
Poster Culture: फिल्म में फटा पोस्टर किसी हीरो के आने का संकेत देता था। इंदौर की सड़कों पर फटा पोस्टर अब एक दूसरा सवाल खड़ा करता है- इसे लगाया किसने था? और क्यों? जवाब में जो नाम सामने आते हैं वह आमतौर पर हमारे आसपास के ही होते हैं, हमारे अपने और अक्सर वे जिन्हें हमने चुना है।
शहर में कहीं डिवाइडर पर बैनर है, कहीं बिजली के खंभे पर पोस्टर, कहीं चौराहे पर स्वागत द्वार और कहीं सड़क के बीच ऐसा गेट खड़ा है, जैसे रास्ता जनता के आने-जाने के लिए नहीं, किसी आयोजन के प्रचार के लिए बनाया गया हो। और पोस्टर के बीच से झांकता चेहरा लगभग हर बार एक कहानी कहता है। कभी धार्मिक यात्रा की अगुआई करने वाले का। कभी आयोजन कराने वाले का। कभी किसी जनप्रतिनिधि का।कभी समर्थकों का। और कई बार एक ही पोस्टर में इतने चेहरे कि आयोजन का मूल उद्देश्य ढूंढना मुश्किल हो जाए।
इसी पोस्टर संस्कृति के खिलाफ आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता प्रहलाद पांडे नौ दिन तक रीगल तिराहे पर गांधी प्रतिमा के नीचे अनशन पर बैठे रहे। 16 सितंबर को अवैध बैनर-पोस्टर की वीडियो बनाने के दौरान मारपीट का आरोप लगाने के बाद उन्होंने शहर से अवैध पोस्टर-होर्डिंग हटाने की मांग को लेकर सत्याग्रह शुरू किया। मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। नौ दिन बाद नगर निगम और जिला प्रशासन के लिखित आश्वासन पर अनशन खत्म हुआ। निगम ने प्रमुख चौराहों से अवैध होर्डिंग हटाने का भरोसा दिया।
लेकिन कहानी प्रहलाद पांडे के अनशन के खत्म होने के साथ खत्म नहीं होती। असल सवाल तो यह है कि इंदौर में पोस्टर लगाने की जरूरत इतनी बड़ी क्यों है कि उन्हें हटाने के लिए किसी नागरिक को नौ दिन तक सड़क पर बैठना पड़े?
इंदौर में चुनरी यात्रा निकलती है तो उसका अपना धार्मिक और सामाजिक उद्देश्य होता है। कांवड़ यात्रा निकलती है तो उसमें भी आस्था, यात्रा और सेवा की अपनी भूमिका है। सामूहिक विवाह होता है तो उसके केंद्र में कई जोड़ों का घर बसाना उद्देश्य होना चाहिए। सामाजिक आयोजन होते हैं तो उनका उद्देश्य समाज से जुड़ा होना चाहिए। लेकिन शहर की सड़कों पर इन आयोजनों का एक दूसरा चेहरा भी दिखाई देता है- बैनर, पोस्टर और होर्डिंग।
आयोजन की आत्मा एक तरफ और प्रचार का चेहरा दूसरी तरफ। कभी-कभी चेहरा इतना बड़ा हो जाता है कि आयोजन पीछे छूट जाता है। जन्मदिन इसका सबसे आसान उदाहरण है। इंदौर में ऐसे मौके भी आए जब समर्थकों ने किसी जनप्रतिनिधि के जन्मदिन पर पूरे विधानसभा क्षेत्र में बैनर-पोस्टर लगा दिए। एक बड़े वाले नेताजी के बेटे के जन्मदिन पर तो जैसे धरती-आकाश एक हो जाता है। इतने होर्डिंग लगते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इसका दूसरा उदाहरण भी इसी शहर में मौजूद है। एक विधायक ने 2025 में अपने जन्मदिन पर समर्थकों से होर्डिंग-बैनर न लगाने की अपील की। चौराहों पर लगे अपने होर्डिंग खुद हटवाने पहुंचे और कहा कि होर्डिंग पर खर्च होने वाली रकम सामाजिक काम में लगाई जा सकती है। यानी विकल्प मौजूद है। सवाल सिर्फ इतना है कि सार्वजनिक जगह पर अपना चेहरा लगाने को उपलब्धि मानने की आदत कब बदलेगी?
यहां मामला सिर्फ सुंदरता का नहीं है। मध्यप्रदेश के Outdoor Advertisement Media Rules, 2017 में सार्वजनिक जगहों पर विज्ञापन लगाने के लिए नियम तय हैं। 17 मार्च 2026 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ के सामने भी यही सवाल पहुंचा। याचिका में सड़क के डिवाइडर और फुटपाथ पर लगे होर्डिंग की तस्वीरें पेश की गईं। कोर्ट ने नगर निगम आयुक्त को नियमों के विपरीत लगे ऐसे होर्डिंग की पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया। यानी यह कोई अस्पष्ट क्षेत्र नहीं है। जहां होर्डिंग नहीं लगना चाहिए, वहां नहीं लगना चाहिए। फिर जुलाई में इसी विषय का एक और मामला हाईकोर्ट पहुंचा। मामले में 2022 के एक पुराने हाईकोर्ट आदेश का पालन करने का निर्देश दिया। 2022 के उस आदेश में अदालत ने अवैध विज्ञापन सामग्री की शिकायतों पर कार्रवाई और दंडात्मक प्रावधानों को लागू करने की जरूरत बताई थी।
तो सवाल बहुत सीधा है,जब नियम भी हैं, अदालत के आदेश भी हैं और कार्रवाई की व्यवस्था भी है, फिर सड़क पर अवैध पोस्टर क्यों हैं?
नगर निगम समय-समय पर अवैध पोस्टर-बैनर हटाने के अभियान चलाता रहा है। कहा जाता है कि हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए कार्रवाई की जा रही है। हकीकत यह है कि शहर में जब किसी जननेता का आगमन होता है तो सड़कों पर अवैध होर्डिंग लगाए जाने की शिकायतें सामने ती हैं और बाद में निगम उन्हें हटाता है। यहीं पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। पहले पोस्टर लगता है। फिर शिकायत होती है।फिर पोस्टर हटता है।फिर कुछ दिन बाद नया पोस्टर लग जाता है।तो निगम की सफलता किसमें मापी जानी चाहिए?इसमें कि उसने एक दिन में कितने पोस्टर उतारे?या इसमें कि अगले दिन एक भी नया पोस्टर न लगे?क्योंकि अगर सुबह 100 पोस्टर हटाए गए और रात में 101 नए पोस्टर लग गए, तो शहर साफ नहीं हुआ। सिर्फ पोस्टर हटाने का काम बढ़ा।
23 सितंबर को पाटनीपुरा चौराहे पर लगा एक बड़ा होर्डिंग/स्वागत द्वार सड़क पर गिर गया और एक युवक घायल हो गया। घटना गणेशोत्सव के प्रचार के लिए लगाए गए ढांचे से जुड़ी बताई गई।यहीं से इस पूरी बहस का दूसरा पहलू सामने आता है। सड़क पर लगा बैनर शहर को बदसूरत करता है- यह एक बात है। लेकिन सड़क पर खड़ा असुरक्षित गेट गिर जाए तो वह किसी की जान के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि इंदौर कैसा दिखाई देता है।सवाल यह भी है कि इंदौर की सड़कें किसकी जिम्मेदारी हैं?
धार्मिक यात्रा हो, सामाजिक कार्यक्रम हो, सामूहिक विवाह हो, किसी बड़े नेता का दौरा हो या जन्मदिन, हर आयोजन के साथ प्रचार होना अपने आप में गलत नहीं है। प्रचार आयोजन का हिस्सा हो सकता है। लेकिन समस्या वहां शुरू होती है, जहां प्रचार के लिए सार्वजनिक जगह को अपनी निजी जगह समझ लिया जाए।और उससे भी आगे तब, जब आयोजन से ज्यादा महत्वपूर्ण आयोजन कराने वाले का चेहरा हो जाए।शहर में किसी सामूहिक विवाह का पोस्टर लगे तो सवाल होना चाहिए- कितने जोड़ों का घर बस रहा है?किसी धार्मिक यात्रा का पोस्टर लगे तो दिखना चाहिए- यात्रा का संदेश क्या है? किसी सामाजिक अभियान का पोस्टर लगे तो सामने आना चाहिए- अभियान किस बदलाव की बात कर रहा है? लेकिन अगर इन सबके ऊपर सबसे बड़ा चेहरा ही दिखाई दे तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
फटा पोस्टर नहीं, व्यवस्था का सवाल है। प्रहलाद पांडे का सत्याग्रह खत्म हो गया है। निगम ने लिखित आश्वासन दिया है। कुछ प्रमुख चौराहों से अवैध होर्डिंग हटाने की समय-सीमा तय की गई है। अब देखना यह है कि इन जगहों से होर्डिंग हटने के बाद वहां फिर क्या होता है।क्योंकि इस कहानी का अंत पोस्टर हटाने से नहीं होगा।असली अंत तब होगा जब पोस्टर लगाने से पहले नियम याद आएगा।जब आयोजन करने वाला खुद कहेगा- सड़क मेरी जागीर नहीं है। जब समर्थक खुद कहेंगे-चौराहा हमारा प्रचार मंच नहीं है।और जब प्रशासन को शिकायत आने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। फिल्म में फटा पोस्टर हीरो को सामने लाता था।इंदौर में फटा पोस्टर अब एक और कहानी बता रहा है।पोस्टर के पीछे कौन है, यह बाद का सवाल है।
कुछ सवाल ये भी हैं
सार्वजनिक जगह आखिर किसकी है?
आयोजन की?
प्रचार की?
या जनता की?
और शायद इंदौर के लिए सबसे जरूरी सवाल यही है-
पोस्टर हटाने वाला सिस्टम चाहिए या पोस्टर लगने से रोकने वाला? या पूरी मुस्तैदी के साथ शहर को अवैध होर्डिंग से मुक्त करने वाला?