
Oxytocin Milk Injection Side Effect Research: सुबह की चाय हो या फिर गिलास भर दूध लगभग हर भारतीय परिवार में सुबह की शुरुआत दूध के साथ ही होती है। लेकिन पिछले कुछ सालों में एक सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या वाकई दूध पीने से हार्मोनल समस्याएं, थायरॉइड या फिर कैंसर जैसे गंभीर रोग होते हैं? आजकल सोशल मीडिया पर आपको दूध से कैंसर होने का वीडियो तो जरूर मिल जाएगा। हैरानी की बात तो यह कि इस वीडियो में यह भी दावा है कि दूध से कैंसर क्यों हो रहा है। वजह सामने आई दूध देने वाली गायों और भैंसों को लगाया जाने वाला ऑक्सिटोसिन इंजेक्शन। इस तरह के वीडियो को मेरे परिवार ने भी देखा और मन बनाया कि अब दूध-चाय बंद। अकेला मेरा परिवार ही नहीं, बल्कि कई लोगों से आजकल मैं यही सुनती हूं कि दूध पीने से ही पता नहीं क्या-क्या बीमारियां हो रही हैं। बच्चे जल्दी बड़े हो रहे हैं, खासतौर पर लड़कियों में पीरियड्स बचपन में ही शुरू हो रहे हैं। दूध पीने से थायरॉइड हो रहा है। इनकी बातों में भी कारण वही ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन।
सोशल मीडिया और लोगों के इन दावों के बीच patrika.com पर पढ़ें इस विषय (Oxytocin Milk Injection research)पर क्या कहते हैं वैज्ञानिक प्रमाण, प्रकाशित अध्ययनों और WHO की गाइडलाइन, संजना कुमार की खास रिपोर्ट…
आसान भाषा में समझा जाए, तो ऑक्सीटोसिन (Oxytocin Milk Injectionuse) एक प्रकार का हार्मोन है। जो प्राकृतिक रूप से स्तनधारियों में बनता है। यह प्रजनन से लेकर, दूध बनने और दूध के उतरने तक की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन कुछ लोग कृत्रिम ऑक्सीटोसिन हार्मोन को इंजेक्शन के माध्यम से पशुओं में अनियमित तरीके से और अवैध रूप से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि दूध जल्दी निकाला जा सके, उत्पादन बढ़ाया जा सके और आय बढ़ाई जा सके।
पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें एक व्यक्ति स्पष्ट शब्दों में कहता है कि कैंसर का एक बड़ा कारण जानकर आप चौंक जाएंगे। इसके बाद वह वाकई चौंकाने वाला दावा करता है कि दूध से कैंसर होता है, क्योंकि आजकल गाय-भैंस को ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन (Oxytocin Milk Injectioneffects on human) लगाए जा रहे हैं, जिसका दुष्प्रभाव मनुष्य की सेहत पर पड़ता है। वहीं आम जिंदगी में भी अक्सर लोग गाय भैंस का दूध या पैकेट बंद दूध से बचने के लिए दूध छोड़ने की सलाह देते नजर आते हैं। इनकी अब यह धारणा बन गई है कि दूध बीमारियों का घर है। इसलिए इसे पीने से बचो, बच्चों की भी सेहत खराब होती है, उन्हें भी मत पिलाओ। और कारण वही ऑक्सीटोसिन।
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन को लेकर WHO की गाइडलाइन में ऑक्सीटोसिन दवा (Oxytocin Milk Injectionbenefits) की गुणवत्ता और प्रसूति चिकित्सा में इसके सुरक्षित उपयोग के बारे में बताया गया है। लेकिन यह गाइडलाइन केवल महिलाओं के लिए है। जबकि पशुओं में ऑक्सीटोसिन को लेकर WHO ने इस तरह की कोई गाइडलाइन जारी नहीं की है। इसके अलावा इस तरह का कोई दावा या फैक्ट भी कहीं नहीं मिला, जिसमें यह कहा गया हो कि ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगे पशुओं का दूध पीने से कैंसर या फिर हार्मोनल प्रॉबलम्स होती हैं।
FSSAI के मुताबिक दूध देने वाली गाय या भैंस को यह दवा (Oxytocin Milk Injection cause cancer) इस उद्देश्य से देने की अनुमति बिल्कुल नहीं है, कि दूध उत्पादन के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए। वहीं नियमों को लेकर सख्ती यह है कि सिवाए रजिस्टर्ड पशु चिकित्सक की निगरानी में और चिकित्सकीय दृष्टि से बेहद जरूरी होने पर ही इसे संबंधित पशु को दिया जा सकता है।
-1-इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (IITR), लखनऊ के वैज्ञानिकों ने 2014 में दूध के नमूनों पर अध्ययन किया। अध्ययन के तहत वैज्ञानिक डॉ. मंजरी मिश्रा, डॉ. शाकिर अली और डॉ. मुकुल दास ने देश के स्थानीय बाजार से लिए गए दूध के 55 नमूनों की जांच की। कुछ नमूने ऐसे थे, जिनमें ऑक्सीटोसिन हार्मोन दवा (Oxytocin Milk Injection fact check) के अवशेष पाए गए। इसके बाद टीम ने अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों में दूध के जरिए संभावित ऑक्सीटोसिन सेवन का आकलन किया। लेकिन इस अध्ययन में कहीं भी ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला, जो यह पुष्टि करता हो, कि ऑक्सीटोसिन इंजेक्टेड पशुओं का दूध पीने से कैंसर होता है।
-2- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन (ICMR) हैदराबाद के वैज्ञानिकों डॉ. रघु पुल्लाखंडम, डॉ. रविंद्रनाथ पालिका, डॉ. सुदर्शन राव वेमुला, डॉ. कल्पगम पोलासा और डॉ. बी, सेसिकरण ने 2014 में किए गए अपने अध्ययनों में पाया कि ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के इस्तेमाल से दूध में ऑक्सीटोसिन की मात्रा (Oxytocin Milk Injection WHO Guideline) में बहुत उल्लेखनीय वृद्धि नहीं देखी गई। उनका शोध बताता है कि दूध को गर्म करने और पाचन प्रक्रिया के दौरान ऑक्सीटोसिन आसानी से टूट जाता है। इनका अध्ययन भी यह निष्कर्ष नहीं निकालता कि ऑक्सीटोसिन का हार्मोन गड़बड़ी या कैंसर से सीधा संबंध है। या फिर ऑक्सीटोसिन मानव शरीर में पहुंचकर कोई नुकसान पहुंचाता हो।
पाकिस्तान की सिंध यूनिवर्सिटी में भी इस विषय पर शोध किए गए हैं। 2015 के एक शोध के तहत शोधकर्ताओं ने दूध के 84 नमूने लेकर उनकी जांच शुरू की। ब्रांडेड और बिना ब्रांडेड दूध की जांच की गई। जांच में बिना ब्रांडेड दूध के नमूनों में ब्रांड वाले दूध की अपेक्षा ऑक्सीटोसिन (Oxytocin Milk Injection hormonal changes) ज्यादा मिला। हालांकि इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट तौर पर लिखा है कि इसके दीर्घकालिक प्रभावों को जानने के लिए यह अध्ययन काफी नहीं, इस पर व्यापक रिसर्च की जरूरत है।
अब तक की गईं रिसर्च तो यही कहती हैं कि ऐसा सोचना सही नहीं है कि दूध से कैंसर होता है, वो भी इसलिए कि गाय-भैंस को ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाया जा रहा है। कुछ और वैज्ञानिक चर्चाओं और समीक्षाओं में भी यही सामने आया है कि दूध में मौजूद ऑक्सीटोसिन हार्मोन के असर से जल्दी यौवनकाल आने या बच्चों के बड़े होने के साथ ही कैंसर के बीच संभावित संबंधों को लेकर फिलहाल व्यापक स्तर पर शोध की आवश्यकता है, लेकिन इनकी रिसर्च के निष्कर्ष भी ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन के दुष्प्रभावों से सीधे तौर पर संबंधित नहीं हैं। यानी अब तक ऐसा कोई मजबूत दावा नहीं है, जो यह पुष्टि करता हो कि ऑक्सीटोसिन दिए गए पशु का दूध पीने से कई गंभीर बीमारियां सीधे तौर पर होती हैं- जैसे- कैंसर, PCOS, बांझपन या अन्य कोई हार्मोनल समस्या।
दरअसल पशु चिकित्सकों का कहना है ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन (Oxytocin Milk Injection milk production) को लेकर पशुओं की सेहत और उनके कल्याण के लिए सख्ती जरूरी है। क्योंकि इस इंजेक्शन का ज्यादा इस्तेमाल पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। ऐसे में दवा का अवैध और अनियंत्रित उपयोग कानून का उल्लंघन माना जाता है। वहीं खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी दवा का उपयोग रोकना जरूरी है। ऐसे में एक्सपर्ट भी यही मानते हैं कि डेयरी सेक्टर पर सख्त निगरानी की जरूरत है।
एंडोक्राईनोलॉजी एक्सपर्ट, सीनियर कंसल्टेंट डॉ. संदीप खर्ब के मुताबिकऑक्सीटोसिन एक पेप्टाइड हार्मोन है। जब यह दूध के माध्यम से शरीर में पहुंचता है, तो पेट का एसिड और पाचन एंजाइम इसे तोड़ देते हैं। यह सीधे तौर पर ब्लड में नहीं पहुंचता। वहीं वर्तमान वैज्ञानिक अध्ययनों में भी ऐसे ठोस प्रमाण नहीं मिलते हैं कि ऑक्सीटोसिन वाले दूध को पीने से बच्चों में समय से पहले बड़ा होना, खास तौर पर छोटी-छोटी बच्चियों में समय से पहले पीरियड्स की समस्या होना या हार्मोनल जैसी कोई समस्या सामने आ रही है।
अमेरिकन कैंसर सोसायटी समेत कई वैज्ञानिक जानकारी के मुताबिक दूध में ऑक्सीटोसिन (Oxytocin Milk Injection cause cancer American Research) के कारण कैंसर होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। वहीं कुछ हार्मोन और कैंसर को लेकर जारी शोध भी अब तक इस इंजेक्शन से सीधा संबंध नहीं बताते।
पशु स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि बिना किसी चिकित्सकीय जरूरत के ऑक्सीटोसिन देने से पशु के प्राकृतिक रूप से गाय या भैंस को दूध उतरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। लंबे समय तक इसका इस्तेमाल दुरुपयोग करना होगा, इसके असर से इन पशुओं के प्रजनन तंत्र पर भी तनाव पड़ सकता है।
नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिट्यूट (NDRI) नेसरकार को बताया कि ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिलता कि ऑक्सीटोसिन के कृत्रिम उपयोग से गाय-भैंस की संतानों पर भी कोई विपरीत या प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो। हालांकि ऑक्सीटोसिन के लगातार उपयोग से प्राकृतिक रूप से गाय-भैंस में दूध बनने और उतरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
कर्नाटक पशु चिकित्सा, पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सा औषधविज्ञानी प्रकाश नादूर भी इस बारे में पहले ही कह चुके हैं कि, पशु चिकित्सक बहुत कम स्थितियों में ऑक्सीटोसिन का उपयोग करते हैं। इसका इस्तेमाल मवेशियों में प्रसव पीड़ा प्रेरित करने में भी किया जाता है। इसमें, एक दिन में लगभग 50-100 अंतर्राष्ट्रीय इकाई (IU) ऑक्सीटोसिन दी जाती है। वहीं इसकी जरूरत तब पड़ती है जब दुधारू पशु अपने बछड़े की मृत्यु या उसके अलग हो जाने के कारण दूध उत्पादन करने में असमर्थ हो जाता है। नादूर के मुताबिक पशु के प्राकृतिक ऑक्सीटोसिन स्तर को बढ़ाने के लिए, जो दूध उत्पादन को उत्तेजित करता है, 5 IU तक का इंजेक्शन दिन में दो बार 2-3 दिन तक दिया जाता है। लेकिन वे आगे चेतावनी भी देते हैं कि ऑक्सीटोसिन दीर्घकालिक उपयोग के लिए नहीं है।
जर्नल ऑफ डेयरी साइंस में 1991 में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक जब होल्स्टीन नस्ल की गायों को 305 दिन तक हर दिन 20 IU ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन दिए गए, तो इससे थन की सूजन (मैस्टाइटिस) की व्यापकता में कोई वृद्धि नहीं हुई। न ही इससे गायों के 21 दिनों के प्रजनन चक्र (जिसे मदचक्र कहा जाता है) की अवधि कम हुई।
हरियाणा के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI)द्वारा किए गए एक अप्रकाशित अध्ययन में भैंसों को 90 दिन तक प्रतिदिन 2.5 और 5 आईयूएन ऑक्सीटोसिन दिया गया। एनडीआरआई के पशु शरीर क्रिया विज्ञानी महेंद्र सिंह के अनुसार, यहां भी भैंसों के मद चक्र और गर्भधारण क्षमता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। हालांकि यह जरूर सामने आया कि पशु ऑक्सीटोसिन के आदी हो गए। जब उन्हें ये नहीं दिया गया, तब दूध का उत्पादन कम हो गया। यही कारण है कि यह माना गया कि इस हार्मोन का निरंतर उपयोग किसी समस्या से कम भी नहीं है।
ने भी बड़ी चिंता की वजह ऑक्सीटोसिन को नहीं, बल्कि मुख्य चिंता का विषय मिलावटी दूध को बताया जिसमें अनियमित रसायनों का इस्तेमाल, बिना किसी नियंत्रण के एंटीबायोटिक या अन्य अवशेष पाए जाएं उसे बताया है। उनका कहना है कि इन अवशेषों से पेट की समस्या, एलर्जी और एंटिबायटिक रेजिस्टेंस जैसी परेशानियां हो सकती हैं। वहीं खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक दूध में ऑफ्लाटॉक्सिन M1 या अन्य रासायनिक संदूषक हैं, तो यह ज्यादा गंभीर बात है। FSSAI ने भी अपने राष्ट्रीय सर्वेक्षण में इन संदूषकों की निगरानी पर विशेष जोर दिया है।