David Abraham Uncle John: हिंदी सिनेमा के वो अनमोल रत्न और ऐसे अभिनेता जिन्हें आज भी कई लोग अंकल जॉन के नाम से याद करते हैं, वहीं, कुछ लोग तो उनके बारे में जानते ही नहीं होंगे। फिल्मों में उनके सफर से लेकर उनकी असामयिक मृत्यु तक, जानते हैं डेविड अब्राहम की कहानी है, जो पूरी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे चहेते अंकल थे।
David Abraham Uncle John: 'नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…' ये गाना तो आपने सुना ही होगा। ये गाना एक बच्चे और एक अंकल पर फिल्माया गया है। और ये अंकल कोई और नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा के लेजेंड्री कॉमेडियन और एक्टर डेविड अब्राहम चेउलकर थे। डेविड अब्राहम चेउलकर फिल्म इंडस्ट्री में डेविड नाम से फेमस थे। आज हम आपको हिंदी सिनेमा के इसी दिग्गज अभिनेता और अपने हास्य अंदाज से सबको हंसाने वाले डेविड के फिल्मी सफर के बारे में ही बताने जा रहे हैं।
ये एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने जवानी में भी बूढ़े अंकल के ही किरदार निभाए और हिंदी सिनेमा में 'अंकल जॉन' के नाम से मशहूर हो गए। कैसे मिला इनको ये नाम और कैसा रहा इनका फिल्मी सफर आइए जानते हैं पूरी जानकारी।
अंकल जॉन का असली नाम डेविड अब्राहम चेउलकर था। उनका जन्म 21 जून, 1909 को महाराष्ट्र के ठाणे में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनका और उनके परिवार का ताल्लुक एक यहूदी समुदाय से था। डेविड के पिता जो खुद रेलवे में बतौर इंजीनियर कार्यरत थे, वो चाहते थे कि उनका बेटा डेविड वकील बने। लेकिनपाने पिता की सोच के विपरीत डेविड की रूचि तो वेटलिफ्टिंग और स्पोर्ट्स में थी। इसीलिए वो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ फिजिकल फिटनेस और कुश्ती की प्रैक्टिस भी करते थे। इतना ही नहीं उन्होंने कई बार वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लिया और कई बार जीते भी। कम उम्र में डेविड के पिता का साया उनके सिर से उठ गया और पिता के सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने लॉ में एडमिशन ले लिया। मगर साथ-साथ अपने शौक को भी समय देते रहे। क़ानून की डिग्री लेने के बाद उन्होंने वकालत शुरू कर दी। मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था शायद इसीलिए कई महीनों के बाद भी उनको कोई केस नहीं मिला। स्पोर्ट्स के जरिये उनको पहचान तो मिली, लेकिन जीने के लिए सिर्फ पहचान ही नहीं पैसा भी जरूरी था। और फिर शुरू हुआ रंगमंच का सफर।
आपको बता दें कि डेविड कॉलेज के दिनों में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (IPTA) से जुड़े हुए थे, जहां उन्होंने स्टेज पर नाटकों में अभिनय करना शुरू कर दिया। वहीं उनके के दोस्त ने जो हिंदी फिल्मों में छोटे-मोटे किरदार निभाते थे, ने डेविड की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्मों में जाने और अपनी किस्मत आजमाने के लिए कहा।
अपने दोस्त की मदद से ही डेविड की मुलाकात फिल्म निर्माता मोहन भवनानी से हुई जिन्होंने 1937 आई फिल्म 'जम्मू' में एक छोटी भूमिका करने के लिए दी। मगर किस्मत तो देखिये मात्र 28 वर्ष की उम्र में डेविड को एक बूढ़े प्रोफेसर का किरदार निभाने को कहा गया। इस भूमिका ने उनको खासी पहचान दिलाई लेकिन इसके बाद उनको युवा किरदार ज्यादा नहीं मिल पाए क्योंकि दर्शकों ने उनके वृद्ध अवतार को पसंद कर लिया था।
कुछ छोटी-मोटी भूमिकाओं के बाद, साल 1941 में डेविड को फिल्म 'नया संसार' से अपना पहला बड़ा ब्रेक मिला। इस फिल्म ने डेविड को हिंदी सिनेमा में पहचान दिलाई। वहीं, 1944 में, उन्होंने धार्मिक और पौराणिक फिल्म 'द्रौपदी' में चतुर-चालाक शकुनी का किरदार निभाया और इस भूमिका में उन्होंने अपने दमदार प्रदर्शन से सभी को चौंका दिया। इस किरदार को उन्होंने इस तरह से निभाया कि लोगों को लगने लगा था मानों असलियत में शकुनि ही आ गया है। 'द्रौपदी' में शकुनि के इस किरदार के बाद डेविड ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
फिर साल 1954 में एक फिल्म ने उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। फिल्म का नाम था 'बूट पॉलिश', और उनका किरदार था जॉन चाचा, जिन्हें प्यार से अंकल जॉन कहा जाता था। इस भूमिका ने डेविड देश के घर-घर में मशहूर कर दिया। और तब से लोग उनको जॉन अंकल के नाम से ही पहचानने लगे। और इसी फिल्म से निकला था आइकॉनिक गाना, 'नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है…'। 71 साल पहले आया ये गाना आज भी रेडियो पर सुनने को मिल जाता है। इस फिल्म में डेविड ने एक दिव्यांग की भूमिका निभाई थी, जो गरीब और अनाथ बच्चों की परवरिश करता था और उनको एक अच्छा इंसान बनाने की कोशिश करता था। इस फिल्म के लिए डेविड को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर के फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था। इस तरह से अंकल जॉन का नाम सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया।
एक दौर ऐसा था कि ज्यादातर फिल्मों में डेविड उपस्थिति अनिवार्य सी हो गई थी। फिल्म अगर गंभीर मुद्दे पर भी होती थी तो भी पर्दे पर डेविड के आते ही लोगों के चहरों पर मुस्कान आ जाती थी। डेविड का छोटा कद, गंजा सिर और चेहरे पर मुस्कान गंभीर से गंभीर माहौल को भी खुशनुमा बना देती थी। उन्होंने फिल्मे में उन्हें ज्यादातर एक प्यार करने वाले पिता, चाचा या बड़े-बुजुर्ग के किरदार के लिए ही साइन किया जाता था।
'बूट पॉलिश' के बाद डेविड का करियर आसमान छू गया। 110 फिल्मों में काम करने वाले डेविड के फिल्मी करियर में एक समय ऐसा भी था जब वो एक साथ चार-पांच फिल्मों में काम करते थे। जेमिनी और एवीएम जैसे स्टूडियो ने लगभग अपनी हर फिल्म में उनको लिया। अगर बात की जाए उनकी कुछ यादगार फिल्मों की तो उनमें 'हाथी मेरे साथी', चुपके-चुपके, 'बातों बातों में', 'अभिमान', 'काली चरण', 'गोलमाल', 'खट्टा मीठा', 'सत्यकाम', 'खूबसूरत' जैसी बेहतरीन फिल्मों के नाम शामिल हैं।
हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओँ पर अच्छी पकड़ होने के चलते डेविड एंकरिंग भी करते थे। उनको अक्सर सरकारी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में एंकरिंग के लिए आमंत्रित किया जाता था। बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू डेविड के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उनकी एंकरिंग के कायल थे और वो उनसे मुलाकात भी कर चुके हैं। उनकी एंकरिंग से इम्प्रेस होकर खुद जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, 'डेविड अब्राहम के बिना कोई भी कार्यक्रम अधूरा लगता है, उनका आकर्षण और शालीनता इतनी अद्भुत है।'
डेविड अब्राहम ने कभी शादी नहीं की। अविवाहित रहने के बावजूद, वे अपने परिवार और रिश्तेदारों से गहराई से जुड़े रहे। उनके परिवार के ज्यादातर लोग इजराइल में जाकर बस गए, और बाद में डेविड भी अपने भतीजे और भतीजी के साथ रहने के लिए कनाडा चले गए। लेकिन वहां भी उन्होंने अपनी कला को जिंदा रखा। उन्होंने फिल्म 'लव इन कनाडा' में अभिनय किया और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना जारी रखा। वो अभिनय क्षेत्र में बहुत कुछ करना चाहते थे लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
27 दिसंबर, 1981 को टोरंटो में अपने घर में डेविड ने नाश्ता किया और बाहर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ और सांस लेने में मुश्किल होने लगी। उनका परिवार उन्हें तुरंत अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि उनको हार्ट अटैक आया है। अस्पताल में इलाज चलने के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। डॉक्टरों ने करीब दिनों तक उनकी जान बचाने की कोशिश की, लेकिन 2 जनवरी, 1982 को डेविड अब्राहम का देहांत हो गया, और वो अपने पीछे प्यार, हंसी और मानवता की विरासत छोड़ गए।
डेविड अब्राहम को अंकल जॉन के नाम से हमेशा याद किया जाएगा, वो सिर्फ एक करेक्टर आर्टिस्ट नहीं थे, वो हिंदी सिनेमा के गोल्डन एरा का दिल थे। आज भी, जब भी 'नन्हे मुन्ने बच्चे' बजता है, अंकल जॉन फिर से मुस्कुरा उठते हैं, हमें याद दिलाते हैं कि कुछ कलाकार कभी भी हमसे बिछड़ते नहीं।