Om Puri Death Anniversary: अभिनेता ओम पुरी को उनकी अदायगी के लिए ही नहीं, उनकी बेबाकी और स्पष्टवादिता के लिए भी जाना जाता है। और आज उनकी पुण्यतिथि पर सबसे पहले बात करेंगे उनके एक किरदार की।
Om Puri Death Anniversary: ओम पुरी, सिर्फ एक अभिनेता नहीं एक शख्सियत थे। हिंदी सिनेमा को इंटरनेशनल सिनेमा तक ले जाने वाले दिग्गज कलाकार जिन्होंने पैरलर सिनेमा में अपनी छाप छोड़ी तो उन्होंने कमर्शियल सिनेमा में अपने अभिनय का दम दिखाया। ओम पुरी ने जो भी किरदार निभाया उनमें सच्चाई और गहराई भर दी। आज हम उस कलाकार को याद कर रहे हैं जो जब-जब कैमरे के सामने आया एक ऐसा चेहरा छोड़ गया जिसको भुला पाना मुश्किल है। ओम पुरी भले ही हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी फिल्में और किरदार उन्हें हमेशा जिंदा रखते हैं। फिर चाहे वो कॉमेडी करना हो या फिर गंभीरता को दिखाना हो।
अभिनेता ओम पुरी को उनकी अदायगी के लिए ही नहीं, उनकी बेबाकी और स्पष्टवादिता के लिए भी जाना जाता है। और आज उनकी पुण्यतिथि (Om Puri Death Anniversary) पर सबसे पहले बात करेंगे उनके एक किरदार की। ये वो दौर था जब रेडियों के बाद लोगों के लिए मनोरंजन का साधन सिर्फ एक था और वो था दूरदर्शन। दूरदर्शन पर बच्चे हों या बूढ़े हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ जरूर था। इसी दूरदर्शन पर एक कार्यक्रम आता था 'भारत एक खोज।' इस कार्यक्रम को बनाया था दिग्गज और किरदारों को जीवंत करने वाले निर्देशक श्याम बेनेगल ने। इस सीरियल से पहले हम इतिहास को सिर्फ कहानियों, किताबों और सुनी-सुनाई बातों से जानते थे। लेकिन ‘भारत की खोज’ ने इतिहास को नए नजरिए से देखने का मौका दिया। 'भारत एक खोज' (Bharat Ek Khoj) के मुख्य कलाकारों में रोशन सेठ, ओम पुरी, टॉम ऑल्टर, और सदाशिव अमरापुरकर जैसे दिग्गज कलाकार शामिल थे, जबकि इरफान खान, नसीरुद्दीन शाह, पल्लवी जोशी, इला अरुण, सलीम गौस, और पंकज बेरी जैसे कई अन्य प्रसिद्ध कलाकारों ने भी अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं थीं।
डीडी नेशनल को दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में ओम साहब ने ये भी कहा था कि ये एक ऐसा सीरियल था जिसमें इतिहास को इतिहासकारों के सहयोग से बनाया गया था। इसमें हिस्टोरिकल, मायथोलॉजिकल और सोशल तीनों तरह के किरदार थे, जो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थे। हर कैरेक्टर की अपनी व्याख्या थी। इसके ही एक एपिसोड जिसमें महाभारत का जिक्र होता है उसमें ओम पुरी ने एक किरदार निभाया था गांधारी पुत्र और कौरवों में सबसे बड़े दुर्योधन का। वो दुर्योधन जो पांडवों को सुई बराबर जमीन भी नहीं देना चाहता था। मगर इसमें पांडवों की स्थिति ही नहीं दुर्योधन का भी एक अलग पहलू दिखाया गया था। दुर्योधन को आमतौर पर पूरी तरह नकारात्मक किरदार माना जाता है, लेकिन इस सीरियल में उसके तर्क और उसकी सोच को भी सामने रखा गया।
उसका मानना था कि कृष्ण द्वारा किए गए सारे फैसले सही नहीं थे। उसकी अपनी राजनीति थी, अपनी दलीलें थीं। संस्कृत नाटकों से लिए गए संवादों के जरिए दुर्योधन को एक सशक्त और विचारशील पात्र के रूप में पेश किया गया।
अपने इस किरदार के बारे में बात करते हुए एक बार ओम पुरी ने कहा था, 'दुर्योधन भी एक महान योद्धा और विद्वानी था। उसके अपने सवाल थे। वहीं, उन्होंने ये भी कहा कि श्री कृष्ण की हर बात, हर फैसले सही नहीं थे। उनकीअपनी पॉलिटिक्स थी, अपनी दलीलें थीं। वो पांडवों की तरफ खड़े थे। उनको पांडवों का साथ देना था।'
इसके आगे उन्होंने बताया कि 'भारत एक खोज' में ही जब उन्होंने मुगल बादशाह औरंगजेब का किरदार निभाया था, तब भी बहुत विचार-विमर्श हुआ था. औरंगजेब और शिवाजी की मुलाकात को लेकर भी काफी चर्चा हुई कि वे मिले थे या नहीं। अंत में क्रिएटिव लिबर्टी लेते हुए यह तय किया गया कि अगर दिखाया जाए, तो महल में नहीं बल्कि किसी और स्थान पर।
भारत एक खोज ही नहीं, जाने भी दो यारों में भी ओम पुरी ने कुछ मिनटों के लिए एक पौराणिक किरदार गदाधारी भीम का किरदार निभाया था। ओम पुरी की अदाकारी का दायरा देखिये कि जहां उन्होंने 'आक्रोश', 'अर्ध सत्य', 'तमस', 'घासीराम कोतवाल', 'आक्रोश', 'मंडी', 'निशांत' जैसी फिल्मों में अपने किरदारों में गंभीर अभिनय का परिचय दिया, वहीं, 'जाने भी दो यारो', 'हेरा फेरी', 'चाची 420', 'मालामाल वीकली' और टीवी सीरियल 'कक्काजी कहीं' में अपने जबरदस्त अभिनय से हास्य किरदारों को भी जीवंत कर दिया।
एक इंटरव्यू में अपने अभिनय की शुरुआत करने से पहले के दिनों के बारे में बात करते हुए ओम पूरी ने बताया था, 'बचपन में जब मैं शीशा देखता था तो लगता था कि चेहरा तो अच्छा नहीं है लेकिन मेरा फोटोग्राफर बहुत अच्छा था। मेरी बचपन की तस्वीर में एक भी दाग नहीं था, मतलब वो बिल्कुल एकदम क्लीन चेहरा था।' इसके साथ ही उन्होंने ये भी बताया था, 'जब मैं मुंबई आना चाहता था तो मुझे सबने बहुत रोका और कहा कि ऐसा चेहरा ना विलेन का है ना कॉमेडियन का ना हीरो का। आप क्यों जा रहे हो मुंबई? लेकिन मैंने भी सत्यजीत रे की फिल्में और ऋित्विक घटक की फिल्में देखी थीं तो मैंने उनमें देखा कि मेरे नाक से भी ज्यादा मोटे-मोटे नाक वाले लोग हैं, तो मैंने कहा यार हम भी बन सकते हैं फिर।
आप की अदालत में ओम पुरी ने बताया, 'मेरी सबसे बड़ी फिल्म 'अर्ध सत्य' वास्तव में अमिताभ बच्चन के लिए लिखी गई थी। उन्होंने इसकी स्क्रिप्ट भी सुनी थी लेकिन शुक्र है उन्होंने मना कर दिया था। मैं उनका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं। इस फिल्म के लिए मैंने पुलिस वालों के साथ काफी समय बिताया। ताकि मैं उनके किरदार को अच्छे से निभा पाऊं।'
अपने 35 साल के करियर में 250 से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके ओम पुरी ने हॉलीवुड में 'सिटी ऑफ जॉय', 'ईस्ट इज ईस्ट', 'द घोस्ट एंड द डार्कनेस', 'वुल्फ', 'चार्ली विल्सन्स वॉर', और 'द हंड्रेड-फुट जर्नी' जैसी कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया, जहां उन्होंने भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय किरदारों को निभाया, जिससे उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
ओम पुरी एक ऐसा नाम, जिसने कभी स्टारडम का शोर नहीं मचाया, लेकिन अपनी अदाकारी से सिनेमा की आत्मा को आवाज दी।