
Loneliness in childhood to youth:''अक्सर रात के 12 बजे के बाद भी मुझे मोबाइल स्क्रीन छोड़ने का मन नहीं करता। मेरे यू ट्यूब चैनल पर 3 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। मैं कई व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ी हूं। मेरे कई फ्रेंड्स हैं। लेकिन जब कभी उदास होती हूं और मन भारी होता है, तो मुझे मेरे आसपास या ऑनलाइन कोई ऐसा नहीं दिखता जिससे मैं खुलकर दो बातें कर सकूं। पूरी ईमानदारी से खुद को एक्सप्रेस कर सकूं, ऐसा कोई इंसान मेरी लाइफ में नहीं है।''
यह कहानी अकेली शैलजा द्रविड़ (बदला हुआ नाम) की नहीं है। बल्कि एक ऐसे दौर की है जहां लोग टेक्नोलॉजी से जुड़े हैं, लेकिन भावनात्म रूप से अकेलापन महसूस कर रहे हैं। वहीं कुछ एकाकी जीवन जीना पसंद करने लगे हैं। दुनियाभर के किशोरों और युवाओं में बढ़ता अकेलापन और एकाकीपन की आदत को वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने भविष्य का बड़ा संकट कहा है। ग्लोबल स्तर पर WHO की चिंता का यह ट्रेंड अब भारत में भी तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है। यहां भी लोग खुद पर फोकस्ड हो रहे हैं और एकाकीपन के आदी भी हो रहे हैं। मनोचिकित्सकों ने माना है कि डिजिटल होती सोशल मीडिया की दुनिया के साथ भारतीय किशोरों और युवाओं में भावनात्मक अकेलेपन से ज्यादा एकाकीपन की आदत के मामले सामने आ रहे हैं। गंभीर सवाल क्या भारत में बचपन (Loneliness in childhood) से हो रही है अकेलेपन की शुरुआत…? patrika.com पर पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…
भोपाल के मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. नरेंद्र सिंह राजपूत बताते हैं, अकलेपन का मतलब केवल अकेले रहने से नहीं है, बल्कि परिवार, दोस्त और सहकर्मियों के बीच रहकर भी भावनात्मक रूप से खुद को अकेला महसूस करना है अकेलापन। डिजिटल दौर में ऑनलाइन बातचीत करने की आदत डेवलप होने का अर्थ रियल रिलेशन्स की जगह बदल गई है, और जब व्यक्ति इतने लोगों के बीच भी अपनी भावनाएं या बातें शेयर करने में किसी के साथ भी कंफर्ट या भरोसा महसूस नहीं कर पाता, तब यह स्थिति डिजिटल अकेलापन कही जा सकती है।
डॉ. नरेंद्र बताते हैं कि आज युवाओं का सबसे ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बीतता है। दूसरों की लाइफ देखते और लाइक करते हैं, कमेंट करते हैं, लेकिन अक्सर खुद को, खुद की भावनाओं को एक्सप्रेस नहीं कर पाते। इसीलिए वे भीड़ में अकेला महसूस करने लगते हैं।
WHO की रिपोर्ट के मुताबिक 13-29 साल की आयु के किशोर और युवाओं में अकेलेपन की दर सबसे ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक इनका एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो सामाजिक जुड़ाव की कमी महसूस करता है। ये स्थिति तब है जब टेक्नोलॉजी का दौर है और सोशल मीडिया से आप सीधे अपनों के, दोस्तों के करीब हैं।
इस मामले पर डॉ. नरेंद्र सिंह राजपूत कहते हैं कि दूसरों की परफेक्ट जिंदगी देखकर तुलना करने की आदत बढ़ती है। किशोरों और युवाओं में खुद को लेकर हीन भावना आने लगती है, वे खुद को हर स्तर पर कम आंकने लगते हैं। इससे अकेलापन तो महसूस होता ही है, इसके साथ ही तनाव भी बढ़ता है।
दरअसल भारत में विकास की तस्वीर बताती है कि शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय डिजिटल युग के बड़े बदलाव के बीच जी रहे हैं। पढ़ाई के लिए, नौकरी करने लाखों की तादाद में युवा अपना घर छोड़ शहरों में बस रहे हैं। नई जगह, नया माहौल और काम के 9-10 घंटे उनका सामाजिक जुड़ाव खत्म कर रहे हैं। वे एकाकी जीवन जीने को मजबूर हैं।
दूसरी ओर यहां संयुक्त परिवारों की जगह अब एकल पारिवारिक व्यवस्था ने ले ली है। आस-पड़ौस अब कहने भर को रह गए हैं। मिलने-जुलने की संस्कृति खत्म हो रही है। ऑनलाइन रिश्ते-दोस्ती निभाने के लिए, अपनों के साथ बातचीत के लिए टीन एज से लेकर युवा तक अब डिजिटल दुनिया में रहने लगे हैं। ऐसे में भारत के लिए यह मुद्दा काफी अहम है और युवाओं की शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है। क्योंकि डिजिटल दुनिया के बीच भावनात्मकता खत्म हो रही है।
वहीं जहां बच्चे छोटे हैं और बचपन के दौर से गुजर रहे हैं, उनके हाथों में मोबाइल है, लेकिन माता-पिता का समय नहीं, वे स्कूल जा रहे हैं, लेकिन पढ़ाई पर फोकस कम और दोस्ती भी नहीं। मोबाइल की लत ऐसी पड़ी कि बचपन अब घर से बाहर निकलने से संकोच कर रहा है।
साइकेट्रिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं हाल के वर्षों में AI और चैटबॉट्स दोस्तों और नाते-रिश्तेदारों से बातचीत का जरिया बन गए हैं। ये तकनीकें आपको उनके स्पर्श, फीलिंग्स, अपनापन और मानवीय समझ नहीं दे रहीं। वहीं डिजिटल रिश्ते अस्थायी हैं, ये मानवीय संबंधों का विकल्प कतई नहीं हो सकता। खास तौर पर बचपन बर्बाद हो रहा है। स्क्रीन टाइम एडिक्शन उसे इमोशन से दूर कर रहा है और वह मानसिक, शारीरिक रूप के साथ ही भावनात्मक रूप से भी प्रभावित हो रहा है।
डिजिटल दुनिया के साथ ही बच्चों में बढ़ते अकेलेपन को लेकर WHO की यह रिपोर्ट भी बताती है कि दुनियाभर के बच्चों में अकेलापन बढ़ा है। कहीं न कहीं युवा अवस्था का ये अकेलापन इसका भी नतीजा है। WHO ने ऐसे कई कारक बताए हैं, जो बताते हैं कैसे बदल रही है बच्चों की दुनिया?
WHO के मुताबिक जो बच्चे बचपन में समाज से अलग-थलग होने या फिर किसी भी तरह से अकेलापन महसूस करते हैं, उनमें भविष्य में अकेलापन महसूस करने की संभावना सामान्य लोगों से बहुत ज्यादा रहती है।
-शारीरिक या मानसिक व्यवहार
WHO की रिपोर्ट के मुताबिक वयस्क जीवन में दिखाई देने वाली लगभग 48.4% मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं 18 साल की उम्र से पहले ही शुरू हो जाती हैं। यानी अकेलेपन का संबंध सीधे व्यक्ति के बचपन से ही जुड़ा है।
इस रिपोर्ट में बुलिंग को भी अकेलेपन का कारण माना गया है। जिस बच्चे को बुलिंग का सामना करना पड़ता है, वह अकेला पड़ने लगता है। जो बच्चा पहले से अकेला है, उसे कमजोर समझकर उसके साथ बुलिंग की जाती है। बुलिंग से बचने के लिए बच्चा लोगों से दूर होने लगता है और सामाजिक अलगाव बढ़ जाता है।
ये रिपोर्ट चेतावनी दे रही हैं कि भारत में बच्चों के पास डिजिटल कनेक्शन तो मजबूत हुए हैं, लेकिन सामाजिक जुड़ाव तेजी से कम हो रहा है, वे मानसिक और भावनात्मक रूप से कमजोर हो रहे हैं। उनमें पारिवारिक जुड़ाव कम होता जा रहा है। यह भविष्य के अकेलेपन के बड़ा जोखिम का बड़ा कारक है।
-डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, मनोरोग चिकित्सक और मनोवैज्ञानिक
डॉ. त्रिवेदी बताते हैं कि यह केवल Loneliness नहीं है, बल्कि मैं इसे 'Digital Relational Deprivation'कहूंगा। यानी ऐसी स्थिति कि जब व्यक्ति के पास डिजिटल संपर्क तो लगातार बना हुआ है, लेकिन भावनात्मक संबंधों का अभाव है। सोशल मीडिया हमारे मस्तिष्क को लगातार नवीनता, मान्यता और त्वरित उत्तेजना देता रहता है। लेकिन धीरे-धीरे रियल कंवर्सेशन जिसमें धैर्य, असहमति, मौन और भावनात्मक निवेश की आवश्यकता होती है, मस्तिष्क को वो कम अट्रैक्ट करने लगती है। इसका नतीजा ये होता है कि हजारों लोगों के साथ भी वह खुद को अकेला पाता है और अकेला महसूस करने लगता है।
डॉ. त्रिवेदी इसे डिजिटल लोनलीनेस से ज्यादा एक Emotional Malnutrition के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि जिस तरह शरीर को केव कैलोरी नहीं बल्कि संतुलित पोषण की जरूरत होती है, वैसे ही मस्तिष्क को मानवीय संबंधों की आवश्यकता होती है। जबकि लाइक, कमेंट, रील या चैट ये संबंध नहीं बन सकती।
वे बताते हैं कि किशोरों और युवाओं में इसका प्रभाव अकेले मानसिक सेहत पर नहीं है। रात में देर तक मोबाइल या टैब का यूज करने से बॉडी की सर्केडियन रिद्म बिगड़ जाती है, नींद की गुणवत्ता खराब होती है, फोकस करने में समस्या आती है। चिड़चिड़ापन, चिंता, सामाजिक भय और तनाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इसके साथ ही शारीरिक स्तर पर मोटापा, इंसुलिन रेजिडेंस, गर्दन, रीढ़ में समस्याएं, आंखों में तनाव और शारीरिक निष्क्रियता बढ़ती है।
इस खतरनाक समस्या के समाधान का उपाय बताते हुए मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स और साइकेट्रिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं कि केवल स्क्रीन टाइम कम करने की बात इतनी अहम नहीं है, जितना जरूरी इस समस्या को खत्म करने में सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देना है। इसलिए-
WHO की रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों के एक दो भरोसेमंद दोस्त होना बेहद जरूरी है। ऐसे में दोस्ती इस अकेलेपन को आने ही नहीं देती। ऐसे दोस्त भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। अपनापन बना रहता है।
किशोरावस्था में बच्चे अपनी पहचान तलाशते हैं, वह समझना चाहते हैं कि वे कौन हैं?, मुझे क्या बनना है? लोग उसे कैसे देखते हैं? ये ऐसी उम्र होती है, जब किशोर यदि भ्रम और संघर्ष की स्थिति में आ जाए, तो इनमें अकेलापन बढ़ जाता है। जबकि कॉन्फिडेंस और स्पष्ट पहचान से बच्चा सुरक्षित महसूस करता है।
WHO के मुताबिक जिन बच्चों का अपने माता-पिता से जुड़ाव मजबूत होता है, ऐसे बच्चे मानसिक रूप से मजबूत होते हैं। उनके जीवन में अकेलेपन (Loneliness in childhood in India) का खतरा बेहद कम होता है। लेकिन जब पेरेंट्स बच्चों को लगातार डांटते हैं, भावनात्मक दूरी बनाए रखते हैं और उनकी उपेक्षा करने या फिर जबरन कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं, तब बच्चे मानसिक रूप से और भावनात्मक रूप से कमजोर हो सकते हैं।
जबकि माता-पिता का बच्चों से संवाद, सहयोग, भावनात्मक समर्थन दें और सबसे बड़ी चीज उन्हें समय दें तो वे सुरक्षा महसूस करते हैं।
WHO की रिपोर्ट के मुताबिक एक पिता और बेटी के बीच मजबूत बॉन्डिंग लड़कियों को अकेलेपन से बचाने में सबसे कारगर है। इसके पीछे भावनात्मक सुरक्षा, आत्मविश्वास, सामाजिक कौशल का विकास जैसे कारण हैं, जो उसे पिता से मिलते हैं।
जिन परिवारों में प्यार जताया जाता है, भावनाएं व्यक्त की जाती हैं, बच्चों की बात को ध्यानपूर्वक सुना जाता है, ऐसे परिवारों के बच्चों में अकेलेपन का जोखिम कम पाया गया।
WHO की रिपोर्ट में देश के 79 स्टूडेंट्स पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि स्कूल का माहौल भी बच्चे के अकेलापन महसूस करने या न करने में बड़ी भूमिका निभाता है। यदि स्कूल में बुलिंग हो, सहयोग की उम्मीद पर सहयोग न मिले, टीचर्स संवेदनशील न हों और दोस्त न बनें, तो भविष्य में ऐसे बच्चों को अकेलापन महसूस हो सकता है। इसके विपरीत स्कूल में सहयोगी और सुरक्षित माहौल अकेलेपन से बचाता है।