Chambal Dakait: ये कहानियां सत्ता की लालसा की नहीं हैं, उस आत्मसंघर्ष की दास्तानें हैं, जिनमें ये पूर्व डकैत अपने अतीत से बाहर निकलकर समाज के सामने खुद को नये सलीकों में गढ़ रहे हैं। किसी की पत्नी सरपंच है, तो सरपंच पति दस्यु सरगना परदे के पीछे गांव की तस्वीर बदलने का काम कर रहा है.. पहले एपिसोड में पढ़ें बागी मलखान सिंह की नई कहानी...
Chambal Dakait: ग्वालियर-चंबल के बीहड़ों में शाम ढलते ही घरों के दरवाजे बंद हो जाया करते थे… कभी जिनके नाम लेते ही सन्नाटा छा जाता था... आज वही नाम गांव की चौपालों में विकास की बातों से पहचाने जा रहे हैं। जिन हाथों में कभी बंदूकें थीं और अन्याय-अत्याचार के खिलाफ जागे आक्रोश से आंखों का रंग लाल था, आज वो आंखें मतपेटी में बंद विजेता के भाग्य का सपना संजो रही हैं, समाज में बड़े बदलाव की बाट जोह रही हैं।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल का इतिहास खून-खराबे, बदले और खौफ जैसे शब्दों से भरा पड़ा है, लेकिन आज उसी इतिहास के किरदार बदल रहे हैं। बागी…डकैत…दस्यु सरगना जैसे शब्दों में कैद इन किरदारों ने उस भयावह अतीत से माफी भले ही नहीं मांगी… लेकिन आज खुद से त्यागे उसी समाज में वे भविष्य का मौका जरूर तलाश रहे हैं
ये कहानियां सत्ता की लालसा की नहीं हैं, उस आत्मसंघर्ष की दास्तानें हैं, जिनमें इंसान अपने सबसे काले लेकिन सच्चाई के लिए बंदूकों के साथ बीते अतीत से बाहर निकलकर समाज के सामने खुद को नये सलीकों में गढ़ रहे हैं। किसी की पत्नी सरपंच है, तो सरपंच पति दस्यु सरगना परदे के पीछे गांव की तस्वीर बदलने का काम कर रहा है। कोई खुद कुर्सी पर बैठकर उस जमीन का कर्ज चुकाना चाहता है, जिसे कभी उसने गोलियों से छलनी-छलनी कर दिया था। तो कोई बता रहा है आज कैसे क्राइम का...अपराधों का स्वरूप बदला है...
बागियों ने कभी उसे नजर उठाकर नहीं देखा... जिसे कभी छूना भी पाप माना...वो जिसे वे देवी मानते रहे... आज उसकी आबरू लुटती है...उसकी इज्जत का तमाशा बनता है...उसके सपनों को रिश्ते-नातेदार, दोस्त और कई बार वो खुद तोड़ रही है... उनका दिल तड़प उठता है... बगावत भले ही आज इनके व्यवहार में नहीं... लेकिन इनका खून भी खौल उठता है...पत्रिका.कॉम से संवाददाता संजना कुमार ने की बागी मलखान से बात...उनकी सबसे बड़ी चिंता यही महिलाएं सुरक्षित नहीं.. युवाओं की हालत बदतर...
आज हम करेंगे कुछ नहीं, लेकिन जब सामने अन्याय हो रहा है, तो उसका विरोध तो करेंगे ही…अगर हमने नहीं किया… तो हमारा चंबल में इतने साल रहने का क्या मतलब… परम्परा है हमारी… अन्याय सह नहीं सकते
डर न आज था न कल था...जनता हम पर विश्वास करती थी और करती है कि हम ही हैं जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकते हैं।
चंबल के बीहड़ों में डंका बजाने वाले आत्मसमर्पित मलखान सिंह उर्फ दद्दा ठाकुर का भी समाज सेवा और विकास की ओर झुकाव नजर आता है। उनकी पत्नी ललिता सिंह गुना के आरोन से निर्विरोध सरपंच हैं। मलखान सिंह खुद बताते हैं कि वे 16 साल की उम्र में पंच चुने जा चुके। लेकिन 100 बीघा जमीन की लड़ाई के लिए उन्हें बंदूक थामनी पड़ी थी।
जिस मकसद से वे बागी बने थे, वह पूरा होने के बाद उन्होंने बंदूक छोड़ दी। उनकी नजर में विकास और बदलाव के जरिए ईमानदारी से काम की जरूरत है। फिलहाल उनका चुनावी मैदान में उतरने का कोई सीधा इरादा नहीं है, लेकिन वे सत्ता का हाथ थामे बिना भी विकास करने की चाह रखते हैं।