनती हैं। इसे मांसपेशी प्रोटीन संश्लेषण (Muscle Protein Synthesis or MPS) कहा जाता है।

Lean Protein क्या है?

कम वसा वाले प्रोटीन में प्रोटीन की मात्रा अधिक और कैलोरी/सैचुरेटेड फैट की मात्रा बहुत कम होती है। मिसाल के लिए चिकन ब्रेस्ट, अंडे की सफेदी (Egg Whites), छोटी मछली (Fish), टोफू, और व्हे प्रोटीन (Whey Isolate)।

High Fat Protein क्या है?

इसमें प्रोटीन के साथ-साथ वसा की भी मात्रा भी अच्छी मात्रा होती है, जिसके चलते इसकी कुल कैलोरी बढ़ जाती है। इसके लिए आप पूरा अंडा (जर्दी के साथ), रेड मीट (Bacon, Beef), बड़ी मछली, पनीर, और नट्स।

Benefits of Lean Protein : फायदे और नुकसान

फायदे :

  • कैलोरी कंट्रोल : अगर आपवजन घटाते हुए मसल्स बनाना चाहते हैं, तो लीन प्रोटीन बेस्ट है। आप कम कैलोरी में ज्यादा प्रोटीन ले सकते हैं।
  • पाचन तेज (Fast Digestion): लीन प्रोटीन (जैसे व्हे प्रोटीन) जल्दी पचता है, जो वर्कआउट के तुरंत बाद रिकवरी के लिए बेहतरीन है।
  • हृदय स्वास्थ्य : इसमें सैचुरेटेड फैट कम होने के कारण यह कोलेस्ट्रॉल और दिल की सेहत के लिए सुरक्षित माना जाता है।

नुकसान:
हार्मोन का संतुलन (Hormonal Balance
): बहुत ज्यादा लीन डाइट लेने से शरीर में टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) का स्तर गिर सकता है, क्योंकि शरीर को हार्मोन बनाने के लिए कुछ स्वस्थ वसा (Fats) की जरूरत होती है।

Satiety (तृप्ति): यह आपका पेट काफी देर तक भरा हुआ महसूस नहीं कराता जितना फैटी प्रोटीन कराता है।

High Fat Protein के फायदे और नुकसान

फायदे:

  • Testosterone Boost: शोध बताते हैं कि डाइट में हेल्दी फैट्स और कोलेस्ट्रॉल (जो अंडे की जर्दी और रेड मीट में होता है) टेस्टोस्टेरोन के स्तर को बनाए रखने में मदद करते हैं, जो मसल ग्रोथ के लिए मुख्य हार्मोन है।
  • पोषक तत्व घनत्व (Nutrient Density): हाई फैट प्रोटीन स्रोत अक्सर विटामिन A, D, E, और K से भरपूर होते हैं।
  • (ईजी बल्किंग) Easy Bulking: अगर आप "Hard Gainer" हैं (जिनका वजन आसानी से नहीं बढ़ता), तो हाई फैट प्रोटीन आपको जरूरी एक्स्ट्रा कैलोरी आसानी से देता है।

नुकसान:

  • वजन बढ़ना(Fat Gain): कैलोरी ज्यादा होने के कारण, अगर आप सावधानी नहीं बरतते, तो मसल्स के साथ-साथ पेट की चर्बी भी बढ़ सकती है।
  • पाचन प्रक्रिया (Digestion Time): फैट को पचाने में समय लगता है, इसलिए वर्कआउट से ठीक पहले इसे खाने से सुस्ती या पेट में भारीपन महसूस हो सकता है।

आपका चुनाव आपके Fitness Goal पर निर्भर करना चाहिए:

  • यदि आप वजन कम करना और मसल्स दिखाना चाहते हैं (Cutting) : इस लक्ष्य के लिए कम वसा वाले प्रोटीन आपका सबसे अच्छा दोस्त है। आपको अपनी कैलोरी कम रखनी है लेकिन प्रोटीन हाई। ऐसे में चिकन ब्रेस्ट, दालें और व्हे आइसोलेट का चुनाव करें।
  • यदि आप बहुत दुबले हैं और साइज बढ़ाना चाहते हैं (Bulking): यहां उच्च वसा वाले प्रोटीन फायदेमंद है। पूरे अंडे खाएं, पीनट बटर शामिल करें और रेड मीट को डाइट का हिस्सा बनाएं। इससे आपको वह 'Caloric Surplus' मिलेगा जो मसल बिल्डिंग के लिए जरूरी है।
  • सामान्य फिटनेस और मेंटेनेंस : एक बैलेंस बनाकर चलें। दिन के समय लीन प्रोटीन लें और रात के खाने में थोड़ा फैटी प्रोटीन (जैसे पनीर या फैटी फिश) ले सकते हैं ताकि रात भर शरीर को धीमी गति से पोषण मिलता रहे।

क्या है बेस्ट अप्रोच?

मसल बिल्डिंग के लिए कोई एक "परफेक्ट" स्रोत नहीं है। एक स्मार्ट एथलीट दोनों का मिश्रण इस्तेमाल करता है।

  • Post-Workout: लीन प्रोटीन लें (जैसे व्हे प्रोटीन या एग व्हाइट) ताकि रिकवरी जल्दी हो।
  • रात का खाना/स्नैक्स: हाई फैट प्रोटीन लें ताकि हार्मोन संतुलित रहें और शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा मिले।
  • क्वालिटी पर ध्यान दें: हाई फैट का मतलब "जंक फूड" नहीं है। प्रोसेस्ड मीट के बजाय प्राकृतिक स्रोतों जैसे नट्स, बीज और घी/पनीर का चुनाव करें।
  • यदि आपको हाई कोलेस्ट्रॉल या किडनी से जुड़ी कोई समस्या है, तो अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले किसी डॉक्टर या सर्टिफाइड न्यूट्रिशनिस्ट से सलाह जरूर लें।

डॉ. मिहिर थानवी के साथ पत्रिका के सवाल जवाब

लीन प्रोटीन, और हाई फैट प्रोटीन में सिर्फ कैलोरी का ही अंतर है या इनके मेटाबॉलिज्म में भी फर्क होता है?

उन्होंने बताया, मेटाबॉलिज्म की बात करे तो लीन प्रोटीन और हाई फैट प्रोटीन में कैलोरी के अलावा भी बड़ा अंतर होता है। लीन प्रोटीन (जैसे चिकन ब्रेस्ट) का 'थर्मिक इफेक्ट' अधिक होता है, जिसका मतलब है कि इसे पचाने और मेटाबोलाइज करने में शरीर को अधिक ऊर्जा जलानी पड़ती है। यह सीधे मांसपेशियों की मरम्मत (Muscle Synthesis) में तेजी से इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत, हाई फैट प्रोटीन (जैसे पनीर या रेड मीट) का मेटाबॉलिज्म धीमा होता है। इसमें मौजूद वसा पाचन प्रक्रिया को सुस्त कर देती है, जिससे इंसुलिन रिस्पॉन्स कम रहता है और पेट ज्यादा देर तक भरा हुआ महसूस होता है। साथ ही, इसमें मौजूद कोलेस्ट्रॉल टेस्टोस्टेरोन जैसे महत्वपूर्ण हार्मोनों के उत्पादन में मदद करता है, जो मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित रखने के लिए जरूरी हैं।

क्या हाई फैट प्रोटीन का सेवन लंबे समय में शरीर में इन्फ्लेमेशन (Inflammation) या कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है? इसके रिस्क फैक्टर्स क्या हैं?

उन्होंने बताया, लंबे समय तक हाई फैट प्रोटीन का अत्यधिक सेवन, विशेष रूप से रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट के रूप में, शरीर में Inflammation (सूजन) और Bad Cholesterol (LDL) बढ़ा सकता है। इसमें मौजूद सैचुरेटेड फैट धमनियों में प्लाक जमा कर सकते हैं, जिससे हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है.

रिस्क फैक्टर्स:

  • हृदय स्वास्थ्य (Heart Health): कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से स्ट्रोक और हार्ट अटैक का जोखिम.
  • मेटाबॉलिक हेल्थ (Metabolic Health): इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज की संभावना.
  • पाचन तंत्र (Digestion): पाचन तंत्र पर भारी पड़ना और लिवर पर दबाव.

मोटापा (Obesity) या डायबिटीज से जूझ रहे मरीजों के लिए इन दोनों में से किसका चुनाव सुरक्षित है?

उन्होंने बताया, मोटापा (Obesity) या डायबिटीज से जूझ रहे मरीजों के लिए लीन प्रोटीन का चुनाव सबसे सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है। इसमें कैलोरी और सैचुरेटेड फैट कम होते हैं, जिससे वजन घटाने और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है। वहीं, डायबिटीज के मरीजों के लिए लीन प्रोटीन इसलिए जरूरी है क्योंकि यह रक्त शर्करा (Blood Sugar) के स्तर को अचानक नहीं बढ़ाता और इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करता है। जबकि हाई फैट प्रोटीन वजन बढ़ा सकता है और सूजन (Inflammation) पैदा कर सकता है, जो डायबिटीज की जटिलताओं को बढ़ा देता है। सुरक्षित रहने के लिए चिकन ब्रेस्ट, अंडे की सफेदी, मछली और सोया जैसे लीन स्रोतों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

कीटो डाइट (Keto Diet) जैसे ट्रेंड्स में हाई फैट प्रोटीन पर जोर दिया जाता है। एक डॉक्टर के तौर पर आप इसे कितना टिकाऊ (Sustainable) मानते हैं?

उन्होंने बताया, कीटो डाइट जैसे ट्रेंड्स में हाई फैट प्रोटीन का उपयोग शरीर को 'कीटोसिस' अवस्था में लाने के लिए किया जाता है, लेकिन एक डॉक्टर के तौर पर इसे लंबे समय के लिए बहुत टिकाऊ (Sustainable) नहीं माना जा सकता।

इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • पोषक तत्वों की कमी: फल और अनाज पूरी तरह बंद होने से फाइबर और जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।
  • हृदय और लिवर पर दबाव: लंबे समय तक अत्यधिक वसा का सेवन कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है और फैटी लिवर का जोखिम पैदा करता है।
  • सामाजिक और व्यावहारिक चुनौतियां : इसे हर दिन फॉलो करना मुश्किल है, जिससे लोग अक्सर इसे बीच में छोड़ देते हैं, जिससे 'यो-यो इफेक्ट' (वजन का बार-बार घटना-बढ़ना) होता है।

क्या शाकाहारी लोग सिर्फ लीन प्रोटीन (दालें/सोया) के भरोसे उतनी ही अच्छी बॉडी बना सकते हैं जितनी मांसाहारी लोग?

उन्होंने बताया, शाकाहारी लोग सिर्फ लीन प्रोटीन के भरोसे भी मांसाहारी लोगों जितनी ही अच्छी बॉडी बना सकते हैं। शाकाहारी स्रोतों में सोया एक 'पूर्ण प्रोटीन' है जिसमें सभी आवश्यक अमीनो एसिड होते हैं। अन्य स्रोतों जैसे दाल और अनाज को मिलाकर (जैसे खिचड़ी) एक पूर्ण अमीनो एसिड प्रोफाइल प्राप्त की जा सकती है। मुख्य अंतर केवल पाचन और मात्रा का होता है, शाकाहारियों को अपने अमीनो एसिड की पूर्ति के लिए विविधता और सही फूड कॉम्बिनेशन पर अधिक ध्यान देना पड़ता है। यदि कैलोरी और प्रोटीन की दैनिक जरूरत पूरी हो, तो परिणाम बिल्कुल समान हो सकते हैं।

पत्रिका के सवाल जवाब जिम ट्रेनर मनीष चौहान के साथ

बॉडी टाइप के हिसाब से लीन प्रोटीन पर ज्यादा फोकस करना चाहिए या उच्च वसा वाले प्रोटीन पर? क्या आप दोनों डाइट को बैलेंस बना सकते हैं?

पत्रिका से बात करते हुए उन्होंने बताया, बॉडी टाइप के हिसाब से प्रोटीन का चुनाव आपके फिटनेस लक्ष्यों पर निर्भर करता है। यदि आपका लक्ष्य वजन कम करना या लीन मसल्स बनाना है, तो आपको लीन प्रोटीन (जैसे नॉन वेज) पर अधिक ध्यान देना चाहिए, क्योंकि इसमें कैलोरी कम और प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। वहीं, यदि आप बहुत दुबले पतले हैं और वजन बढ़ाना चाहते हैं, तो उच्च वसा वाले प्रोटीन (जैसे पूरे अंडे, पनीर) फायदेमंद है क्योंकि यह एक्स्ट्रा कैलोरी और हार्मोनल सपोर्ट प्रदान करता है। दोनों के बीच संतुलन बनाना ही सबसे अच्छा तरीका है। आप वर्कआउट के बाद जल्दी रिकवरी के लिए लीन प्रोटीन ले सकते हैं और रात के भोजन में हार्मोनल संतुलन के लिए हेल्दी फैट युक्त प्रोटीन चुन सकते हैं।

कैलोरी का बड़ा हिस्सा होल फूड्स (Whole Foods) से लेना चाहिए या आप सप्लीमेंट लेने की सलाह देंगे?

उन्होंने बताया, कैलोरी और पोषण का मुख्य हिस्सा हमेशा होल फूड्स (Whole Foods) जैसे दाल, अंडे, पनीर, चिकन और अनाज से ही आना चाहिए। प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में प्रोटीन के साथ-साथ विटामिन, मिनरल्स और फाइबर होते हैं, जो शरीर के बेहतर मेटाबॉलिज्म के लिए जरूरी हैं। सप्लीमेंट केवल एक सुविधा (Convenience) है। यदि आप भागदौड़ भरी जिंदगी या वर्कआउट के तुरंत बाद प्राकृतिक भोजन नहीं ले पा रहे हैं, तब व्हे प्रोटीन जैसा सप्लीमेंट लेना फायदेमंद होता है क्योंकि यह जल्दी पचता है। आपकी डाइट का 70-80% हिस्सा प्राकृतिक भोजन होना चाहिए और केवल 20-30% जरूरत ही सप्लीमेंट से पूरी करनी चाहिए।

क्या सैचुरेटेड फैट वाले प्रोटीन स्रोत (जैसे पनीर या मीट) हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ाते हैं? लीन प्रोटीन हार्ट-फ्रेंडली क्यों माना जाता है?
उन्होंने बताया, सैचुरेटेड फैट वाले प्रोटीन स्रोत जैसे पनीर या फैटी मीट का अधिक सेवन हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ा सकते है। इनमें मौजूद सैचुरेटेड फैट रक्त में LDL (Bad Cholesterol) के स्तर को बढ़ाता है, जिससे धमनियों में रुकावट (Plaque) पैदा हो सकती है। इसके विपरीत, लीन प्रोटीन हार्ट-फ्रेंडली माने जाते हैं क्योंकि इनमें वसा की मात्रा बहुत कम होती है। मछली जैसे स्रोतों में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है, जो सूजन कम करने और दिल की धड़कन को नियंत्रित रखने में सहायक है। हृदय स्वास्थ्य के लिए अक्सर पशु-आधारित फैटी प्रोटीन के बजाय लीन प्रोटीन को लेना ही सही है।

वर्कआउट के कितनी देर बाद मुझे प्रोटीन लेना चाहिए? क्या इस समय व्हे प्रोटीन आइसोलेट लेना जरूरी है या मैं अंडे की सफेदी (Egg Whites) से भी काम चला सकता है?

उन्होंने बताया, वर्कआउट के बाद 30 से 45 मिनट के भीतर प्रोटीन लेना सबसे प्रभावी माना जाता है, जिसे 'एनाबॉलिक विंडो' कहा जाता है. इस समय मांसपेशियों को रिकवरी के लिए तुरंत पोषण की जरूरत होती है। व्हे प्रोटीन आइसोलेट लेना अनिवार्य नहीं है, लेकिन यह बहुत जल्दी पचता है, जो वर्कआउट के तुरंत बाद फायदेमंद है। यदि आप सप्लीमेंट नहीं लेना चाहते, तो अंडे की सफेदी (Egg Whites) एक बेहतरीन प्राकृतिक विकल्प है। अंडे की सफेदी भी लीन प्रोटीन का शुद्ध स्रोत है और शरीर इसे आसानी से सोख लेता है। असल बात यह है कि आपकी मांसपेशियों को समय पर अमीनो एसिड मिल जाए।

क्या प्रोटीन के साथ-साथ आप 'हेल्दी फैट्स' के सोर्स भी सजेस्ट करेंगे ताकि टेस्टोस्टेरोन लेवल पर बुरा असर न पड़े?

उन्होंने बताया, टेस्टोस्टेरोन लेवल को बनाए रखने के लिए प्रोटीन के साथ हेल्दी फैट्स का होना अनिवार्य है, क्योंकि फैट्स ही हार्मोन उत्पादन के मुख्य आधार होते हैं। स्वस्थ वसा के लिए आप अपनी डाइट में बादाम, अखरोट, अलसी के बीज (Flax seeds), चिया सीड्स और कद्दू के बीज शामिल कर सकते हैं। भोजन में एवोकाडो, जैतून का तेल (Olive oil) और घी का सीमित उपयोग भी बहुत फायदेमंद है। मांसाहारी विकल्पों में सैल्मन मछली और अंडे की जर्दी ओमेगा-3 और विटामिन-D के बेहतरीन स्रोत हैं, जो सीधे तौर पर टेस्टोस्टेरोन बढ़ाने में मदद करते हैं। याद रखें, बहुत ज्यादा 'लो-फैट' डाइट हार्मोनल असंतुलन पैदा कर सकता है, इसलिए संतुलित मात्रा में वसा जरूर लें।

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