Women Empowerment: बस्तर के परलकोट क्षेत्र की महिलाएं आम की बेकार समझी जाने वाली गुठलियों को आय, ईंधन और आत्मनिर्भरता का माध्यम बना रही हैं।
Women Empowerment: प्राकृतिक संपदा से समृद्ध बस्तर अब सिर्फ वनोपज के लिए ही नहीं, बल्कि नवाचार और आत्मनिर्भरता के नए मॉडल के लिए भी पहचान बना रहा है। परलकोट क्षेत्र की महिलाओं ने आम की बेकार समझी जाने वाली गुठलियों को कमाई, ईंधन और रोजगार का जरिया बनाकर एक अनोखी मिसाल पेश की है। यह पहल न केवल ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ा रही है, बल्कि यह भी साबित कर रही है कि स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के सहारे गांवों में ही आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार तैयार किया जा सकता है।
उत्तर बस्तर के परलकोट क्षेत्र की महिलाएं आज एक ऐसी पहल की मिसाल बन गई हैं, जिसने ‘कचरे’ को ‘कमाई’ में बदल दिया है। आम की जिन गुठलियों को पहले लोग बेकार समझकर फेंक देते थे, वही अब इन महिलाओं के लिए रोजगार, ईंधन और आर्थिक सशक्तिकरण का नया माध्यम बन गई हैं।
परलकोट क्षेत्र के ग्राम पीव्ही-11 की रेणुबाला मंडल और उनके साथ जुड़ी कई ग्रामीण महिलाओं ने आम की गुठलियों के प्रसंस्करण को आय का जरिया बना लिया है। पहले जहां आम खाने के बाद गुठलियां सीधे कचरे में चली जाती थीं, अब महिलाएं उन्हें रोजाना एकत्र करती हैं। फिर गुठलियों को सावधानी से काटकर उनके अंदर मौजूद पोषक तत्वों से भरपूर हिस्से को अलग किया जाता है।
इस हिस्से की बाजार में मांग है और यह करीब 10 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। यह सुनने में छोटी कमाई लग सकती है, लेकिन ग्रामीण परिवारों के लिए यह अतिरिक्त आय बेहद महत्वपूर्ण है। इससे न सिर्फ घर की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।
इस पहल की सबसे खास बात यह है कि यहां कुछ भी बेकार नहीं जाता। गुठली का अंदरूनी हिस्सा बेचने के बाद बचने वाला कठोर बाहरी खोल भी काम आता है। महिलाएं इसे घर के चूल्हों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। इससे बाजार में ईंधन खरीदने की जरूरत कम हो रही है और घर की ऊर्जा जरूरतें भी पूरी हो रही हैं। यानी एक ही गुठली से दो फायदे—कमाई भी और ईंधन भी। यह ‘शून्य अपशिष्ट’ यानी Zero Waste का ऐसा मॉडल है, जो बड़े शहरों के पर्यावरण अभियानों से कहीं ज्यादा प्रभावी और व्यवहारिक नजर आता है।
बस्तर के ग्रामीण हमेशा से मानते आए हैं कि उनकी सबसे बड़ी संपत्ति उनके जंगल और प्राकृतिक संसाधन हैं। फर्क सिर्फ सोच का है—जो संसाधन पहले सामान्य लगते थे, वही अब रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं। यह पहल बताती है कि अगर स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक और पारंपरिक ज्ञान के साथ उपयोग किया जाए, तो ग्रामीणों को रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गांव में रहकर, अपने संसाधनों के साथ जुड़कर भी सम्मानजनक जीवन जिया जा सकता है।
परलकोट की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि आत्मनिर्भरता केवल सरकारी योजनाओं से नहीं आती, बल्कि स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे नवाचार भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। यह पहल महिला सशक्तिकरण की भी मिसाल है, जहां घरेलू जिम्मेदारियों के बीच महिलाएं अब आर्थिक निर्णयों में भी भागीदार बन रही हैं।
आज जब देश ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात कर रहा है, तब बस्तर के गांवों से निकल रही ऐसी कहानियां बताती हैं कि असली आत्मनिर्भरता जमीन पर कैसे दिखती है। परलकोट की महिलाएं सिर्फ आम की गुठलियां नहीं जमा कर रहीं, वे अपने परिवारों के लिए बेहतर भविष्य, गांव के लिए नई उम्मीद और देश के लिए आत्मनिर्भरता का एक मजबूत मॉडल तैयार कर रही हैं।
बस्तर अंचल अपनी जैव विविधता, घने जंगलों और समृद्ध वनोपज के लिए देशभर में पहचान रखता है। यहां के ग्रामीण समुदाय सदियों से जंगलों पर आधारित जीवनशैली अपनाते आए हैं, जहां महुआ, तेंदूपत्ता, इमली और अन्य वन उत्पाद आजीविका का मुख्य आधार रहे हैं। बदलते समय के साथ अब ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग और मूल्य संवर्धन की दिशा में नई पहले सामने आ रही हैं।
इसी कड़ी में परलकोट क्षेत्र की महिलाओं ने आम की गुठलियों जैसी आमतौर पर बेकार समझी जाने वाली वस्तु को आय के साधन में बदलकर एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है। यह पहल केवल अतिरिक्त कमाई तक सीमित नहीं है, बल्कि “वेस्ट टू वेल्थ” और “शून्य अपशिष्ट” जैसे आधुनिक सिद्धांतों को ग्रामीण स्तर पर व्यवहारिक रूप देने का भी काम कर रही है। इससे यह साबित हो रहा है कि बस्तर की प्राकृतिक संपदा और पारंपरिक ज्ञान, यदि सही दिशा मिले, तो आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव बन सकते हैं।