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Half Moon on Nails: क्या सच में दिल और किडनी की बीमारी बताता है ‘आधा चांद’? नाखून के रंग से पहचानें

Half Moon on Nails: नाखूनों पर बना 'आधा चांद' (ल्यूनुला) क्या सच में किडनी और दिल की बीमारी का संकेत है? जानिए डॉक्टर से 'हाफ एंड हाफ नेल्स' के बारे में और समझिए इस बीमारी के शुरुआती संकेत।
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Jul 25, 2026
Kidney Heart Half moon nails Lipid Profile
क्या सच में दिल-किडनी का हाल बताता है 'ल्यूनुला'? (Photo: AI generated)

Half Moon on Nails : अक्सर हम अपने नाखूनों को या तो खूबसूरती के पैमाने से देखते हैं या फिर इनकी सफाई पर ध्यान देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि आपकी उंगलियों के नाखूनों के निचले हिस्से पर एक सफेद रंग का आधा चांद (Half Moon) जैसा आकार बना होता है? इसे मेडिकल साइंस में 'ल्यूनुला' (Lunula) कहा जाता है। लैटिन भाषा में 'ल्यूनुला' का अर्थ होता है 'छोटा चंद्रमा'। यह कोई साधारण निशान नहीं है, बल्कि आपके नाखून की मैट्रिक्स का वह दृश्य हिस्सा है जहां से नए नाखून बनते हैं। आमतौर पर अंगूठे पर यह सबसे साफ और बड़ा दिखाई देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह छोटा सा 'आधा चांद' आपकी सेहत का एक बड़ा रिपोर्ट कार्ड भी हो सकता है?

आयुर्वेद से लेकर आधुनिक एलोपैथी तक, नाखूनों के रंग और इस 'ल्यूनुला' के आकार को शरीर के अंदरूनी अंगों, विशेषकर हार्ट (दिल) और किडनी (गुर्दे) की कार्यप्रणाली का दर्पण माना गया है। आइए जानते हैं कि यह सफेद चांद कब सामान्य होता है और कब किसी बड़े 'हेल्थ अलर्ट' का संकेत बनता है।

क्या है ल्यूनुला का सामान्य रूप?

एक स्वस्थ व्यक्ति में ल्यूनुला का रंग हल्का सफेद या दूधिया होता है और यह नाखून के निचले हिस्से के लगभग पांचवें (1/5) भाग को कवर करता है। इसका हर उंगली पर होना जरूरी नहीं है अंगूठे पर यह सबसे प्रमुख होता है, जबकि छोटी उंगली (Pinky Finger) पर यह कई बार बहुत छोटा होता है या दिखाई भी नहीं देता। अगर आपके नाखूनों पर यह सफेद रंग का दिख रहा है और इसका आकार स्थिर है, तो आपको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।

जब 'आधा चांद' बने हेल्थ अलर्ट: रंग बदलने के मायने

नाखून का यह हिस्सा आपकी रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) के ठीक ऊपर होता है। इसलिए शरीर में ऑक्सीजन के स्तर, रक्त संचार और अंगों की स्थिति में बदलाव आते ही ल्यूनुला का रंग बदलने लगता है।

लाल या नीला ल्यूनुला: दिल (Heart) की बीमारी का संकेत

  • नीला ल्यूनुला (Cyanosis): यदि आपके नाखूनों पर बना यह आधा चांद हल्का नीला दिखाई देने लगे, तो इसे नजरअंदाज न करें। यह इस बात का संकेत है कि आपके शरीर में ऑक्सीजन युक्त रक्त का प्रवाह ठीक से नहीं हो रहा है। दिल की विफलता (Heart Failure) या फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों में रक्त में ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है, जिससे यह हिस्सा नीला दिखने लगता है। इसे 'विल्सन रोग' (Wilson's Disease) से भी जोड़ा जाता है।
  • लाल ल्यूनुला: यदि ल्यूनुला का रंग अचानक गहरा लाल या गुलाबी-लाल होने लगे, तो यह कार्डियोवैस्कुलर (हृदय) प्रणाली पर अत्यधिक दबाव या हार्ट फेलियर का शुरुआती संकेत हो सकता है।

आधा सफेद और आधा भूरा/लाल: किडनी (Kidney) रोग का खतरा

किडनी की गंभीर समस्या या क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) से पीड़ित मरीजों में नाखूनों की स्थिति बहुत खास तरीके से बदलती है। इसे डॉक्टरी भाषा में 'हाफ एंड हाफ नेल्स' (Half and Half Nails) या 'लिंडसे नेल्स' (Lindsay's Nails) कहा जाता है। इसमें ल्यूनुला वाला निचला हिस्सा पूरी तरह से सफेद हो जाता है, जबकि नाखून का ऊपरी हिस्सा भूरा, गुलाबी या लाल हो जाता है। ऐसा तब होता है जब किडनी ठीक से काम नहीं करती और शरीर में टॉक्सिन्स (विषाक्त पदार्थ) जमा होने लगते हैं, जिससे नाखूनों की रक्त वाहिकाएं प्रभावित होती हैं।

डॉ. जितेंद्र गोस्वामी के साथ पत्रिका की बातचीत

किडनी की बीमारी को अक्सर 'साइलेंट किलर' कहा जाता है। नाखूनों पर बनने वाला आधा चांद (ल्यूनुला) जब आधा सफेद और आधा भूरा/लाल होने लगता है (Lindsay's Nails), तो यह किडनी की किस स्टेज या स्थिति की तरफ इशारा करता है?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि किडनी की बीमारी को 'साइलेंट किलर' क्यों कहते हैं। दरअसल, कई बार हमारी दोनों किडनियां 80 से 90% तक खराब हो जाती हैं, फिर भी मरीज को किसी तरह का कोई स्पष्ट लक्षण या तकलीफ महसूस नहीं होती। यही वजह है कि इसे साइलेंट किलर माना जाता है। रही बात नाखूनों के आधे चांद यानी आधे सफेद और आधे भूरे/लाल दिखने की, तो इसे डॉक्टरी भाषा में 'लिंडसे नेल्स' (Lindsay's Nails) या 'हाफ एंड हाफ नेल्स' कहा जाता है। इसमें नाखून का निचला हिस्सा सफेद और ऊपरी हिस्सा लाल या भूरा दिखाई देता है। अक्सर यह बदलाव क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) की एडवांस स्टेज जैसे स्टेज 4 या 5 में देखने को मिलता है। हालांकि, केवल नाखून देखकर ही किडनी की बीमारी का सटीक निदान (Diagnosis) नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे लक्षण लिवर की पुरानी बीमारियों (Chronic Liver Disease) या गंभीर कुपोषण (Malnutrition) के कारण भी हो सकते हैं। इसलिए, यदि किसी के नाखूनों में इस तरह के बदलाव दिखते हैं, तो उन्हें तुरंत आगे के जरूरी मेडिकल टेस्ट करवाकर सही स्थिति का पता लगाना चाहिए।

नाखूनों के अलावा, चेहरे या पैरों की सूजन और पेशाब के रंग/झाग में बदलाव जैसे शुरुआती लक्षणों को लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। शरीर में किडनी खराब होने के पहले 5 सबसे बड़े अलार्मिंग संकेत क्या हैं?

किडनी खराब होने के लक्षण बहुत ज्यादा विशिष्ट (Specific) नहीं होते। बीमारी बढ़ने पर अलग-अलग मरीजों में तरह-तरह के लक्षण देखने को मिल सकते हैं। फिर भी 5 ऐसे मुख्य संकेत हैं, जिनके बारे में सामान्य जनता और मरीजों को जागरूक होना चाहिए:

  • चेहरे और पैरों पर सूजन: सुबह उठने पर आंखों के आसपास या चेहरे पर सूजन आना, और शाम/रात होते-होते पैरों और टखनों (Ankles) में सूजन बढ़ जाना यह किडनी में खराबी का एक बड़ा संकेत हो सकता है।
  • पेशाब से जुड़ी समस्याएं: पेशाब में बहुत ज्यादा झाग बनना, पेशाब की मात्रा कम होना, रात में बार-बार पेशाब आना या पेशाब के साथ खून आना।
  • लगातार थकान और कमजोरी: शरीर में टॉक्सिक (विषाक्त) पदार्थ जमा होने और खून की कमी (एनीमिया) के कारण मरीज बिना ज्यादा काम किए भी लगातार थकान और कमजोरी महसूस करता है।
  • पाचन संबंधी समस्याएं: भूख कम लगना, जी मिचलाना (Nausea), उल्टी होना और मुंह का स्वाद लगातार खराब या कड़वा रहना।
  • अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर: यदि किसी का ब्लड प्रेशर दवाओं के बावजूद नियंत्रित नहीं हो रहा है और साथ में ऊपर बताए गए लक्षण भी दिख रहे हैं, तो यह किडनी की समस्या का एक बहुत बड़ा इंडिकेटर है।

अक्सर लोग सिर्फ 'क्रिएटिनिन' (Creatinine) का स्तर देखकर घबरा जाते हैं या बेफिक्र हो जाते हैं। किडनी की असली सेहत जानने के लिए क्रिएटिनिन के अलावा KFT (Kidney Function Test) में कौन से पैरामीटर्स देखने चाहिए?

वैसे तो क्रिएटिनिन किडनी की सेहत का एक बेहद महत्वपूर्ण इंडिकेटर है और इससे काफी हद तक यह पता चल जाता है कि किडनी सही काम कर रही है या नहीं। लेकिन सिर्फ क्रिएटिनिन ही काफी नहीं है। अगर इसके साथ कुछ अन्य टेस्ट भी मिला दिए जाएं, तो किडनी की पूरी और सटीक तस्वीर साफ हो जाती है:

  • EGFR (एस्टिमेटेड ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट): यह क्रिएटिनिन के आधार पर ही निकाला जाता है। इससे यह पता चलता है कि आपकी किडनियां कितने प्रतिशत क्षमता के साथ खून को फिल्टर कर रही हैं।
  • यूरिन में प्रोटीन का रिसाव (Protein Leak): पेशाब में एल्ब्यूमिन या यूरिन एल्ब्यूमिन-क्रिएटिनिन रेशियो (UACR) की जांच करना बेहद जरूरी है। यह यूरिन का एक साधारण टेस्ट है, जो किडनी डैमेज का शुरुआती स्टेज में ही पता लगा लेता है।
  • ब्लड यूरिया (Blood Urea): यह भी किडनी फंक्शन को जांचने का एक मुख्य पैरामीटर है।
  • इलेक्ट्रोलाइट्स (Electrolytes): शरीर में सोडियम, पोटेशियम और बाइकार्बोनेट का संतुलन देखना जरूरी होता है, क्योंकि किडनी खराब होने पर इनका संतुलन बिगड़ जाता है। संक्षेप में कहें तो, सिर्फ क्रिएटिनिन देखने के बजाय अगर इन सभी पैरामीटर्स को एक साथ देखा जाए, तो किडनी की ओवरऑल सेहत का सही और सटीक आकलन किया जा सकता है।

डॉ. आरिफ खान के साथ पत्रिका की बातचीत

कहा जाता है कि ल्यूनुला का रंग नीला या लाल होना दिल की बीमारी से जुड़ा हो सकता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, दिल की गड़बड़ी का असर नाखूनों के इस हिस्से पर कैसे पड़ता है?

ल्यूनुला (Lunula) हमारे नाखून के निचले हिस्से में स्थित अर्धचंद्र (Crescent Shape) के आकार का वह भाग होता है जहां से नेल बेड की शुरुआत होती है। इसे हम अपने अधिकांश नाखूनों में आसानी से देख सकते हैं। कई बार इसका रंग नीला या लाल दिखता है, तो कुछ लोगों में यह अनुपस्थित (Absent) भी हो सकता है। लेकिन सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ल्यूनुला में बदलाव होना अपने आप में दिल की बीमारी का कोई 100% सटीक या विशिष्ट डायग्नोस्टिक टेस्ट (Diagnostic Tool) नहीं है।

  • नीला या लाल ल्यूनुला: यदि ल्यूनुला का रंग नीला पड़ता है, तो यह मुख्य रूप से शरीर में ऑक्सीजन की कमी की ओर इशारा करता है। वहीं, इसका रंग लाल होना कार्डियक (हृदय) समस्याओं से जुड़ा हो सकता है, लेकिन केवल इसे देखकर बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती।
  • बच्चों में जन्मजात हृदय रोग: जब बच्चों में दिल में छेद जैसी जन्मजात समस्या (Congenital Heart Disease) हो या फेफड़ों की रक्त नलिकाओं में रुकावट हो, तो शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में ऑक्सीजन की कमी का असर नाखूनों पर स्पष्ट दिखाई देने लगता है।
  • क्लबिंग (Clubbing) और नाखूनों का नीला होना: गंभीर मामलों में केवल ल्यूनुला ही नहीं, बल्कि पूरा नाखून ही नीला पड़ने लगता है। इसके साथ ही 'नेल्स क्लबिंग' की स्थिति बन जाती है, जिसमें नाखून और नेल बेड के बीच का प्राकृतिक कोण (Angle) खत्म या ऑब्लिटरेट (Obliterate) हो जाता है।

कई बार लोग नाखूनों पर ल्यूनुला न दिखने (Disappearing Lunula) पर घबरा जाते हैं या इसे सीधे तौर पर किसी गंभीर बीमारी से जोड़ लेते हैं। इसमें कितनी सच्चाई है और क्या यह बिना किसी बीमारी के भी गायब हो सकता है?

नाखूनों से 'ल्यूनुला' (आधे चांद) के गायब होने या न दिखने को सीधे तौर पर किसी बीमारी से जोड़ना पूरी तरह से एक भ्रांति (मिथक) है। कई लोगों के नाखूनों में स्वाभाविक रूप से ल्यूनुला अनुपस्थित (Absent) होता है या बहुत छोटा होता है, और यह पूरी तरह से सामान्य (Normally Expected) है। इसमें बिल्कुल भी सच्चाई नहीं है कि यह किसी बीमारी का निश्चित पैरामीटर है। यह कोई मेडिकल डायग्नोस्टिक टूल नहीं है जिसके आधार पर किसी बीमारी की पुष्टि की जा सके। यदि किसी बीमारी का पता लगाना हो, तो उससे संबंधित जरूरी डॉक्टरी जांचें (Medical Tests) करानी पड़ती हैं। केवल नाखूनों में ल्यूनुला न दिखने के आधार पर यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति को कोई गंभीर बीमारी है या नहीं।

क्या अंग-संबंधी बीमारियों (जैसे दिल-किडनी) के अलावा शरीर में विटामिन्स, आयरन (एनीमिया) या थायराइड जैसी समस्याओं का असर भी इस आधे चांद पर पड़ता है?

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि दिल या किडनी की बीमारी, विटामिन्स की कमी, एनीमिया (खून की कमी) या थायराइड की समस्या होने पर हर बार ल्यूनुला गायब ही हो जाएगा या उसका रंग बदल ही जाएगा। जैसा कि पहले भी बताया गया है, ल्यूनुला का न दिखना या अनुपस्थित होना किसी बीमारी का सीधा या अनिवार्य लक्षण नहीं है। हालांकि, जब किसी मरीज को संबंधित बीमारी होती है और हम जांच करते हैं, तो कई बार ल्यूनुला अनुपस्थित या बदला हुआ मिल सकता है। इसलिए, इसे कोई प्राथमिक 'डायग्नोस्टिक टूल' (निदान का साधन) नहीं माना जा सकता, लेकिन यह बीमारी से जुड़ा एक एसोसिएटेड साइन (संबद्ध लक्षण) जरूर हो सकता है।

उदाहरण के तौर पर:

  • सांस और दिल के मरीज: जिन मरीजों को सांस लेने में गंभीर तकलीफ होती है, या ऐसे बच्चे जिन्हें जन्मजात हृदय रोग (जैसे दिल में छेद) होता है, उनमें ऑक्सीजन की कमी के कारण ल्यूनुला का रंग नीला पड़ सकता है।
  • नेल्स क्लबिंग: ऑक्सीजन की लगातार कमी से नाखून के निचले हिस्से और नेल बेड के बीच का प्राकृतिक कोण (Angle) भी खत्म यानी ऑब्लिटरेट (Obliterate) हो जाता है, जिसे डॉक्टरी भाषा में 'क्लचिंग/क्लबिंग' कहा जाता है।

अगर कोई व्यक्ति अपने नाखूनों में इस तरह का अचानक बदलाव नोटिस करता है, तो उसे सबसे पहले क्या करना चाहिए? कौन-कौन से बेसिक टेस्ट करवाने की सलाह आप देंगे?

यदि कोई व्यक्ति अपने नाखूनों में अचानक कोई बदलाव या असामान्य स्थिति नोटिस करता है, तो घबराने की बजाय उन्हें कुछ बुनियादी (बेसिक) मेडिकल टेस्ट करवाने चाहिए:

कार्डियोवैस्कुलर जांचें (हृदय से जुड़ी जांचें):

  • ईसीजी (ECG) और इको (2D Echo): यदि हृदय से जुड़ी किसी समस्या या रक्त संचार में रुकावट का संदेह हो।
  • लिपिड प्रोफाइल टेस्ट (Lipid Profile): कोलेस्ट्रॉल और हृदय स्वास्थ्य के शुरुआती आकलन के लिए।

फेफड़ों से संबंधित जांचें (पल्मोनरी टेस्ट):

चेस्ट एक्स-रे (Chest X-Ray) या सीटी स्कैन (CT Scan): यदि शरीर में ऑक्सीजन की कमी (Deficiency) के कारण ल्यूनुला का रंग बदल रहा है या 'नेल्स क्लबिंग' हो रही है, तो फेफड़ों की कार्यक्षमता जांचने के लिए ये टेस्ट जरूरी हैं।

Updated on:
25 Jul 2026 06:13 pm
Published on:
25 Jul 2026 06:13 pm