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Child Malnutrition in MP: हड्डियों का ढांचा बना ‘सरकार का लक्ष्य’, कुपोषण से हजारों मासूमों का बचपन दांव पर

कुपोषण सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उन मासूम चेहरों की हकीकत है, जिनका बचपन भूख, बीमारी और बदहाली के बीच दम तोड़ रहा है। जबलपुर के पनागर की सात माह की वैष्णवी का वजन महज 4 किलो है, वहीं दो साल के लक्ष्य का वजन सिर्फ 3.355 किलो दर्ज किया गया। ये आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के लिए चल रही पोषण योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला है। जबलपुर से लेकर पूरे मध्यप्रदेश तक कुपोषण की यह तस्वीर सवाल खड़े करती है कि सरकारी इंतजामों के बावजूद हजारों मासूम आज भी स्वस्थ बचपन से क्यों दूर हैं। पढ़िए शुभम सिंह बघेल की रिपोर्ट
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Aug 12, 2026
Child Malnutrition
मध्य प्रदेश में बच्चों में कुपोषण के आंकड़ें बेहद खराब हैं। (Photo: Rajasthan Patrika)

Child Malnutrition: हड्डियों से चिपका मांस, अंगुलियों जैसी पतली बांहें और टांगें, धंसी हुई आंखें, भीतर तक समाया पेट और महज 3 किलो 355 ग्राम वजन। दो साल का लक्ष्य चौधरी अपनी उम्र से कई गुना छोटा नजर आता है। कांचघर निवासी नीलम चौधरी के बेटे लक्ष्य की हालत कुपोषण की उस भयावह तस्वीर को सामने लाती है, जिसे सरकारी आंकड़ों में अक्सर सिर्फ एक संख्या के रूप में दर्ज किया जाता है।

रानी दुर्गावती लेडी एल्गिन अस्पताल के पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में लक्ष्य जैसे कई बच्चे कुपोषण से जंग लड़ रहे हैं। इनमें अलग-अलग क्षेत्रों से आए बच्चे शामिल हैं। किसी के परिवार में बीमारी है तो कहीं गरीबी और अनिश्चित मजदूरी बच्चों के हिस्से का पोषण छीन रही है।

पनागर के एनआरसी में भर्ती सात माह की वैष्णवी की कहानी भी ऐसी ही है। पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। रोज काम मिले, यह तय नहीं। मां रुक्मणी कोल पिछले तीन महीने से टीबी का इलाज करा रही हैं। बीमारी के कारण वह बेटी को पर्याप्त दूध नहीं पिला सकीं। सात महीने की वैष्णवी का वजन अब सिर्फ 4 किलो है।

मजदूरी और बीमारी के बीच छूट रहा बच्चों का पोषण

वैष्णवी अकेली नहीं है। पनागर एनआरसी में भर्ती सातों अतिकुपोषित बच्चे गंभीर स्थिति में बताए गए हैं। यहां आने वाले बच्चों में बड़ी संख्या उन परिवारों की है, जिनकी रोजी-रोटी ईंट-भट्ठों और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है। माता-पिता दिनभर मजदूरी पर रहते हैं तो छोटे बच्चों की देखभाल बुजुर्गों के भरोसे रह जाती है। परिवार की आमदनी इतनी नहीं होती कि नियमित रूप से दूध, फल, अंडे या दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराए जा सकें। बीमारी जुड़ जाए तो स्थिति और बिगड़ जाती है।

पनागर एनआरसी की प्रभारी खुशबू बेरवाल के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में अब तक 258 अतिकुपोषित बच्चों को उपचार के लिए केंद्र लाया गया। 18 जुलाई से 5 अगस्त के बीच 30 नए बच्चे चिन्हित हुए। इनमें 23 उपचार के बाद घर लौट चुके हैं, जबकि सात का उपचार जारी है।

जबलपुर में कुपोषण की तस्वीर आंकड़ों में भी गंभीर

महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में 699 बच्चे गंभीर तीव्र कुपोषण (SAM), 2469 बच्चे मध्यम तीव्र कुपोषण (MAM) और 1386 बच्चे गंभीर रूप से कम वजन (SUW) की श्रेणी में दर्ज हैं। यानी विभागीय आंकड़ों में कुपोषण और गंभीर कम वजन की श्रेणियों में दर्ज बच्चों की संख्या हजारों में है। हालांकि इन श्रेणियों में संभावित ओवरलैप को स्पष्ट किए बिना इन्हें अलग-अलग बच्चों का कुल आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।

एनआरसी में भी क्षमता से ज्यादा दबाव

जिले के पोषण पुनर्वास केंद्रों में भर्ती बच्चों की संख्या और उपलब्ध बिस्तरों के आंकड़े भी व्यवस्था पर दबाव की ओर इशारा करते हैं। जून में 667 बच्चों का उपचार किए जाने की जानकारी दी गई है, जबकि वर्तमान में 232 बच्चों के भर्ती होने का आंकड़ा सामने आया है।

एनआरसी में अतिकुपोषित बच्चों को सामान्य तौर पर 14 दिन तक डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाता है। शुरुआत में विशेष चिकित्सकीय आहार दिया जाता है। स्थिति के अनुसार एफ-75 और एफ-100 जैसे चिकित्सकीय फीड से उपचार शुरू होता है और बाद में बच्चों को खिचड़ी, दाल, चावल, दलिया, उपमा, हलुआ आदि पौष्टिक आहार दिया जाता है।

बच्चों की माताओं को भी पोषण और शिशु देखभाल का प्रशिक्षण दिया जाता है। केंद्र में रहने के दौरान मजदूरी के नुकसान की भरपाई के लिए 120 रुपए प्रतिदिन की प्रोत्साहन राशि दिए जाने का प्रावधान बताया गया है।

14 दिन के इलाज के बाद असली चुनौती घर पर

एनआरसी में उपचार के दौरान बच्चे का वजन और स्वास्थ्य सुधारा जा सकता है, लेकिन कुपोषण से लड़ाई सिर्फ 14 दिन के इलाज तक सीमित नहीं है। बच्चा जब घर लौटता है, तब परिवार की आर्थिक स्थिति, मां का स्वास्थ्य, भोजन की उपलब्धता और बच्चे की देखभाल की व्यवस्था फिर वही होती है।

पनागर के कुशनेर, पठरा, उमरिया, फूटाताल, देवरी, रैपुरा और महाराजपुर जैसे क्षेत्रों से अतिकुपोषित बच्चों के मामले सामने आना बताता है कि कुपोषण का संबंध सिर्फ भोजन की कमी से नहीं, बल्कि गरीबी, बीमारी, मजदूरी और बच्चों की नियमित देखभाल से भी जुड़ा है।

खोजने का लक्ष्य बड़ा, लेकिन चिन्हांकन और इलाज के बीच बड़ा अंतर

प्रदेश में कुपोषित बच्चों की पहचान के लिए स्क्रीनिंग अभियान चलाया जा रहा है। अतिकुपोषित बच्चों को एनआरसी में भर्ती कराने के निर्देश भी हैं। इसके बावजूद उपलब्ध आंकड़ों में चिन्हांकन और उपचार के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

प्रदेश में करीब 3.15 लाख कुपोषित बच्चों की पहचान का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अब तक करीब 25 हजार बच्चे ही चिन्हित किए जा सके हैं। इसी तरह अति गंभीर कुपोषित बच्चों के 31 हजार के लक्ष्य के मुकाबले करीब 7 हजार बच्चों तक ही चिन्हांकन पहुंच पाया। इनमें से एनआरसी तक पहुंचने वाले बच्चों की संख्या करीब 4002 बताई गई है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने बच्चे कुपोषित हैं। बड़ा सवाल यह भी है कि कितने बच्चे सिस्टम की नजर में आ पा रहे हैं और चिन्हित होने के बाद कितनों को समय पर इलाज मिल रहा है।

महंगाई के दौर में 8 रुपए में कितना पोषण?

कुपोषण से लड़ाई की पूरी व्यवस्था के बीच सरकारी पोषण खर्च भी सवाल खड़ा करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार आंगनबाड़ी पोषण व्यवस्था में प्रति बच्चे प्रतिदिन करीब 8 रुपए की दर 2017 में तय की गई थी। इसके बाद लागत बढ़ने के बावजूद इस दर में अपेक्षित वृद्धि नहीं होने का दावा किया जा रहा है। सवाल यह है कि जब महंगाई के दौर में एक गिलास दूध की कीमत ही कई जगह 10 रुपए से अधिक है, तब प्रतिदिन 8 रुपए में बच्चे के लिए संतुलित पोषण कैसे सुनिश्चित होगा?

विशेषज्ञों के अनुसार बच्चे के संतुलित आहार में प्रोटीन, दूध, दाल, अंडा, फल और दूसरे पोषक तत्वों की जरूरत होती है। ऐसे में सरकारी खर्च और वास्तविक पोषण जरूरत के बीच अंतर कुपोषण से लड़ाई की बड़ी चुनौती बन सकता है।

भोजन की कमी से आगे बढ़कर ‘डबल क्राइसिस’

कुपोषण का संकट सिर्फ भोजन की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। दूषित पानी, डायरिया, संक्रमण और खराब स्वच्छता भी बच्चों के पोषण को प्रभावित करते हैं। वहीं आंगनबाड़ी केंद्रों पर सप्लाई की अनियमितता, टेक-होम राशन की गुणवत्ता और मॉनिटरिंग की कमी जैसी शिकायतें व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती हैं। सवाल यह है कि कुपोषण मुक्त मध्यप्रदेश का लक्ष्य सिर्फ बच्चों को चिन्हित करने तक रहेगा या उनके घर तक नियमित और पर्याप्त पोषण पहुंचाने की व्यवस्था भी मजबूत होगी

Updated on:
12 Aug 2026 11:08 am
Published on:
12 Aug 2026 11:02 am
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