Patrika Special News

Lord Vishnu : घने जंगलों में विराजे शेषशायी भगवान विष्णु, आस्था के साथ पर्यटन का अनमोल खजाना है मध्य प्रदेश का चतुर्भुज नाथ मंदिर

Lord Vishnu : मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में घने जंगलों के बीच एक प्राचीन मंदिर है। गांधी सागर अभयारण्य में यह मंदिर सैकड़ों साल पुरानी विरासत है। यहां बारहमासी जलधारा और 2500 से अधिक शैलचित्रों का अनूठा संगम है। इस बारे में पढ़िए आशीष पाठक की विशेष रिपोर्ट।
5 min read
• •
Oct 16, 2026
Lord Vishnu
मंदसौर जिले में स्थित भगवान विष्णु का मंदिर (Photo: Patrika, Designed: ChatGpt)

Lord Vishnu : मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के घने जंगलों के बीच एक ऐसा प्राचीन मंदिर स्थित है, जहां भगवान विष्णु के शेषशायी स्वरूप के दर्शन के साथ प्रकृति की शांति और सैकड़ों साल पुराने इतिहास की झलक भी देखने को मिलती है। गांधी सागर अभयारण्य के वनांचल में स्थित श्री चतुर्भुज नाथ मंदिर केवल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्रदेश में धार्मिक, पुरातात्विक और प्राकृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की संभावनाओं से भरपूर एक महत्वपूर्ण विरासत स्थल भी है।

करीब एक हजार वर्ष पुराना बताया जाने वाला यह मंदिर अपनी विशिष्ट प्रतिमा, समीप बहने वाली बारहमासी जलधारा, छोटी-छोटी गुफाओं और चट्टानों पर मौजूद प्राचीन शैलचित्रों के कारण खास पहचान रखता है। भानपुरा तहसील से करीब 40 किलोमीटर और मंदसौर जिला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल उन पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण बन सकता है, जो धार्मिक यात्रा के साथ इतिहास और प्रकृति को भी करीब से जानना चाहते हैं।

जंगलों के सन्नाटे में भगवान विष्णु का दिव्य स्वरूप

श्री चतुर्भुज नाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां विराजित भगवान विष्णु का शेषशायी स्वरूप है। धार्मिक परंपरा में भगवान विष्णु को शेषनाग पर शयन करते हुए सृष्टि के संरक्षण और ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक माना जाता है। दक्षिण भारत के कई प्रसिद्ध मंदिरों में इस स्वरूप के दर्शन होते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के वन क्षेत्र में स्थित इस प्राचीन मंदिर में ऐसी प्रतिमा का होना इसे विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करता है। मंदिर का वातावरण भी श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति कराता है। चारों ओर फैले जंगल, प्राकृतिक चट्टानें और शांत परिवेश शहरों की भागदौड़ से दूर कुछ समय बिताने का अवसर देते हैं। भगवान विष्णु के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के साथ धार्मिक स्थापत्य, प्राचीन प्रतिमाओं और भारतीय संस्कृति में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए भी यह स्थान विशेष महत्व रखता है।

चतुर्भुज सागर की जलधारा से जुड़ी क्षीरसागर की मान्यता

मंदिर के समीप बहने वाली बारहमासी जलधारा इस स्थल की प्राकृतिक और धार्मिक महत्ता को और बढ़ाती है। इसे चतुर्भुज सागर के नाम से जाना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस जलधारा का संबंध धरती के भीतर स्थित क्षीरसागर से माना जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं में क्षीरसागर को भगवान विष्णु के निवास से जोड़ा जाता है। यही मान्यता मंदिर की यात्रा को श्रद्धालुओं के लिए और अधिक भावपूर्ण बनाती है। वहीं, प्रकृति प्रेमियों के लिए यह जलधारा वन क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना को करीब से देखने का अवसर प्रदान करती है। यदि इस स्थल की विशेषताओं को व्यवस्थित रूप से पर्यटन से जोड़ा जाए, तो चतुर्भुज नाथ मंदिर और चतुर्भुज सागर को एक संयुक्त धार्मिक एवं प्राकृतिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।

पांच किलोमीटर के दायरे में गुफाएं, चट्टानों पर इतिहास की छाप

चतुर्भुज नाथ मंदिर के आसपास का क्षेत्र पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बताया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मंदिर के लगभग पांच किलोमीटर के दायरे में कई छोटी-छोटी गुफाएं मौजूद हैं। आसपास की चट्टानों पर 2500 से अधिक प्राचीन शैलचित्र होने की जानकारी भी सामने आती है।

शैलचित्र प्राचीन मानव जीवन, उसकी गतिविधियों और प्रकृति के साथ उसके संबंधों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इन चित्रों के माध्यम से तत्कालीन जीवनशैली, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों और मानव सभ्यता के विकास से जुड़े पहलुओं का अध्ययन किया जा सकता है। मंदिर के आसपास गुफाओं और शैलचित्रों की मौजूदगी इस क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन से आगे बढ़ाकर विरासत और पुरातात्विक पर्यटन के लिए भी उपयोगी बनाती है। हालांकि, इन शैलचित्रों की वास्तविक आयु, ऐतिहासिक संदर्भ और संरक्षण की स्थिति का निर्धारण विशेषज्ञों के वैज्ञानिक अध्ययन से किया जाना आवश्यक है। इससे इस धरोहर को प्रमाणिक पहचान देने के साथ इसके संरक्षण की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।

बड़ी संख्या पहुंचते हैं श्रद्धालु

भगवान विष्णु की उपासना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली एकादशी तिथि पर मंदिर में विशेष धार्मिक गतिविधियां देखने को मिलती हैं। हिंदू पंचांग के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशी पर श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। इसके अलावा नवरात्र और दीपावली के आसपास भी श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने की जानकारी मिलती है। धार्मिक अवसरों को पर्यटन से जोड़कर इस स्थल की पहचान व्यापक स्तर पर स्थापित की जा सकती है। इसके लिए स्थानीय धार्मिक परंपराओं, मंदिर के इतिहास और क्षेत्र की प्राकृतिक विशेषताओं की जानकारी उपलब्ध कराना उपयोगी होगा।

(Photo: Rajasthan Patrika)

पर्यटन विकास से खुल सकते हैं रोजगार के नए रास्ते

श्री चतुर्भुज नाथ मंदिर की खासियत यह है कि यहां एक ही यात्रा में धार्मिक दर्शन, प्राकृतिक सौंदर्य और प्राचीन विरासत को अनुभव किया जा सकता है। यही विशेषता इसे बहुआयामी पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावना पैदा कर रही है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले मंदिर तक पहुंचने वाले मार्गों, दिशा-सूचक बोर्डों और स्थानीय परिवहन की जानकारी को बेहतर बनाने की जरूरत है। इसके साथ ही मंदिर के इतिहास, भगवान विष्णु के शेषशायी स्वरूप, चतुर्भुज सागर की स्थानीय मान्यता और आसपास की गुफाओं व शैलचित्रों के बारे में प्रमाणिक जानकारी देने वाले सूचना केंद्र विकसित किए जा सकते हैं।

इस इलाके के लिए यह करने की जरुरत

स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित गाइड के रूप में तैयार करना, आसपास के गांवों के हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना तथा स्वच्छता एवं पर्यटक सुविधाओं को मजबूत करना भी उपयोगी कदम हो सकते हैं। इससे क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। हालांकि, किसी भी विकास योजना को लागू करते समय गांधी सागर अभयारण्य के वन नियमों, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और पुरातात्विक धरोहर के संरक्षण को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।

गांधी सागर पर्यटन सर्किट से जुड़ने की संभावना

मंदसौर जिले की इस विरासत को गांधी सागर क्षेत्र के अन्य पर्यटन स्थलों के साथ जोड़कर एक व्यवस्थित पर्यटन सर्किट विकसित करने की संभावना है। इससे पर्यटक केवल एक स्थान तक सीमित रहने के बजाय क्षेत्र की धार्मिक, प्राकृतिक और ऐतिहासिक विशेषताओं को एक साथ देख सकेंगे। चतुर्भुज नाथ मंदिर को केंद्र में रखकर तैयार की गई यात्रा योजना में स्थानीय इतिहास, वन क्षेत्र की प्राकृतिक विशेषताओं और आसपास की पुरातात्विक धरोहरों की जानकारी शामिल की जा सकती है। डिजिटल माध्यमों पर मंदिर की प्रमाणिक जानकारी, तस्वीरें, पहुंच मार्ग और यात्रा संबंधी दिशा-निर्देश उपलब्ध कराने से दूसरे शहरों के पर्यटकों तक भी इसकी पहचान पहुंचाना जरुरी है। इसके लिए पर्यटन विभाग, वन विभाग, पुरातत्व विशेषज्ञों और स्थानीय समुदाय के बीच समन्वय महत्वपूर्ण रहेगा। नियंत्रित और जिम्मेदार पर्यटन व्यवस्था से प्राकृतिक परिवेश को नुकसान पहुंचाए बिना पर्यटकों को बेहतर अनुभव दिया जा सकता है।

मंदसौर से सड़क मार्ग के जरिए पहुंचने की सुविधा

श्री चतुर्भुज नाथ मंदिर पहुंचने के लिए पर्यटक पहले मंदसौर या आसपास के प्रमुख शहरों तक पहुंच सकते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भानपुरा से मंदिर की दूरी करीब 40 किलोमीटर और मंदसौर से लगभग 100 किलोमीटर है। रेल से आने वाले यात्रियों के लिए मंदसौर और आसपास के प्रमुख रेल संपर्क उपयोगी हो सकते हैं, जबकि हवाई मार्ग से आने वाले यात्री इंदौर या उदयपुर के हवाई अड्डों का विकल्प देख सकते हैं। वहां से सड़क मार्ग के जरिए आगे की यात्रा की जा सकती है।

आस्था और विरासत को पहचान दिलाने का अवसर

श्री चतुर्भुज नाथ मंदिर मंदसौर जिले की ऐसी धरोहर है, जिसमें धार्मिक आस्था, प्राचीन संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य एक साथ दिखाई देते हैं। भगवान विष्णु के शेषशायी स्वरूप के दर्शन, चतुर्भुज सागर से जुड़ी स्थानीय मान्यता और आसपास मौजूद गुफाएं व शैलचित्र इस स्थल को सामान्य धार्मिक यात्रा से कहीं अधिक व्यापक अनुभव प्रदान करते हैं। जरूरत इस बात की है कि इस विरासत की पहचान को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाए। प्रमाणिक ऐतिहासिक जानकारी, बेहतर पहुंच सुविधाएं, पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन और स्थानीय लोगों की भागीदारी के माध्यम से चतुर्भुज नाथ मंदिर को मध्य प्रदेश के महत्वपूर्ण धार्मिक एवं विरासत पर्यटन स्थलों में शामिल करने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं। इससे न केवल इस प्राचीन धरोहर को नई पहचान मिलेगी, बल्कि मंदसौर और गांधी सागर क्षेत्र की पर्यटन संभावनाओं को भी विस्तार मिल सकेगा।

Updated on:
16 Oct 2026 03:46 pm
Published on:
16 Oct 2026 03:22 pm